200 - वायुजय - निरूपण

भेरवने कहा - हे देवि! अब मैं जय - पराजय तथा विदेश - यात्राके शुभाशुभ मुहूर्तका संकेत देनेवाले ‘वायुजय’ नामक विद्याका वर्णन करूँगा।

वायु, अग्नि, जल और इन्द्रको माङ्गलिक चतुष्टयके नामसे जाना जाता है। प्राय: प्राणीके शरीरमें वायु अधिकतर वाम और दक्षिणभागकी नाड़ियोंसे प्रवाहित होता है। अग्नि शरीरमें ऊर्ध्वगामी होता है और जल अधोगामी। महेन्द्र तत्त्व शरीरके मध्यभागमें स्थित रहता है, किंतु शुक्लपक्षमें वह वामभाग तथा कृष्णपक्षमें दक्षिण - भागकी नाड़ियोंसे होकर शरीरमें प्रवाहित होता है। प्रत्येक पक्षका प्रारम्भिक तीन - तीन दिन इसका उदयकाल है।

अर्थात्‌ शुक्लपक्षकी प्रतिपदासे लेकर तृतीया तिथितक जो वायु नासिकाके वाम छिद्रसे होकर प्रवहमान रहता है और कृष्णपक्षकी प्रतिपदा तिथिसे लेकर तृतीया तिथिपर्यन्त जो वायु नासिकाके दक्षिण छिद्रसे होकर प्रवहमान रहता है, वह उदयकालका वायु माना जाता है।

यदि इस नियमके अनुसार वायुका प्रवाह होता है तो अच्छा होता है, किंतु विपरीत होनेपर पतन होता है। यदि प्राणीके शरीरमें वायु सूर्यमार्गमें उदित होकर चन्द्रमार्गमें अस्त हो तो गुणोंमें वृद्धि होती है। इसके विपरीत होनेपर शरीरमें विघ्न होता है।

हे वरानने! दिन और रातमें सोलह संक्रान्तियाँ मानी गयी हैं। आधे - आधे प्रहरके बाद एक - एक संक्रान्तिका परिमाण है। इसी गतिसे शरीरमें प्रवहमान वायुका संक्रमण - काल आता है। जब वायु शरीरके अन्तर्गत आधे प्रहरके बाद ही संक्रान्त होने लगता है, अर्थात्‌ आधे - आधे प्रहरमें वायुका भ्रमण होता है, तो स्वास्थ्यकी हानि अवश्यम्भावी है। भोजन और मैथुनकालमें दाहिने नासापुटसे वायु भ्रमण करे तो हितकर होता है। इस स्थितिमें हाथमें तलवार लेकर योद्धा युद्धमें यथेच्छ शत्रुओंको जीत सकता है। समस्त कार्योंमें यदि वाम नासापुटसे वायुका भ्रमण हो तो प्रशनकर्ताका प्रश्न शुभकर तथा श्रेष्ठ माना गया है। वायुके महेन्द्र तथा वरुण (जल - तत्त्व) - में प्रवाहित होनेपर कोई भी दोष नहीं होता। दाहिनेसे प्रवाहित होनेपर अनावृष्टिका योग तथा बायेंसे प्रवाहित होनेपर वृष्टिका योग होता है।