गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
19 - 20 - सर्पोके विष हरनेके उपाय तथा दुष्ट उपद्रवोंको दूर करनेके मन्त्र (प्राणेश्वरी विध्या)
श्री सूतजी बोले - हे ऋषियो! अब मैं शिव द्वारा पक्षिराज गरुडको सुनाये गये प्राणेश्वर महामन्त्रका वर्णन करता हूँ, किंतु उसके पूर्व उन स्थानोंका वर्णन करूँगा, जहाँ सर्पके काटनेसे प्राणी जीवित नहीं रह सकता।
श्मशान, वल्मीक (बाँबी), पर्वत, कुआँ और वृक्षके कोटर-इन स्थानोंमें स्थित सर्पके द्वारा काट लेनेपर यदि उस दाँत-लगे स्थानपर तीन प्रच्छन्न रेखाएँ बन जाती हैं तो वह प्राणी जीवित नहीं रहता है। षष्ठी तिथिमें, कर्क और मेष राशिमें आनेवाले नक्षत्रों तथा मूल, अश्लेषा, मघा आदि क्रूर नक्षत्रोंमें सर्पदंश होनेसे प्राणीका जीवन समाप्त हो जाता है तथा काँख, कटि, गला, सन्धि - स्थान, मस्तक या कनपटीके अस्थिभाग और उदरादिमें काटनेपर प्राणी जीवित नहीं रहता है।
यदि सर्पदंशके समय दण्डी, शस्त्रधारी, भिक्षु तथा नग्न प्राणीका दर्शन होता है तो उसे कालका ही दूत समझना चाहिये। हाथ, मुख, गर्दन और पीठमें सर्पके काटनेसे प्राणी जीवित नहीं बचता है।
दिनके प्रथम भागके पूर्व अर्ध यामका भोग सूर्य करता है। उस दिवाकर - भोगके पश्चात् गणनाक्रममें जो ग्रह आते हैं, उन ग्रहोंके द्वारा यथाक्रम शेष यामोंका भोग होता है। इस कालगतिमें प्रत्येक दिन छ: परिवर्तनोंके साथ अन्य शेष ग्रहोंका भोग माना गया है। यथा - ज्योतिषियोंने काल - चक्रके आधारपर रात्रिकालमें शेषनाग 'सूर्य', वासुकि नाग 'चन्द्र', तक्षक नाग मङ्गल', कर्कोटक नाग 'बुध, पद्म नाग 'गुरु', महापद्म नाग 'शुक्र', शंख नाग 'शनि' और कुलिक नाग 'राहु' को स्वीकार किया।
रात या दिनमें बृहस्पतिका भोगकाल आनेपर सर्प, देवोंका भी अन्त करनेवाला हो जाता है। अत: इस कालमें सर्पद्वारा काटा गया प्राणी बच नहीं सकता है। दिनमें शनि - ग्रहकी वेलाके आनेपर राहु अशुभ धर्मसे संयुक्त रहता है। अत: वह अपने यामार्ध भोग और सन्धि कालकी अवस्थितिमें काल अर्थात् यमराजकी गतिके समान गतिमान् रहता है।
रात्रि और दिनका मान लगभग तीस - तीस घटीका होता है। इस मानके अनुसार निर्मित काल चक्रमें चन्द्रमा प्रतिपदा तिथिको पादाङ्गुष्ठ , द्वितीयाको पैरसे ऊपर, तृतीयाकों गुल्फ, चतुर्थीको जानु, पञ्चमीको लिङ्ग, षष्ठीकों नाभि, सप्तमीको हृदय, अष्टमीको स्तन, नवमीको कण्ठ, दशमीको नासिका, एकादशीको नेत्र, द्वादशीको कान, त्रयोदशीको भौंह, चतुर्दशीको शंख अर्थात् कनपटी तथा पूर्णिमा एवं अमावस्याको मस्तक पर निवास करता है। पुरुषके दक्षिणाङ्गमे तथा स्त्रीके वामभागमें चन्द्रकी स्थिति होती है। चन्द्रकी स्थिति जिस अङ्ग मे होती है, उस अङ्गमें सर्पके डसनेपर प्राणी जीवित बच सकता है। यद्यपि सर्पदंशसे शरीरमें उत्पन्न हुई मूर्च्छा शीघ्र समाप्त होनेवाली नहीं है, फिर भी शरीर - मर्दनसे वह दूर हो सकती है।
स्फटिकके समान निर्मल 'ॐ हंसः' नामक बीजमन्त्र, साधकका परम मन्त्र है। विषरूपी पापको नष्ट करनेमें समर्थ इस बीज - मन्त्रका प्रयोग सर्पदंशसे मूर्च्छित प्राणीपर करना चाहिये। इसके चार प्रकार हैं। प्रथम मात्रा बीज बिन्दुसे युक्त है। दूसरा पाँच स्वरोंसे संयुक्त है। तीसरा छ: स्वरोंवाला और चौथा विसर्गयुक्त है। प्राचीन समयमें पक्षिराज गरुडने तीनों लोकोंकी रक्षाके लिये 'ॐ कुरु कुले स्वाह' इस महा मन्त्रको आत्मसात् किया था। अत: सर्प एवं सर्पिणियोंके विषको शान्त करनेके लिये इच्छुक व्यक्तिको मुखमें 'ॐ', कण्ठमें 'कुरु', दोनों गुल्फोंमें 'कुले' तथा दोनों पैरोंमें 'स्वाहा' मन्त्रका न्यास करना चाहिये। जिस घरमें उपर्युक्त मन्त्र भली प्रकारसे लिखा रहता है, सर्प उस घरको छोड़कर चले जाते हैं। जो मनुष्य एक हजार बार इस मन्त्रके जपसे अभिमन्त्रित सूत्रको कानपर धारण करता है, उसको सर्प - भय नहीं रहता। जिस घरमें इस मन्त्रसे अभिमन्त्रित शर्करा खण्ड फेंक दिये जाते हैं, उस घरको भी सर्प छोड़ देते हैं। देवताओं और असुरोंने इस मन्त्रका सात लाख जप करके सिद्धि प्राप्त की थी।
इसी प्रकार एक अष्टदल पद्मका रेखाङ्कनकर उसके प्रत्येक दलपर इस - 'ॐ सुवर्णरेखे कुक्कुटविग्रहरूपिणि स्वाहा'- मन्त्रके दो - दो वर्ण लिखे तथा 'ॐ पक्षि स्वाहा' - इस मन्त्रसे अभिमन्त्रित जलके द्वारा स्नान करानेसे विषविह्वल प्राणीका विष दूर हो जाता है।
'ॐ पक्षि स्वाहा' इस मन्त्रके द्वारा अङ्गुष्ठ - भागसे लेकर कनिष्ठा पर्यन्त करन्यास तथा मुख - हृदय - लिङ्ग और पैरोंमें अङ्गन्यास करे तो विषधर नाग ऐसे मनुष्यकी छायाको स्वप्नमें भी लाँघ नहीं सकता। जो मनुष्य इस मन्त्रका एक लाख जप करके सिद्धि प्राप्त कर लेता है, वह अपनी दृष्टिमात्रसे व्यथित व्यक्तिके शरीरमें व्याप्त विषको नष्ट कर देता है।
'ॐ ह्रीं ह्रैं ह्रीं भि(भी)रुण्डायै स्वाहा'- इस मन्त्रका जप सर्पदंशित व्यक्तिके कानमें करनेपर विषका प्रभाव क्षीण हो जाता है।
यदि दोनों पैरके अग्रभागमें 'अ आ', गुल्फमें 'इ ई' जानुमें 'उ ऊ', कटिमें 'ए ऐ', नाभिमें 'ओ', हृदयमें 'औ', मुखमें 'अं' तथा मस्तकमें 'अ:' वर्णका स्थापन कर 'ॐ हंस:' बीजमन्त्रके सहित न्यास करके साधक इस बीज मन्त्रका ध्यान - पूजन और जप करे तो वह सर्प - विषको दूर कर सकता है।
'मैं (स्वयं) गरुड हूँ' यह ध्यान (भावना) करके साधकको विष - शमनका कार्य करना चाहिये। 'हं' बीज मन्त्रका शरीरमें विन्यास विषादिका हरण करनेवाला कहा गया है। वाम हाथमें 'हंसः' मन्त्रका न्यास करके जों साधक इस मन्त्रका ध्यान - पूजन और जप करता है, वह सर्प - विषको दूर करनेमें समर्थ होता है; क्योंकि यह मन्त्र विषधर नागोंके नासिका भाग और मुँहकी श्वास- नलिकाको भी रोकनेमें पूर्ण समर्थ है। यह मन्त्र शरीरकी त्वचा - मांस आदिमें व्याप्त सर्प - विषको भी विनष्ट कर देता है।
सर्पदंशसे मूर्छित प्राणीके शरीरमें 'ॐ हंस:' मन्त्रका न्यास करके भगवान् नीलकण्ठ आदि देवोंका भी ध्यान करना चाहिये। ऐसा करनेसे यह मन्त्र अपनी वायु शक्तिके द्वारा उस सम्पूर्ण विषका हरण कर लेता है।
प्रत्यङि्गराकी जड़को चावलके जलके साथ पीसकर पीनेसे विषका प्रभाव दूर हो जाता है। पुनर्नवा, प्रियंगु, वक्त्रज(ब्राह्मी), श्वेत, बृहती, कूष्माण्ड, अपराजिताकी जड़, गेरू तथा कमलगट्टेके फलको जलमें पीसकर घृतके साथ लेप तैयार करना चाहिये, इस प्रकार बना हुआ लेप भी शरीरमें लगानेसे विषको शान्त कर देता है। सर्पके काटनेपर जो मनुष्य उष्ण (गरम) घृतका पान कर लेता है, उसके शरीरमें विषका अधिक प्रभाव नहीं बढ़ता। सर्पदंश होनेपर शिरीष नामक वृक्षके पञ्चाङ्ग (पत्र, पुष्प, फल, मूल एवं छाल)-के सहित गाजरके बीजोंको पीसकर सर्वाङ्गमें लेप करनेसे अथवा पीनेसे भी विषका प्रभाव समाप्त हो जाता है।
'ॐ ह्रीं' बीजमन्त्र, गोनस (गोहुअन) आदि विषैले सर्पोंके विषको दूर करनेमें समर्थ है। इस मन्त्रके साथ 'अः' - का प्रयोगकर अर्थात् 'ॐ ह्रीं अः' का उच्चारण करते हुए हृदय, ललाट आदिमें विन्यास करके उसका ध्यान करनेमात्रसे ही सर्पादिका वशीकरण हो जाता है। इसका पंद्रह हजार जप करके साधक गरुडके समान सर्वगामी, कवि - विद्वान, वेदविद् हो जाता है तथा दीर्घ आयुको प्राप्त करता है।
सूतजीने पुन: कहा - ऋषियो!अब मैं आप सभीको शिवके द्वारा कथित अत्यन्त गोपनीय मन्त्रोंको बताऊँगा; जिनसे अभिमन्त्रित पाश, धनुष, चक्र, मुद्रर, शूल और पट्टिश नामक आयुधोंको धारण करके राजा शत्रुओंपर भी विजय प्राप्त कर लेता है।
मन्त्रोद्वारके लिये कमल-पत्रपर अष्टवर्ग बनाकर पूर्व(दिशा) - से शुरू करके क्रमशः ईशान - कोणतक बीजमन्त्र (ॐ ह्रीं ह्रीं)- को लिखना चाहिये। 'ॐ'कार ब्रह्मबीज है, 'ह्रीं'कार विष्णु बीज है और 'ह्रीं'कार शिवबीज है। त्रिशूलके तीनों शीर्षपर 'ह्रीं' लिखकर क्रमानुसार न्यास करे। मन्त्र 'ॐ ह्रीं ह्रीं' है।
साधक हाथमें शूल ग्रहण करे। तत्पश्चात् उसको आकाशमें घुमाये, जिसे देखते ही दुष्ट ग्रह और सर्प नष्ट हो जाते हैं। साधक धूम्रवर्णके धनुषको हाथमें लेकर आकाशकी ओर भुजा उठाकर इस मन्त्रका चिन्तन करे। ऐसा करनेसे दुष्ट विषैले सर्प, कुत्सित ग्रह, विनाशकारी मेघ और राक्षस नष्ट होते हैं। यह मन्त्र तो त्रिलोककी रक्षा करनेमें समर्थ है, मृत्युलोकके विषयमें कहना ही क्या है?
'ॐ जूं सूं हूं फट्' यह दूसरा मन्त्र है। साधक खैरकी आठ लकड़ियोंको इसी मन्त्रसे अभिमन्त्रित कर उन्हें आठ दिशाओंमें गाड़ दे तो उस कीलािङ्कत क्षेत्रमें वज्रपात (विद्युत् - निपात) तथा इसकी गर्जनाका उपद्रव नहीं होता। गरुडद्वारा कहे गये इस मन्त्रसे आठ कीलोंको इक्कीस बार अभिमन्त्रितकर रात्रिके समय अपने अभीष्ट क्षेत्रकी चारों दिशाओं और विदिशाओंमें गाड़ देना चाहिये। इससे भी वहाँ विधयुत-निपात, वज्रपतन तथा चूहा, टिड्डी आदिसे होनेवाले उपद्रवोंका भय नहीं रहता।
'ॐ ह्रां सदाशिवाय नम:' ऐसा कहकर साधक तर्जनी अंगुलिके द्वारा अनार - पुष्पके सदृश कान्तिमान् एक पिण्डका निर्माण करे। उस पिण्डके प्रदर्शनमात्रसे ही दुष्ट जन, मेघ, विद्युत्, विष, राक्षस, भूत और डाकिनी आदि दसों दिशाओंको छोड़कर भाग जाते हैं।
'ॐ ह्रीं गणेशाय नम:।' 'ॐ ह्रीं स्तम्भनादिचक्राय नम:।'
'ॐ ऐ ब्राह्मयै त्रैलोक्यडामराय नमः।'
इस मन्त्र - संग्रहको भैरव - पिण्ड कहा जाता है। यह भैरव - पिण्ड विष तथा पापग्रहोंके कुप्रभावको समाप्त करनेमें समर्थ है। यह साधकके कार्यक्षेत्रकी रक्षा और भूत - राक्षसादिकी उपद्रवी शक्तियोंको नष्ट करता है।
'ॐ नमः' यह कहकर साधक अपने हाथमें इन्द्रवज्रका ध्यान करे। इस वज्र मुद्रासे विष, शत्रु और भूतगण विनष्ट हो जाते हैं। 'ॐ क्षुं (क्ष) नमः' इस मन्त्रसे बायें हाथमें पाशका स्मरण करे, जिससे विष तथा भूतादिका विनाश होता है। इसी प्रकार 'ॐ ह्रां (ह्रो) नमः' इस मन्त्रके उच्चारणसे उपद्रवकारी मेघ और पापग्रहोंके प्रभाव नष्ट हो जाते हैं। कृतान्त-यमराजका ध्यान करके साधक छेदक अस्त्र (भाले)-से शत्रु-समूहका विनाश करे। 'ॐ कक्ष्ण(क्ष्म)नम:' इस मन्त्रोच्चारके साथ कालभैरवका ध्यान करके मनुष्य पापग्रह, भूत, विषके प्रभावका शमन कर सकता है।
'ॐ लसद्द्विजिह्वाक्ष स्वाहा' इस मन्त्रका ध्यान करके मनुष्य खेती - वाड़ीमें विघ्न डालनेवाले ग्रह, भूत, विष और पक्षियोंका निवारण कर सकता है। 'ॐ क्ष्व(क्ष्णं)नमः' इस मन्त्रको रक्त -वर्णकी स्याहीसे नगाड़ेपर लिखकर उसे बजाना चाहिये। उसके शब्दोंको सुनकर पापग्रह आदि सभी उपद्रवकारी तत्त्व भयभीत हो उठते हैं।