गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
49 - वर्ण एवं आश्रमधर्मों का निरूपण
ब्रह्माजीने कहा - हे व्यासजी महाराज! स्वायम्भुव मनु आदि शास्त्रकारोंके द्वारा पूज्य तथा सृष्टि, स्थिति और प्रलय करनेवाले भगवान् हरिकी पूजा ब्राह्मणादि चारों वर्ण अपने - अपने धर्मके अनुसार करते हैं। मैं पृथक् - पृथक् रूपसे उनके धर्मोंको कह रहा हूँ। आप उसे सुनें।
हे ब्राह्मणश्रेष्ठ। यजन, याजन, दान, प्रतिग्रह, अध्ययन और अध्यापन - ये छः कर्म ब्राह्मणके धर्म हैं। दान, अध्ययन तथा यज्ञ - ये क्षत्रिय एवं वैश्यके साधारण धर्म हैं। इसके अतिरिक्त दण्ड क्षत्रियके लिये और कृषि करना वैश्यके लिये विशेष धर्म स्वीकार किया गया है।
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य - इन तीनों द्विजातियोंकी सेवा करना शूद्रोंका धर्म है। शिल्पकारी उनकी आजीविका है। धर्मानुसार वे पाकयज्ञ - संस्थाका निर्वहन भी कर सकते हैं।
भिक्षाचरण, गुरु - शुश्रूषा, स्वाध्याय, संध्या तथा अग्नि - कार्य - ये ब्रह्मचारियोंके धर्म हैं।
चारों आश्रमोंके दो भेद माने गये हैं। इसके अनुसार ब्रह्मचारीके उपकुर्वाण तथा नैष्ठिक - ये दो भेद हैं। जो द्विज विधिवत् वेदादिका अध्ययन करके गृहस्थाश्रममें प्रविष्ट हो जाता है वह उपकुर्वाण है। जो मृत्युपर्यन्त गुरुकुलमें निवास करते हुए वेदाध्ययन करते रहते हैं - ब्रह्मतत्पर होते हैं, उन्हें नैष्टिक ब्रह्मचारीके नामसे जानना चाहिये।
हे द्विजश्रेष्ठ! अग्निकार्य, अतिथिसेवा, यज्ञ - दान और देवार्चन - ये सभी गृहस्थोंके संक्षिप्त धर्म हैं। गृहस्थके साधक और उदासीन दो प्रकार हैं। जो गृहस्थ परिवारके भरण - पोषणमें लगा रहता है, वह साधक है। जो गृहस्थ पितृऋण, देवऋण और ऋषिऋण - इन तीनोंसे मुक्त होकर पत्नी - धनादिका भी त्याग करके एकाकी धर्माचरण करता हुआ विचरण करता रहता है, वह उदासीन गृहस्थ है। उसीको मौक्षिक भी कहते हैं।
भूमिशयन, फल - मूलका आहार, वेदाध्ययन, तप और अपनी सम्पत्तिका यथाधिकार यथोचित विभाग - ये सभी वानप्रस्थके धर्म हैं। जो वानप्रस्थ अरण्यमें तपश्चरण करता है, देवार्चन और उन्हें आहुति प्रदान करता है तथा स्वाध्यायमें सदैव अनुरक्त रहता है, वह वानप्रस्थ तापसोत्तम कहा जाता है। ऐसे ही जो वानप्रस्थ तपके द्वारा शरीरको अत्यन्त क्षीण करके ईश्वरके ध्यानमें सदा निमग्न रहता है, वह वानप्रस्थाश्रममें रहता हुआ भी संन्यासीके रूपमें जाना जाता है।
जो भिक्षु (संन्यासाश्रमी) नित्य योगाभ्यासमें अनुरक्त होकर ब्रह्मकी प्राप्तिके लिये प्रयासरत एवं जितेन्द्रिय बना रहता है, उसको पारमेष्टिक संन्यासी कहते हैं। जो सदैव आत्मतत्त्वानुसंधानमें प्रेम रखनेवाले हैं, नित्य तृप्त हैं, जो संयम - नियमसे रहते हैं, ऐसे महामुनि योगी भिक्षु कहे जाते हैं। भिक्षाचरण, वेदाध्ययन, मौनावलम्बन, तप, ध्यान, सम्यक् - ज्ञान और वैराग्य - ये भिक्षुक (संन्यासाश्रमी ) - के सामान्य धर्म माने गये हैं।
पारमेष्ठिक संन्यासी तीन प्रकारके हैं - ज्ञानसंन्यासी, वेदसंन्यासी एवं कर्मसंन्यासी। योगीके भी तीन प्रकार हैं - जिन्हें भौतिक, (क्षत्र) एवं अन्त्याश्रमी योगी कहते हैं। ये तीनों योगमूर्तिस्वरूप परमात्माका आश्रयकर स्थित रहते हैं।
इन योगियोंकी पृथक् - पृथक् ब्रह्मभावनाएँ होती हैं। प्रथम प्रकारकी ब्रह्मभावना भौतिक योगीमें रहती है। दूसरी (मोक्ष) भावना क्षत्र योगीमें रहती है, इसीको अक्षर भावना कहते हैं। तीसरी भावनाको अन्तिम भावना कहते हैं, जो पारमेश्वरी भावनाके नामसे भी जानी जाती है। ( ब्रह्मभावनाके ये तीन भेद ब्रह्मानुसंधानकी प्राथमिक, माध्यमिक और अन्तिम स्थितिको दृष्टिमें रखकर किये गये हैं।)
मनुष्यको धर्मसे ही मोक्षकी प्राप्ति होती है, अर्थसे काम - पुरुषार्थकी प्राप्ति होती है। वेदमें प्रवृत्ति और निवृत्तिके भेदसे दो प्रकारके कर्म कहे गये हैं। वेदशास्त्रानुसार अग्नि आदि देव एवं गुरु - विप्रादिको प्रसन्न करनेके लिये जो कर्म विहित हैं, वे प्रवृत्तिकर्म हैं तथा सविधि कर्मानुष्ठानसे चित्तशुद्धिके अनन्तर आत्मज्ञानमात्रमें सदा रत रहना निवृत्तिकर्म है।
क्षमा, दम, दया, दान, निर्लोभता, स्वाध्याय, सरलता, अनसूया, तीर्थका ( 'तीर्थ' शब्द श्रेष्ठताका वाचक है।) अनुसरण, सत्य, संतोष, आस्तिक्य, इन्द्रियनिग्रह, देवार्चन - विशेषकर ब्राह्मणोंका पूजन, अहिंसा, प्रियवादिता, अरूक्षता और अपैशुन्य (चुगली न करना) - इन सभीको चारों आश्रमोंका सामान्य धर्म स्वीकार किया गया है।
(क्षमा दमो दया दानमलोभा (भो) भ्यास एव चा॥
आर्जवं चानसूया च तीर्थानुसरणं तथा।
सत्यं संतोष आस्तिक्यं तथा चेन्द्रियनिग्रह:॥
देवताभ्यर्चनं पूजा ब्राह्मणानां विशेषत:।
अहिंसा प्रियवादित्वमपैशुन्यमरूक्षता॥
एते आश्रमिका धर्माश्चातुर्वणर्य ब्रवीम्यत:।)
इसके बाद अब मैं चारों वर्णोंको प्राप्त होनेवाले स्थानके विषयमें कह रहा हूँ।
उपर्युक्त वेद - विहित कर्मोको करनेवाले ब्राह्मणोंके निमित्त प्राजापत्य नामका स्थान है (अर्थात् ब्राह्मण ऐसे धर्मोका पालन करता हुआ अन्त समयमें प्राजापत्य लोक प्राप्त करता है)। युद्धमें न भागनेवाले धर्मरत क्षत्रियोंको स्वर्गमें इन्द्रका स्थान प्राप्त होता है। सदैव अपने धर्ममें अनुरक्त रहनेवाले वैश्य अन्तमें मरुद् देवके स्थानको प्राप्त करते हैं। ब्राह्मणादि द्विजोंकी सेवामें तत्पर रहनेसे शूद्रोंको गन्धर्वलोक प्राप्त होता है।
ऊर्ध्वरेतस् ब्रह्मनिष्ठ अट्टासी सहस्र ऋषियोंने तपस्याके द्वारा जिस स्थानको प्राप्त किया था, वही स्थान गुरुकुलमें निवास करनेवाले ब्रह्मचारीको प्राप्त होता है। जो स्थान मरीचि, अत्रि आदि सप्तर्षियोंको प्राप्त है, वह स्थान वानप्रस्थाश्रमी प्राप्त करते हैं। संयमित चित्तवाले, ऊर्ध्वरेतस् संन्यासियोंकों वह आनन्दरूप परब्रह्मपद प्राप्त होता है, जहाँसे पुन आगमनकी सम्भावना नहीं होती। यह परब्रह्मपद व्योम नामके अक्षरतत्त्वके रूपमें, योगियोंके अमृतस्थानके रूपमें एवं ईश्वरसम्बन्धी परम आनन्दके रूपमें प्रसिद्ध है। इस स्थानको प्राप्त करनेवाला मुक्त आत्मा पुन: संसारमें नहीं आता है। अभी जिस मुत्तूत्माकी चर्चा की गयी है, उसको प्राप्त होनेवाली मुक्ति अष्टाङ्ग - मार्गका सम्यक् - ज्ञान रखनेसे प्राप्त होती है। अतः मैं संक्षेपमें उसे भी कह रहा हूँ। आप सुनें।
अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह - ये पाँच यम हैं। प्राणीकी हिंसा न करना अहिंसा है। प्राणियोंके हितमें बोलना सत्य है। दूसरेकी वस्तु अपहरण न करना अस्तेय है। अमैथुनका पालन करना ब्रह्मचर्य है और सब कुछ त्याग देना अपरिग्रह है।
शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय तथा प्रणिधान - ये पाँच नियम हैं। बाह्य और आभ्यन्तर रूपसे शौचके दो भेद हैं। इसी प्रकार संतोषको तुष्टि, इन्द्रिय-निग्रहको तप, मन्त्र-जपको स्वाध्याय और भगवत्पूजनादिको प्रणिधान कहते हैं।
(यमा: पञ्च त्वहिंसाद्या अहिंसा प्राण्यहिंसनम्॥
सत्यं भूतहितं वाक्यमस्तेयं स्वाग्रह परम्। अमैथुनं ब्रह्मचर्य सर्वत्यागोऽपरिग्रह:॥
नियमा: पञ्च सत्याद्या बाह्ममाभ्यन्तरं द्विधा। शौचं तुष्टिश्च संतोषस्तपश्चेन्द्रियनिग्रह:॥
स्वाध्याय: स्यान्मन्त्रजाप: प्रणिधानं हरेर्यजिः॥)
साधकके द्वारा पद्मादि प्रकारसे स्थित होना आसन कहा जाता है। वायुका निरोध करना प्राणायाम है। यह दो प्रकारका होता है। मन्त्रोच्चार करते हुए देवका ध्यान करना सगर्भ-प्राणायाम है। उसके विपरीत (अमन्त्रक, प्राणायाम) अगर्भ - प्राणायाम है। यह दो प्रकारका प्राणायाम प्रकारान्तरसे तीन प्रकारका कहा गया है। यथा-वायु अंदर खींचकर अवस्थित होना पूरक नामक प्राणायाम है। वायुको रोककर देहेन्द्रियोंको स्थिर करना कुम्भक और उस वायुको धीरे - धीरे बाहर निकालना रेचक नामक प्राणायाम है।
बारह मात्रावाला (प्रणवके जपकी प्रक्रियामें 'मात्रा' का विशेष महत्त्व है। उस मात्राके अनुसार बारह बार प्रणव - जपके साथ सम्पन्न प्राणायामको 'द्वादशमात्रिक', चौबीस बार प्रणव - जपके साथ सम्पन्न प्राणायामको 'चतुर्विशतिमात्रिक' और छत्तीस बार प्रणव - जपके साथ सम्पन्न प्राणायामको 'षट्त्रिंशन्मात्रिक' कहा जाता है। यहाँ प्रणवके स्थानपर बीजमन्त्र भी दिया जा सकता है।) प्राणायाम 'लघु' है। चौबीस मात्राका प्राणायाम 'मध्यम' तथा छत्तीस मात्रावाला प्राणायाम 'उत्तम' है।
अपने - अपने विषयोंसे असम्बद्ध इन्द्रियोंके द्वारा चित्तके स्वरूपमात्रका अनुकरण करना एक विशेष प्रकारका निरोध है और इसी निरोधको प्रत्याहार कहते हैं। ब्रह्मके साथ आत्माका अभेद चिन्तन करना (ब्रह्माकारवृत्तिका अखण्ड प्रवाह) ध्यान है। उस कालमें मनके द्वारा धैर्यका अवलम्बन करना (ध्येयमें चित्तकी निश्चलरूपमें स्थिति) धारणा है।
'अहं ब्रह्म' इस प्रकार अभेद ज्ञानके साथ ब्रह्मरूपमें अवस्थिति ही समाधि है। मैं आत्मा ही परमात्मा - परब्रह्म हूँ। वह परब्रह्म सत्यस्वरूप, ज्ञारूप और अनन्त है। वही ब्रह्म है। उसीको विज्ञान कहते हैं। वही आनन्दस्वरूप है, उसीका 'तत्त्वमसि' इस श्रुतिसे बोध कराया गया है। मैं ब्रह्म हूँ', 'मैं अशरीरी, इन्द्रियातीत हूँ, मन, बुद्धि, महत्तत्त्व, अहङ्करादिसे रहित, जाग्रतू, स्वप्न, सुषुप्ति आदि अवस्थाओंसे मुक्त जो ब्रह्मका तेज:स्वरूप है, मैं वही हूँ। नित्य शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सत्य, आनन्दस्वरूप, अद्वय कहा जानेवाला जो वह आदित्य पुरुष है, वही मैं पूर्ण पुरुष हूँ।' इस प्रकार ब्रह्मका ध्यान करता हुआ ब्राह्मण भवबन्धनसे मुक्त हो जाता है।