गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
151 - हिक्कारोग - निदान
धन्वन्तरिजीने कहा - हे सुश्रुत! अब मैं हिक्का (हिचकी ) - रोगके निदानको कहूँगा, आप उसे सुनें।
श्वासरोगके जो - जो निदान - पूर्वरूप, संख्या, प्रकृति और आश्रयस्थान कहे गये हैं, वे ही हिक्का रोगके भी होते हैं। यह हिक्का पाँच प्रकारकी होती है - भक्तोद्भवा (अन्नजा), क्षुद्रा, यमला, महती और गम्भीरा। रूक्ष, तीक्ष्ण खर तथा असात्म्य अन्न अथवा पेय पदार्थोंके सेवनसे प्रकुपित वायु हिक्कारोगको पैदा करती है। इस हिक्कारोगमें रोगी श्वास लेता हुआ क्षुधानुगामी मन्द - मन्द शब्द करता है। अन्न तथा पेय पदार्थके अयुक्तिपूर्वक सेवन करनेसे जो हिक्का (हिचकी) रोगीको आती है, उसे 'अन्नजा हिक्का' कहते हैं। यह हिचकी सात्म्य अन्नपानसे शान्त हो जाती है। अधिक परिश्रम करनेसे शरीरमें प्रकुपित हुआ पवन 'क्षुद्रा हिक्का 'को जन्म देता है। वह ग्रीवामूलसे निकलकर मन्द - मन्द गतिसे कण्ठके बाहर आता है। यह रोग अधिक परिश्रम करनेसे बढ़ जाता है, किंतु यथोचित मात्रामें भोजन कर लेनेपर कुछ शान्त हो जाता है।
जो हिचकी (अ०हृ०नि०अ०5।) अधिक समयसे एक या दो बार वेगपूर्वक आती है, परिणामतः वह धीरे - धीरे बढ़ती जाती है। अपने वेगसे जो रोगीके सिर और ग्रीवाभागको प्रकम्पित कर देती है, उसको 'यमला हिक्का' के नामसे स्वीकार करना चाहिये। इसमें रोगी प्रलाप करता है तथा उसको वमन होता है और उसे अतिसार हो जाता है, कमजोरीसे उसके नेत्र बैठ जाते हैं और जम्भाई आती है। ऐसी अवस्थावाली हिक्काको वेगवती परिणाम देनेवाली 'यमला हिक्का' कहते है।
जिस हिक्कारोगके वेगसे रोगीकी भौंह और कनपटियोंमें कष्ट होने लगता है, कान तथा नेत्र बंद हो जाते हैं, कानोंसे सुनायी नहीं देता है और आँखोंसे दिखायी नहीं पड़ता है। रोगीके शरीर, वाणी और स्मरणकी शक्तिको शिथिल करती हुई जो हिक्का अन्तमें उसे संज्ञाशून्य कर देती है, तथा अन्य इन्द्रियोंको दु:खित करती हुई वह उसके मर्मस्थलमें पीड़ा पहुँचाती है तथा रोगीको पीठभागसे झुका देती है एवं शरीरको शुष्क कर देती है, उस हिक्काको 'महती हिक्का' कहा जाता है। यह महामूला, महाशब्दा, महावेगा और महाबला होती है।
गम्भीरा नामकी हिक्का पक्वाशय, मलाशय अथवा नाभिभागसे अपने पूर्वस्वभावके अनुसार शरीरमें प्रकट होती है तो उस रोगीको जम्भाई लेनेके लिये विवश कर देती है। उसके हाथ - पैर आदि सभी अङ्ग फैलने लगते हैं। उस हिक्काके कुप्रभावसे रोगीका सम्पूर्ण शरीर शिथिल पड़ जाता है। इसमें गम्भीर शब्द होता है, इसलिये इसका नाम 'गम्भीरा हिक्का' है।
प्रारम्भमें (अ०हृ०नि०अ0 4 , च०चि०अ0 21।) बतायी गयी भक्तोद्भवा (अन्नजा) तथा क्षुद्रा नामक जो दो हिक्काके प्रकार बताये गये हैं, वे साध्य होती हैं। उन दोनोंको छोड़कर शेष अन्य जो यमलादिक तीन हिकक्काएँ हैं, वे असाध्य होती हैं। किंतु चिरकाल (पुरानी) हिचकी, वृद्ध मनुष्यकी हिचकी, अतिस्त्री - सेवीकी हिचकी, व्याधिद्वारा क्षीण देहवालेकी हिचकी, अन्नके अभावसे कृश मनुष्यकी हिचकी - ये सब असाध्य होती हैं। सभी रोग शरीरमें प्राणियोंका विनाश करनेके लिये ही आते हैं। किंतु वे वैसी शीघ्रता नहीं करते हैं, जैसी शीघ्रता इस हिक्काके यमलादिक भेद करते हैं। हिक्का और श्वास - ये दोनों रोग जैसे हैं, वैसे अन्य कोई रोग नहीं हैं। वे दोनों तो मृत्युकाल - स्वरूप प्राणीके शरीरमें ही अपना डेरा डाल लेते हैं।