94 - वर्णधर्म - निरूपण

याज्ञवल्क्यजीने कहा - गर्भधारण अथवा जन्म - ग्रहणके आठवें वर्षमें ब्राह्मण, ग्यारहवें वर्षमें क्षत्रिय तथा बारहवें वर्षमें वैश्यका उपनयन - संस्कार गुरु करे अथवा कुल - परम्पराके अनुसार करे। गुरु इस उपनीत शिष्यको महाव्याहृतियोंके सहित वेद पढ़ाये और शौचाचारकी शिक्षा प्रदान करे।

द्विजोंको दिन और संध्याकालमें उत्तराभिमुख तथा रात्रिके समय दक्षिणाभिमुख होकर मल - मूत्रका परित्याग करना चाहिये। तदनन्तर मिट्टीसे एवं जलसे(कूप आदिसे बाहर निकाले गये जलके द्वारा शुद्धिका विधान है। जलके मध्य शौच आदि क्रिया निषिद्ध है।) मल - मूत्रके गन्ध एवं लेपका निवारण जबतक न हो तबतक इन्द्रियोंका परिमार्जन करे।

तत्पश्चात्‌ शुद्ध स्थानमें जाकर दोनों पाँवोंको भलीभाँति धोकर दोनों जानुओंके मध्य अपने हाथोंको अवस्थित करके उत्तराभिमुख या पूर्वाभिमुख बैठे और दाहिने हाथमें स्थित ब्राह्मतीर्थ (अर्थात्‌ अंगुष्ठका मूल स्थान) - से आचमन करे। कनिष्ठा, तर्जनी एवं अंगुष्ठ अंगुलिके मूल स्थान तथा हाथके अग्रभागमें क्रमश: प्रजापतितीर्थ, पितृतीर्थ, ब्रह्मतीर्थ और देवतीर्थका अधिष्ठान होता है।

कूप एवं तड़ागादिके शुद्ध जलसे तीन बार आचमन करके अंगुष्ठमूलसे दो बार ओठोंका मार्जन करना चाहिये। द्विजातियोंको चाहिये कि वे फेन और बुदबुदोंसे रहित प्रकृतिद्वारा प्रदत्त शुद्ध - स्वाभाविक जलसे अपनी इन्द्रियोंका स्पर्श यथाविधि करें। हृदय, कण्ठ एवं तालुतक पहुँचनेवाले जलसे ही क्रमश: ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य आचमन करके शुद्ध होते हैं। स्त्री एवं शूद्रकी तालुतक पहुँचनेवाले शुद्ध जलसे एक बार आचमन करनेसे ही शुद्धि हो जाती है। जिनका यज्ञोपवीत नहीं हुआ है, उनके लिये भी इसी प्रकार आचमनकी व्यवस्था है।

प्रात:स्नान, जलदैवत ‘ॐ आपो हि ष्ठा०' आदि मन्त्रोंसे मार्जन, प्राणायाम, सूर्योपस्थान एवं गायत्रीमन्त्रका जप प्रतिदिन अपने अधिकारके अनुसार यथाविधि करना चाहिये।

ॐ आपो ज्योती०’ आदि मन्त्र ही गायत्रीमन्त्रका शिरोभाग हैं। इस शिरोभागसे युक्त प्रतिमहाव्याहृति एक - एक बार प्रणव जोड़कर तीनों महाव्याहृतियोंके साथ गायत्रीमन्त्रका मानस - जप करते हुए मुख एवं नासिकामें संचरणशील वायुका नियमन करना ही प्राणायाम है।

प्राणायाम करनेके पश्चात्‌ तीन बार जल देवताके मन्त्रसे प्रोक्षणकर प्रतिदिन सायंकाल नक्षत्रदर्शनतक पश्चिममुख बैठकर गायत्रीमन्त्रका जप करे। इसी प्रकार प्रातःकालकी संध्या करके पूर्वमुख होकर गायत्रीमन्त्रका जप करते हुए सूर्यदर्शनके समयतक स्थिर रहे। उन दोनों संध्याओंमें अपने गृह्मसूत्रके अनुसार अग्निहोत्र करे।

तदनन्तर ‘मैं अमुक हूँ’ इस प्रकार कहते हुए वृद्धजनों (गुरु आदि बड़े लोगों ) - को प्रणाम करे। इसके बाद संयमी ब्रह्मचारी स्वाध्यायके लिये एकाग्रचित्त होकर गुरुकी सेवामें उनके अधीन सदा रहे। तत्पश्चात्‌ गुरुके द्वारा बुलानेपर उनके पास जाकर अध्ययन करे (गुरुको स्वयं अध्यापनके लिये प्रेरित न करे) और भिक्षामें जो कुछ प्राप्त हो, उसे गुरुके चरणोंमें समर्पित करे। मन, वाणी और शरीरके द्वारा गुरुके हितकारी कार्योंमें सदा संलग्न रहे।

ब्रह्मचारीको दण्ड, मृगचर्म, यज्ञोपवीत और मूँजमेखलाका धारण यथाशीघ्र करना चाहिये तथा अपनी जीविकाके लिये अनिन्दित श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके घरसे भिक्षा ग्रहण करनी चाहिये भिक्षा ग्रहण करते समय ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य - वर्णके ब्रह्मचारीको क्रमश: आदिमें, मध्यमें तथा अन्तमें ‘भवति’ शब्दका प्रयोग करना चाहिये। इसके अनुसार ‘भवति भिक्षां देहि', ‘भिक्षां भवति देहि’ और ‘भिक्षां देहि भवति’- इस प्रकार वाक्यप्रयोग यथाक्रम ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य ब्रह्मचारीको करना विहित है। इस वाक्यका अर्थ है - आप भिक्षा दें। ‘भवति’ यह माताओंके लिये सम्बोधन है।

अग्निकार्य (अग्निहोत्र) करके गुरुकी आज्ञासे विनयपूर्वक आपोऽशान- क्रिया(भोजनके पूर्व तथा अन्तमें एक बार जलसे आचमन करना ‘आपोऽशान - क्रिया’ है। इसमें ‘अमृतोपस्तरणमसि’ इस वाक्‍यका प्रयोग विहित है।)करके सम्मानके सहित उस भिक्षासे प्राप्त भोज्यान्नको बिना निन्दा किये ही मौन होकर ग्रहण करना चाहिये।

ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए आपत्तिरहित कालमें, रोग आदिके अभावमें अनेकका अन्न ग्रहण करे(एक घरका अन्न न ग्रहण करे)। अपने व्रतका संयमपूर्वक पालन करता हुआ ब्राह्मण ब्रह्मचारी श्राद्धमें आदरपूर्वक आहूत होनेपर इच्छानुसार भोजन कर सकता है, किंतु उसे श्राद्धकाल या अन्य अवसरोंमें मधु, मद्य, मांस अथवा उच्छिष्ट अन्न भोजनके रूपमें ग्रहण नहीं करना चाहिये।

जो विधि - विहित क्रियाओंको सम्पन्न कराके ब्रह्मचारीको वेदकी शिक्षा प्रदान करता है, वही ‘गुरु’ है। जो केवल यज्ञोपवीत - संस्कार कराके ब्रह्मचारीको वेदकी शिक्षा देता है, वह ‘आचार्य’ कहा गया है। जो वेदके एक देशका (मन्त्र एवं ब्राह्मणरूपमें वेदके दो भाग हैं। इनमेंसे केवल एक भागका अध्यापन अथवा वेदके अङ्गमात्रका अध्यापन वेदके एक देशका अध्यापन है।) अध्ययन कराता है, वह ‘उपाध्याय’ है। जो वरण लेकर यजमानके यज्ञको सम्पन्न करता है, उसे ‘ऋत्विक्‌’ कहा जाता है। यथाक्रम ये सभी - गुरु, आचार्य, उपाध्याय और ऋत्विक्‌ ब्रह्मचारीके लिये मान्य हैं, किंतु इन सभीसे माता श्रेष्ठ है।

प्रत्येक वेदके अध्ययनके लिये बारह - बारह वर्षतक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करना चाहिये। अशक्तावस्थामें प्रत्येक वेदके अध्ययनके लिये पाँच - पाँच वर्षतक भी ब्रह्मचर्यव्रतका पालन किया जा सकता है। कुछ लोगोंका यह भी मत है कि वेदाध्ययन पूर्ण होनेतक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन होना चाहिये। केशान्त - संस्कार(केशान्त - संस्कारसे ही श्मश्रु (दाढ़ी)बनवानेका आरम्भ होता है।) गर्भसे सोलहवें वर्षमें ब्राह्मणका, गर्भसे बाईसवें वर्षमें क्षत्रियका तथा गर्भसे चौबीसवें वर्षमें वैश्यका होना चाहिये।

ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्यवर्णके लिये क्रमशः सोलह, बाईस और चौबीस वर्षतक उपनयनकाल रहता है। इस कालतक उपनयन न होनेपर ये सभी पतित हो जाते हैं, सर्वधर्मच्युत हो जाते हैं। उनका किसी भी धर्मकार्यमें अधिकार नहीं रहता। व्रात्यस्तोम नामके क्रतुका अनुष्ठान करके ही ये यज्ञोपवीत - संस्कारके लिये योग्य होते हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य सबसे पहले माताके उदरसे उत्पन्न होते हैं, उसके बाद पुनः मौंजीबन्धन अर्थात्‌ यज्ञोपवीत - संस्कारसे उनका द्वितीय जन्म होता है। अत: ये द्विजाति कहलाते हैं।

श्रौत - स्मार्त यज्ञ, तपस्या (चान्द्रायण आदि व्रत) और शुभकर्मों (उपनयन आदि संस्कारों) - का बोधक एकमात्र वेद है। अत: द्विजातियोंके लिये वेद ही परम कल्याणका साधन है। इससे वेदमूलक स्मृतियोंका भी उपयोग स्पष्ट है।

जो द्विज प्रतिदिन ऋग्वेदका अध्ययन करता है, वह देवताओंको मधु एवं दुग्धसे तथा पितरोंको मधु एवं घृतसे प्रतिदिन तृप्त करता है। जो द्विज प्रतिदिन यजुर्वेद, सामवेद अथवा अथर्ववेदका अध्ययन करता है, वह घृत एवं अमृतसे पितरों तथा देवताओंको प्रतिदिन तृत्त करता है। ऐसे ही जो द्विज प्रतिदिन वाकोवाक्य( वाकोवाक्य - प्रश्नोत्तररूप वेद - वाक्य ), पुराण, नाराशंसी( नाराशंसी - रुद्रदैवत्य मन्त्र), गाथिका (गाधिका - यज्ञ - सम्बन्धी इन्द्र आदिकी गाथाएँ ) इतिहास(इतिहास - महाभारत आदि) तथा विद्याका(विद्या - वारुणी आदि विभिन्न विद्याएँ) अध्ययन करता है, वह पितरों एवं देवताओंको मांस (फल), दूध और ओदन (भात) - से प्रतिदिन तृप्त करता है। संतृप्त ये देवता और पितृजन भी इस स्वाध्यायशील द्विजको समस्त अभीष्ट शुभ फलोंसे संतुष्ट करते हैं। द्विज जिस - जिस यज्ञके प्रतिपादक वेद - भागका अध्ययन करता है, उस - उस यज्ञके फलको प्राप्त करता है। इसके अतिरिक्त भूमिदान, तपस्या और स्वाध्यायके फलका भी भागी होता है।

नैष्ठिक ब्रह्मचारीको अपने आचार्यके सांनिध्यमें रहना चाहिये। आचार्यके अभावमें आचार्यपुत्र और उसके अभावमें आचार्य - पत्नी तथा उसके भी अभावमें वैश्वानर - अग्निके आश्रयमें (अपनेद्वारा उपास्य अग्निकी शरणमें) रहना चाहिये। इस प्रकार अपने देहको क्षीण करता हुआ जितेन्द्रिय द्विज ब्रह्मचारी ब्रह्मलोकको प्राप्त करता है। उसका पुनः जन्म नहीं होता।