231 - नृसिंहस्तोत्र तथा उसकी महिमा

सूतजीने कहा - हे शौनक! अब मैं भगवान्‌ शिवद्वारा कही गयी नारसिंह स्तुति (नृसिंह स्तोत्र) - का वर्णन करूँगा।

प्राचीन कालकी बात है, एक बार सभी मातृगणोंने भगवान्‌ शंकरसे कहा कि हे भगवन्‌! हम सब आपकी कृपासे देव, असुर और मनुष्य आदि जो इस संसारमें प्राणी हैं, उन सबको खायेंगे। हम सभीको आप इसके लिये आज्ञा प्रदान करें।

शंकरजीने कहा - हे मातृकाओ! आप सबके द्वारा संसारकी समस्त प्रजाकी रक्षा होनी चाहिये। इसलिये इस महाभयंकर पापसे आप लोग अपने - अपने मनको शीघ्र वापस कर लें।

भगवान्‌ शंकरके द्वारा ऐसा कहे जानेपर भी मातृकाएँ उनके वचनका अनादर करते हुए त्रिभुवनके समस्त चराचर प्राणियोंको खानेके लिये जुट गयीं। मातृकाओंके द्वारा त्रैलोक्यका भक्षण करते देखकर भगवान्‌ शिवने नृसिंहरूप उन श्रीविष्णु देवका इस रूपमें ध्यान किया - जो आदि - अन्तसे रहित एवं समस्त चराचर जगत्‌के कारण हैं, विद्युत्के समान लपलपाती हुई जिनकी जिह्वा है, जिनके बड़े - बड़े महा भयंकर दाँत हैं, जिनकी ग्रीवा देदीप्यमान केसरसे ( सिंहकी ग्रीवाके ऊपरी भागके केशसमूहको ‘केसर’ कहते हैं।) सुशोभित है, जो रत्नजटित अङ्गद एवं मुकुटसे सुशोभित हैं। जिनका शिरोभाग सोनेके समान दिखायी देनेवाली जटाओंसे युक्त है, जिनके कटि प्रदेशमें सोनेकी करधनी है, जो नील कमलके समान श्याम वर्णके हैं, जो रत्न खचित पायल धारण किये हुए हैं। जिनके तेजसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड व्याप्त है। जिनका शरीर आवर्ताकार रोम समूहसे युक्त है और जो देव श्रेष्ठतम पुष्पोंसे गूँथी गयी एक विशाल मालाको धारण किये हुए हैं। इस तरह भगवान्‌ रुद्रने भक्ति पूर्वक जिस रूपमें नारायणका ध्यान किया था, उसी रूपमें ध्यान करनेमात्रसे नृसिंहदेव श्रीविष्णुने उन्हें अपना दर्शन दिया। यह रूप देवताओंके द्वारा भी दुर्निरीक्ष्य था।

शिवने देवेश नृसिंहको प्रणाम करके उन्हें तुष्ट किया और वे इस प्रकार उनकी स्तुति करने लगे। शंकरजीने कहा -

नमस्तेऽस्तु जगन्नाथ नरसिंहवपुर्धर।

दैत्येश्वरेन्द्रसंहारिनखशुक्तिविराजित॥

नखमण्डलसंभिन्नहेमपिङ्गलविग्रह।

नमोऽस्तु पद्मनाभाय शोभनाय जगद्गुरो।

कल्पान्ताम्भोदनिर्घोष सूर्यकोटिसमप्रभ॥

सहस्रयमसंत्रास सहस्रेन्द्रपराक्रम।

सहस्त्रधनदस्फीत सहस्त्रचरणात्मक॥

सहस्रचन्द्रप्रतिम सहस्त्रांशहरिक्रम।

सहस्ररुद्रतेजस्क सहस्रब्रह्मसंस्तुत॥

सहस्ररुद्रसंजप्त सहस्राक्षनिरीक्षण।

सहस्रजन्ममथन सहस्रबन्धमोचन।

सहस्रवायुवेगाक्ष सहस्राज्ञकृपाकर॥

हे समस्त संसारके स्वामी! हे नृसिंह रूपधारिन्‌! हे दैत्यराज हिरण्यकशिपुके वक्ष:स्थलको विदीर्ण करनेवाले! शुक्तियोंक समान चमकीले नाखूनोंसे सुशोभित देव! आपको नमस्कार है। हे नख मण्डलकी कान्तिसे मिश्रित सुवर्णके समान देदीप्यमान शरीरवाले! हे जगद्वन्द्य! हे शोभा सम्पन्न भगवान्‌ पद्मनाभ! प्रलयकालीन मेघके सदृश गर्जना करनेवाले, करोड़ों सूर्यके समान प्रभासम्पन्न देव! आपको नमन है। दुष्ट पापियोंको हजारों यमराजके समान भयभीत करनेवाले! हजारों इन्द्रकी शक्ति अपनेमें संनिहित रखनेवाले! हजारों कुबेरके सदृश धनसम्पन्न! हजारों चरणसे युक्त हे देव! आपको नमस्कार है। हजारों चन्द्रके समान शीतल कान्तिवाले! हजारों सूर्यके सदृश पराक्रमशाली! हजारों रुद्रकी भाँति तेजस्वी! हजारों ब्रह्यासे स्तुत्य हे देव! आपको मेरा नमन है। हजारों रुद्र देवताओंके द्वारा मन्त्ररूपमें जप करने योग्य महामहिम! इन्द्रके हजारों नेत्रोंसे देखे जानेवाले! हजारों जन्मके पाप - पुण्योंका मन्‍थन करेवाले! संसारके हजारों जीवोंका बन्धन काटकर उन्हें मुक्त करनेवाले! हजारों वायुदेवोंके समान वेगवान्‌ और हजारों मूर्ख प्राणियोंपर कृपा करनेवाले हे दयानिधान! आपको मेरा नमस्कार है।

इस प्रकार नृसिंह रूपधारी देवदेवेश्वर भगवान्‌ हरिकी स्तुति करके विनम्रतापूर्वक शिवने पुनःउनसे कहा - हे देवदेवेश्वर! अन्धकासुरका विनाश करनेके लिये जिन मातृकाओंकी सृष्टि मैंने की थी, वे तो मेरे ही वचनकी अवहेलना करके संसारकी विविध प्रजाओंका भक्षण कर रही हैं। मातृकाओंकी सृष्टि करके तो अब स्वयं मैं इनका संहार करनेमें असमर्थ हूँ। पहले इनकी सृष्टि की, अब कैसे इनका विनाश करूँ? यह मुझे अच्छा नहीं लग रहा है।

रुद्रके ऐसा कहनेपर नृसिंह रूपधारी भगवान्‌ हरिने उसी समय अपनी जिह्वाके अग्रभागसे हजारों देवियोंको उत्पन्न करके उन्हींके द्वारा देवता, असुर और मनुष्य आदिका संहार करनेवाली क्रुद्ध मातृकाओंका विनाश कर संसारका कल्याण किया। तदनन्तर वे हरि अन्तर्धान हो गये।

जो मनुष्य नियम पूर्वक इस नारसिंह स्तोत्रका जितेन्द्रिय होकर पाठ करता है, निश्चित ही भगवान्‌ हरि उसके समस्त मनोरथको वैसे ही पूर्ण करते हैं जैसे उन्होंने शिवके मनोरथको पूर्ण किया था।

मध्याह्न कालीन प्रचण्ड सूर्यके समान तेजस्वी नेत्रोंवाले, श्वेत वर्णके कमलमें स्थित, प्रज्वलित अग्निके सदृश भयंकर, अनादि, मध्य और अन्तसे रहित पुराण पुरुष, परात्पर, जगदाधार भगवान्‌ नृसिंहका ध्यान करना चाहिये -

ध्यायेन्नृसिंहं तरुणार्कनेत्रं सिताम्बुजातं ज्वलिताग्निववक्त्रम्‌।

अनादिमध्यान्तमजं पुराणं परात्परेशं जगतां निधानम्‌॥

जो मनुष्य इस स्तोत्रका निरन्तर जप करता है, उसके दुःख समूहको श्रीनृसिंह उसी प्रकार नष्ट कर देते हैं जिस प्रकार अंशुमाली सूर्य कुहरेकी राशिको अपने सामनेसे हटा देते हैं। जब साधक कल्याणकारी मातृवर्गसे युक्त नृसिंह देवकी मूर्तिका निर्माण करके उनकी पूजा करता है, तब वह सदैव उन परात्पर देवके समीपमें ही रहता है। त्रिपुरारि शिवने भी तो उन्हीं देवदेवेश्वर नृसिंह मूर्ति भगवान्‌ हरिकी पूजा की थी। उन्हीं देवको प्रसन्न करके श्रीशिवजीने वर प्राप्त किया और मातृकाओंसे संसारकी रक्षा की।