गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
115 - नीतिसार
सूतजीने कहा - मनुष्यको गुणहीन पन्ती, दुष्ट मित्र, दुराचारी राजा, कुपुत्र, गुणहीन कन्या औरन् कुत्सित देशका परित्याग दूरसे ही कर देना चाहिये।
कलियुगमें धर्म समाजसे निकल जाता है, तपमें स्थिरता नहीं रहती, सत्य प्राणियोंके हृदयसे दूर हो जाता है, पृथिवी वन्ध्या होकर फलहीन हो जाती है, मनुष्य कपट-व्यवहार करने लगते हैं, ब्राह्मणोंमें लालच आ जाता है, पुरुषजन स्त्रीके वशीभूत हो जाते हैं, स्त्रियाँ चंचल हो उठती हैं और नीच प्रवृत्तिक लोग ऊँचे पदोंपर आरूढ़ हो जाते हैं। अत: इस कलिकालमें जीवित रहना निश्चित ही बहुत कष्टसाध्य है। जो प्राणी मर गये हैं, वे ही धन्य हैं। वे लोग धन्य हैं जो राज्यानुशासनसे टूट रहे देश, विनष्ट होते हुए कुल, परासक्त पत्नी तथा दुराचरणमें आसक्त पुत्रको नहीं देखते हैं।
कुपुत्रके होनेपर मनुष्यकों सुख - शान्ति नहीं मिलती है। दुराचारिणी पत्नीमें प्रेम कहाँ है? दुर्जन मित्र विश्वासके योग्य नहीं होता है और राज्यके कुशासनमें जीवित रहना सम्भव नहीं है। दूसरेका अन्न, दूसरेका धन, दूसरेकी शय्या, दूसरेकी स्त्रीका सेवन और दूसरेके घरमें निवास करना - ये सब कृत्य इन्द्रके भी ऐश्वर्यको समाप्त कर देते हैं।
(परान्नं च परस्वं च परशय्या: परस्त्रिय:।
परवेश्मनि वासश्च शक्रादपि हरेच्छीयम्॥)
पापी पुरुषसे वार्तालाप करनेसे, उसके शरीरको स्पर्श करनेसे, संसर्गसे, सहभोजनसे, एक आसनपर बैठनेसे, एक शय्यापर शयन करनेसे एवं एक यानसे गमन करनेपर पापीका पाप दूसरे पुरुषमें संक्रमण कर जाता है स्त्रियाँ रूपसे नष्ट हो जाती हैं। क्रोधसे तपस्या विनष्ट हो जाती है। दूरतक भ्रमण करनेसे गायें नष्ट हो जाती हैं और शूद्राननसे श्रेष्ठ ब्राह्मण नष्ट हो जाता है।
(स्त्रियो नश्यन्ति रूपेण तप: क्रोधेन नश्यति।
गावो दूरप्रचारेण शुद्रान्नेन द्विजोत्तम:॥)
पापीके साथ एक आसनपर बैठनेसे, एक शय्यापर शयन करनेसे, पंक्तिमें एक साथ भोजन करनेसे मनुष्यमें पापका संक्रमण वैसे ही होता है जैसे एक घड़ेका जल दूसरे घड़ेमें प्रविष्ट हो जाता है।
दुलारमें बहुत - से दोष हैं और ताडनामें बहुत - से गुण हैं। अतः शिष्य एवं पुत्रको अनुशासित रखना चाहिये, उन्हें केवल दुलार देना उचित नहीं है।
अधिक पैदल चलना प्राणियोंके लिये बुढ़ापा है। पर्वतोंका जल उसकी वृद्धावस्था है। सम्भोगकी अप्राप्ति स्त्रियोंके लिये वृद्धावस्था है और सदैव धूपमें रहना वस्त्रोंकी जीर्णता है।
नीच व्यक्ति दूसरेसे कलहकी इच्छा करते हैं। मध्यमार्गी दूसरेसे संधि चाहते हैं तथा उत्तम प्रकृतिके व्यक्ति दूसरेसे सम्मानकी अभिलाषा रखते हैं; क्योंकि महापुरुषोंका धन मान ही है। मान ही अर्थका मूल है। यदि सम्मान है तो धनकी क्या आवश्यकता है? मान और दर्पके नष्ट हो जानेपर धनसे और जीवनसे मनुष्यको क्या लाभ? मान तथा स्वाभिमानके विनष्ट हो जानेके पश्चात् प्राणीको धन एवं आयुसे क्या लेना - देना रह जाता है?
नीच प्रकृतिवाले पुरुष धन चाहते हैं। मध्यम प्रकृतिवाले धन और मानकी अभिरुचि रखते हैं तथा उत्तम प्रकृतिवाले मात्र सम्मानकी इच्छा करते हैं; क्योंकि श्रेष्ठनोंका मान ही धन है -
अधमा धनमिच्छन्ति धनमानौ हि मध्यमा:।
उत्तमा मानमिच्छन्ति मानो हि महतां धनम्॥
वनमें भूखे सिंह किसी दूसरेके द्वारा प्राप्त किये गये मांसको देखनेके लिये भी नहीं झुकते हैं। उत्तम कुलमें उत्पन्न व्यक्ति धनहीन होनेपर भी नीच कर्म नहीं करते। वनमें सिंहका अभिषेक नहीं होता है और न तो उसका कोई संस्कार ही होता है, किंतु नित्य सम्यक् पुरुषार्थको करनेसे प्राणीमें स्वयं ही सिंहत्वका भाव आ जाता है -
नाभिषेको न संस्कार: सिंहस्य क्रियते वने।
नित्यमूर्जितसत्त्वस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता॥
प्रमादी वणिकू, अभिमानी भृत्य, विलासी भिक्षु, निर्धन कामी तथा कटुभाषिणी वेश्या अपने कार्यमें असफल रहते हैं। दरिद्र होकर दाता होना, धनवान् होनेपर कृपण रहना, पुत्रका आज्ञाकारी न होना और दुष्टजनोंकी सेवामें संलग्न होना तथा दूसरेका अहित करते हुए मृत्युको प्राप्त हो जाना - ये पाँच कर्म मानवके दुश्चरित हैं। पत्नी - वियोग, स्वजनोंके द्वारा अपमान, शेष ऋण, दुर्जनसेवा तथा दरिद्रताके कारण मित्रोंकी विमुखता - ये पाँच बातें मनुष्यको बिना अग्निके ही जलाती हैं।
(दाता दरिद्र: कृपणोऽर्थयुक्त: पुत्रोऽविधेयः कुजनस्थ सेवा।
परापकारेषु नरस्य मृत्यु: प्रजायते दुश्चरितानि पञ्च॥
कान्तावियोग: स्वजनापमानं ऋणस्य शेष: कुजनस्य सेवा।
दारिद्र्यभावाद्विमुखाश्च मित्रा विनाग्निना पञ्च दहन्ति तीव्रा:॥)
मनुष्यको हजारों चिन्ताएँ होती हैं, किंतु उन चिन्ताओंके मध्य चार चिन्ताएँ ऐसी हैं जो तलवारकी धारके समान अत्यन्त तीक्ष्ण हैं, यथा - नीच व्यक्तिसे प्राप्त अपमानकी चिन्ता, भूखसे पीड़ित पत्नीकी चिन्ता, नुणगहीन भार्याकी चिन्ता तथा कार्यमें स्वाभाविक रूपसे उत्पन्न अवरोधकी चिन्ता।
ये मनुष्यके मर्मस्थलपर तलवारकी धारके समान कष्ट पहुँचाती हैं। अनुकूल पुत्र, अर्थकरी विद्या, आरोग्य शरीर, सत्संगति तथा मनोऽनुकूल वशवर्तिनी पत्नी - ये पाँच पुरुषके दुःखको समूल नष्ट करनेमें समर्थ हैं।
(वश्यश्च पुत्रोऽर्थकरी च विद्या अरोगिता सज्जनसङ्गतिश्च।
इष्टा च भार्या वशवर्तिनी च दुःखस्य मूलोद्धरणानि पञ्च॥)
मृग, हाथी, कीट, भ्रमर और मत्स्य - ये पाँच क्रमश: शब्द, स्पर्श, रूप, गन्ध और रस - इन पाँचों प्रमादी विषयोंमें एक - एकका सेवन करनेपर ही नष्ट हो जाते हैं, परंतु जो मनुष्य पाँचों विषयोंका पाँचों इन्द्रियोंसे सेवन करता है, तो वह क्यों नहीं मारा जायगा -
कुरङ्गमातङ्गपतङ्गभृङ्ग - मीना हता: पञ्चभिरेव पञ्च।
एक: प्रमादी स कथं न घात्यो यः सेवते पञ्चभिरेव पञ्च॥
धैर्यरहित, रूक्ष स्वभाववाले, गतिहीन, मलिन वस्त्राच्छादित और अनाहूत (बिना बुलाये सभा - उत्सवादिमें उपस्थित होनेवाले )- ये पाँच प्रकारके ब्राह्मण बृहस्पतिके समान होनेपर भी पूजे नहीं जाते हैं। आयु, कर्म, धन, विद्या और मृत्यु - ये पाँच जन्मसे ही सुनिश्चित रहते हैं -
आयु: कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च।
पञ्चैतानि विविच्यन्ते जायमानस्य देहिनः॥
मेघकी छाया, दुष्टका प्रेम, परनारीका साथ यौवन और धन - ये पाँच अस्थिर हैं। संसारमें प्राणीका जीवित रहना अस्थिर है, उसका धन और यौवन अस्थिर है तथा उसके स्त्री - पुत्र आदि अस्थिर हैं, किंतु उसका धर्म, कीर्ति और यश चिरस्थायी होता है -
अभ्रच्छाया खले प्रीति: परनारीषु संगति:।
पञ्चैते ह्यास्थिरा भावा यौवनानि धनानि च॥
अस्थिरं जीवितं लोके अस्थिरं धनयौवनम्।
अस्थिरं पुत्रदाराद्यं धर्म: कीर्तियश: स्थिरम्॥
सौ वर्षका जीवन भी बहुत कम है, क्योंकि परिमित आयुका आधा भाग रात्रियोंमें ही व्यतीत हो जाता है। शेष बचेस हुए समयका आधा भाग व्याधि, दुःख तथा वृद्धावस्थामें निष्क्रियताके कारण व्यतीत हो जाता है। मनुष्यकी आयु सौ वर्ष मानी गयी है। आयुका आधा भाग सत्रियोंमें ही समाप्त हो जाता है। उसकी शेष आधी ही आयु बचती है, जिसमेंसे आधेसे कुछ अधिक भाग बाल्यावस्थामें बीत जाता है, कुछ भाग परिजनोंके वियोग, उनकी दु:खदायी मृत्युसे प्राप्त कष्ट तथा राजसेवामें चला जाता है। इसके बाद जो आयुका शेष भाग बचता भी है, वह जलतरंगके समान चंचल होनेके कारण बीचमें ही विनष्ट हो जाता है। अत: लोगोंको मानसे क्या लाभ हो सकता है?
मृत्यु दिन - रात वृद्धावस्थाके रूपमें लोकमें विचरण करती रहती है। वह प्राणियोंको वैसे ही अपना ग्रास बनाती है, जैसे सर्प वायुका ग्रास करता है।
चलते हुए, रुकते हुए, जागते हुए और सोते हुए भी व्यक्ति यदि सभी प्राणियोंके हितके लिये चेष्टा नहीं करता है तो उसकी समस्त चेष्टा पशुवत् ही है।
(गच्छतस्तिष्ठतो वापि जाग्रतः स्वपतो न चेत्।
सर्वसत्त्वहितार्थाय पशोरिव विचेष्ठितम्॥)
हित और अहितके विचारसे शून्य बुद्धिवाले, वेद - पुराण तथा शास्त्रोंकी चर्चाके समय अत्यधिक तर्क - वितर्क करनेवाले एवं उदरपूर्तिमात्रमें संतुष्ट बुद्धिवाले पुरुष और पशुके बीच कौन ऐसा वैशिष्टय है जिसके अनुसार उन दोनोंमें अन्तर स्पष्ट किया जा सके?
पराक्रम, तप, दान, विद्या तथा अर्थ - लाभमें जिस मनुष्यकी कीर्ति संसारमें प्रसिद्ध नहीं हुई, वह माताके द्वारा परित्याग किये गये मलके समान ही है। विज्ञान, पराक्रम, यश और अक्षुण्ण सम्मानसे युक्त होकर क्षणमात्र भी जो मनुष्य जीवन धारण करता है, विज्ञ लोग उसीके जीवनको जीवन मानते हैं। वैसे तो कौआ भी बहुत समयतक बलि - भक्षण करते हुए जीवित रहता ही है। धन - मानसे रहित जीवनसे क्या लाभ? भयसे सशंकित मित्रसे क्या हो सकता है? [इसलिये] विषादका परित्यागकर सिंहव्रत अर्थात् पराक्रमका आचरण करना चाहिये। अन्यथा कौआ भी तो बलिका भक्षण करते हुए बहुत समयतक जीवित रहता ही है। जो मनुष्य इस संसारमें अपने प्रति तथा गुरु, नौकर - चाकर और दीन - दुःखीके प्रति दयाभाव नहीं रखता है और मित्रके कार्यमें सहयोग नहीं करता है, मनुष्यलोकमें उसके जीवित रहनेसे क्या लाभ? अरे, कौआ भी बहुत समयतक जीवित रहता है और मनुष्योंके द्वारा दिये गये बलिभागके अन्नको ही जीवनभर खाता हैं।
(यो वात्मनीह न गुरौ न च भृत्यवर्गे दीने दयां न कुरुते न च मित्रकार्ये।
किं तस्य जीवितफलेन मनुष्यलोके काकोऽपि जीवति चिरं च बलिं च भुङ्के॥)
धर्म, अर्थ और काम - इस त्रिवर्गकी क्रियासे रहित जिस मनुष्यके दिन आते हैं और चले जाते हैं, ऐसा व्यक्ति लुहारकी धौंकनीके समान ही है, जो कि श्वास लेते हुए भी जीवित नहीं है।
स्वाधीन रहकर आचरण करनेवाले मनुष्यका जीवन सफल है। पराधीन रहकर जीवन व्यतीत करनेवालेका जीवन तो व्यर्थ है। जो परतन्त्र रहकर जीवन - यापन करते हैं, वे तो जीवित रहते हुए भी मरेके समान हैं।
(स्वाधीनवृत्ते: साफल्यं न पराधीनवर्त्तिता।
ये पराधीनकर्माणो जीवन्तोऽपि च ते मृता:॥)
आकाशमें घिरे हुए बादलोंकी छाया, तिनकेसे आग, नीचकी सेवा, मार्गमें दृष्टिगोचर हुआ जल, वेश्याका प्रेम और दुष्टके अन्त:करणमें उत्पन्न हुई प्रीति - ये छः जलमें उठने और तत्काल विलुप्त होनेवाले बुलबुलेके सदृश ही क्षणभंगुर होते हैं -
अभ्रच्छाया तृणादग्निर्नीचसेवा पथो जलम्।
वेश्याराग: खले प्रीति: षडेते बुद्बुदोपमा:॥
केवल वाणीके द्वारा किये गये हित - सम्पादनसे मनुष्यको सुख नहीं प्राप्त होता। जीवनका मूल तो मान है। मानके नष्ट हो जानेपर मनुष्यके लिये सुख कहाँ होता है?
निर्बलका बल राजा है, बालकका बल रोना है, मूर्खका बल मौन धारण कर लेना है और चोरका बल असत्य है ।
(अबलस्य बलं राजा बालस्य रुदितं बलम्।
बलं मूर्खस्य मौनं हि तस्करस्यानृतं बलमू॥)
मनुष्य जैसे - जैसे शास्त्र - ज्ञान प्राप्त करता जाता है, वैसे - वैसे उसकी बुद्धि बढ़ती रहती है और विज्ञान प्राप्त करनेमें रुचि होती जाती है। मनुष्य जैसे-जैसे जनकल्याणमें अपनी बुद्धिको संयुक्त करता है, बैसे-वैसे ही वह सर्वत्र सभीका प्रिय पात्र बन जाता है -
यथा यथा हि पुरुष: शास्त्रं समधिगच्छति।
तथा तथास्य मेथा स्याद्विज्ञानं चास्य रोचते॥
यथा यथा हि पुरुष: कल्याणे कुरुते मतिम्।
तथा तथा हि सर्वत्र श्लिष्यते लोकसुप्रिय:॥
लोभ, प्रमाद और विश्वास - इन तीनके कारण व्यक्तिका विनाश होता है। अतएव प्राणीको लोभ, प्रमाद और विश्वास नहीं करना चाहिये। मनुष्यको भयसे उसी समयतक भयभीत रहना चाहिये, जिस समयतक उसका आगमन नहीं हो जाता। तीव्र भयके उपस्थित हो जानेपर तो उसे निर्भीक होकर उसका सामना करना चाहिये।
(तावद्भयस्थ भेतव्यं यावद्भयमनागतम्।
उत्पन्ने तु भये तीव्रे स्थातव्यं वै ह्यभीतवत्॥)
ऋण, अग्नि तथा व्याधिके शेष रहनेपर वे बार - बार बढ़ते जाते हैं। अत: उनका शेष रखना उचित नहीं है -
ऋणशेषं चाग्निशेषं व्याधिशेषं तथैव च।
पुनःपुनः प्रवर्धन्ते तस्माच्छेषं न कारयेतू॥
परोक्ष - रूपमें कार्यको नष्ट करनेवाले तथा सामने मधुर बोलनेवाले मित्रका, मायावी शत्रुकी भाँति परित्याग कर देना चाहिये-
परोक्षे कार्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम्।
वर्जयेत् तादृशं मित्र मायामयमरिं तथा॥
दुष्टका साथ करनेसे सज्जन मनुष्य भी विनष्ट हो जाता है, क्योंकि सुन्दर - स्वच्छ पेय जल कीचड़के मिल जानेसे दूषित हो जाता है-
दुर्जनस्य हि संगेन सुजनोऽपि विनश्यति।
प्रसन्नमपि पानीयं कर्दमै: कलुषीकृतम्॥
जिस व्यक्तिका धन ब्राह्मणके लिये [समर्पित] होता है, वही [धनका] सम्यक् उपभोग करता है। इसलिये सभी प्रकारसे प्रयत्नपूर्वक द्विजकी पूजा करनी चाहिये। जो द्विजके उपभोगसे बचे हुए पदार्थोंका उपभोग करता है, वही उत्तम भोजन है। जो पाप नहीं करता, वही बुद्धिमान् है। जो पीठ- पीछे हित - सम्पादन किया जाता है, वही मित्र - भाव है और जो दिखावेके बिना (दम्भरहित) धर्म किया जाता है, वही वास्तविक धर्माचरण है।
(तद्भज्यते यद्दिजभुक्तशेषं स बुद्धिमान् यो न करोति पापम्।
तत्सौहृदं यत्क्रियते परोक्षे दम्भैर्विना यः क्रियते स धर्म:॥)
वह सभा सभा नहीं होती, जिसमें वृद्ध जन नहीं होते। वे [वृद्ध] वृद्ध नहीं माने जाते, जो धर्मका उपदेश नहीं देते। वह [ धर्म] धर्म नहीं है, जिसमें सत्यका वास नहीं होता। वह [सत्य] सत्य नहीं है, जो कपटसे अनुप्राणित रहता है-
न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धा: वृद्धा न ते ये न बदन्ति धर्मम्।
धर्म: स नो यत्र न सत्यमस्ति नैतत् सत्यं यच्छलेनानुविद्धम्॥
मनुष्योंमें ब्राह्मण, तेजमें आदित्य, शरीरमें सिर और त्रतोंमें सत्य ही श्रेष्ठतम व्रत है।
जहाँ मनको प्रसन्नताकी प्राप्ति हो, वहीं प्राणीका मङ्गल है। दूसरेकी सेवामें समर्पित जीवन ही यथार्थ जीवन है। जो उपार्जित धन स्वजनोंके द्वारा उपभोग्य है, वही धन सार्थक है। युद्धभूमिमें शत्रुके सामने की गयी गर्जना ही वास्तविक गर्जना है। स्त्री वही श्रेष्ठ है, जो मदोन्मत्त नहीं हो। तृष्णारहित व्यक्ति ही सुखी होता है। जिसपर विश्वास किया जाय, वही मित्र है और जो जितेन्द्रिय होता है, वही वास्तविक पुरुष है।
राज्यका ऐश्वर्य क्रुद्ध ब्राह्मणके शापसे विनष्ट हो जाता है, ब्राह्मणका तेज पापाचार करनेसे नष्ट हो जाता है, अशिक्षित गाँवमें निवास करनेसे ब्राह्मणका सदाचार समाप्त हो जाता है और दुष्ट स्त्रियोंक साहचर्यसे कुलका विनाश हो जाता है। सभी संग्रहोंका अन्त क्षय है और सभी उत्कर्षोका अन्त पतन है। संयोगका अन्त वियोग है और जीवनका अन्त मरण है।
मनुष्यको राजासे रहित राज्यमें और बहुत राजाओंवाले राज्यमें निवास नहीं करना चाहिये। इसी प्रकार जहाँ स्त्रीका नेतृत्व हो या बालनेतृत्व हो वहाँ भी निवास करना अच्छा नहीं होता।
कौमार्य - अवस्थामें स्त्रीकी रक्षा पिता करता है, युवावस्थामें उसकी रक्षाका भार पतिपर होता है, वृद्धावस्थामें उसकी रक्षाका भार पुत्र उठाता है।
स्त्री स्वतन्त्र रहने योग्य नहीं है।
(पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने।
पुत्रस्तु स्थविरे काले न स्त्री स्वातन्त्रयमहति॥)
अर्थके लिये आतुर मनुष्यका न कोई मित्र है और न कोई बन्धु। कामातुर व्यक्तिके लिये न भय है और न लज्जा ही। चिन्तासे ग्रस्त प्राणीके लिये न सुख है और न नींद ही तथा भूखसे पीड़ित मनुष्यके शरीरमें न बल ही रहता है और न तेज ही रह जाता है-
अर्थातुराणां न सुहृन्न बन्धु: कामातुराणां न भयं न लज्जा।
चिन्तातुराणां न सुखं न निद्रा क्षुधातुराणां न बलं न तेज:॥
दरिद्र तथा दूसरेके द्वारा प्रेषित दूत, पर - नारीमें आसक्त तथा दूसरेके धन - अपहरणमें लगे हुए व्यक्तिको नींद कहाँ आती है?
(कुतो निद्रा दरिद्रस्थ परप्रेष्यवरस्य च।
परनारीप्रसक्तस्य परद्रव्यहरस्य च॥)
जो मनुष्य ऋणरहित और रोगमुक्त होता है, वही सुखपूर्वक निद्राका उपभोग करता है। इनके अतिरिक्त वह व्यक्ति भी निद्राका सुख प्राप्त करनेमें सफल होता है, जो स्त्रियोंके संसर्गसे दूर रहता है।
जलके परिमाणके अनुसार ही कमलनाल भी ऊपरकी ओर उठता जाता है और अपने स्वामीके बलके अनुसार भृत्य भी गर्वोन्नत हो जाता है। अपने स्थान जलाशयमें स्थित रहनेपर वरुणदेव एवं सूर्यनारायण कमलके साथ मैत्रीपूर्ण व्यवहार करते हैं, किंतु उस स्थानसे च्युत होनेपर उसी कमलके साथ वे जलासक्त और शोषणका व्यवहार करके कष्ट पहुँचाते हैं। पदासीन रहनेपर जो जिसके मित्र होते हैं, वे पदसे विमुक्त होनेपर वैसे ही शत्रु हो जाते हैं जैसे जलमें कमलके विद्यमान रहनेपर सूर्यकी प्रीति उसके साथ रहती है, किंतु उस जलसे उसको तोड़कर स्थलभागमें लानेपर वही सूर्य उसका शोषण करने लगता है।
अपने स्थान या पदपर अवस्थित रहनेपर ही मनुष्यकी पूजा होती है। स्थान और पदसे च्युत होनेपर उसकी उसी प्रकार पूजा नहीं होती, जिस प्रकार शरीरसे पृथक् होनेपर केश, दाँत और नख शोभित नहीं होते -
स्थानस्थितानि पूज्यन्ते पूज्यन्ते च पदे स्थिता:।
स्थानभ्रष्टा न पूज्यन्ते केशा दन्ता नखा नरा:॥
आचारको देखकर कुलका ज्ञान होता है। भाषाको सुनकर देशका ज्ञान होता है। सम्भ्रमसे स्नेह प्रकट होता है और शरीरको देखकर भोजनका ज्ञान (अनुमान) होता है।
(आचार: कुलमाख्याति देशमाख्याति भाषितम्।
सम्भ्रम: स्नेहमाख्याति वपुराख्याति भोजनम्॥)
समुद्रमें वर्षा होना व्यर्थ है। तृप्त हुए प्राणीके लिये भोजनका आग्रह व्यर्थ है। समृद्धको दान देना व्यर्थ है तथा नीचके लिये किया गया सुकृत व्यर्थ है। जो प्राणी जिसके हृदयमें अवस्थित है, वह दूरदेशमें रहते हुए भी उसके संनिकट ही विद्यमान रहता है और जो प्राणी हृदयसे ही निकल चुका है, वह समीपमें ही रहते हुए भी दूरदेशमें निवास करनेवालेके समान है
(दूरस्थोऽपि समीपस्थो यो यस्य हृदये स्थित:।
हृदयादपि निष्क्रान्त: समीपस्थोऽपि दूरतः॥)
मुखकी विकृति, स्वरभंग, दैन्यभाव, पसीनेसे लथपथ शरीर तथा अत्यन्त भयके चिह्न प्राणीमें मृत्युके समय उपस्थित होते हैं, किंतु ये ही चिह्न याचकके जीवित शरीरपर भी दिखायी देते रहते हैं।
कुब्ज होना, कृमिदोषसे पीड़ित रहना, वायुविकारसे ग्रस्त होना, देश, राज्य या गृहसे निष्कासित हो जाना तथा पर्वतके शिखर- भागमें रहना अच्छा है, किंतु याचनाकी वृत्तिको स्वीकार करना उचित नहीं है। संसारके स्वामी होनेपर भी भगवान् विष्णु बलिके यहाँ याचना करके वामन (बौने) हो गये थे। उनसे बढ़कर और कौन ऐसा है, जो याचक होकर लघुताको प्राप्त नहीं होगा?
(जगत्पतिर्हि याचित्वा विष्णुर्वामनतां यत:।
कोऽन्योऽधिकतरस्तस्य योऽर्थी याति न लाघवम्॥)
वे माता - पिता उस बालकके शत्रु होते हैं, जिन्होंने उसे विद्याध्ययन नहीं कराया है। सभाके मध्य मूर्ख वैसे ही शोभा प्राप्त करनेमें सफल नहीं होता, जैसे हंस - समुदायके मध्य बगुला सुशोभित नहीं होता।
विद्या कुरूप व्यक्तिके लिये भी रूप है। विद्या अत्यधिक गुप्त धन है। विद्या प्राणीको साधुवृत्तिवाला तथा सभी लोगोंका प्रियपात्र बना देती है। वह गुरुओंकी भी गुरु है। विद्या बन्धु - बान्धवोंके कष्टोंको दूर करनेवाली है। विद्या परम देवता है। विद्या राजाओंके मध्य पूजनीय है। अत: विद्यासे विहीन मनुष्य पशुके समान है -
विद्या नाम कुरूपरूपमधिकं विद्यातिगुप्तं धन
विद्या साधुकरी जनप्रियकरी विद्या गुरूणां गुरु:।
विद्या बन्धुजनार्तिनाशनकरी विद्या परं दैवतं
विद्या राजसु पूजिता हि मनुजो विद्याविहीन: पशु:॥
घर या उसके गुह्य स्थानोंपर सुरक्षित रखा हुआ द्रव्य देखा जा सकता है और वह समस्त धन - वैभव चोरोंके द्वारा चुराया भी जा सकता है। किंतु विद्या एक ऐसा धन है, जो दूसरेके द्वारा किसी भी प्रकार अपहृत नहीं किया जा सकता।
(गृहे चाभ्यन्तरे द्रव्यं लग्नं चैव तु दृश्यते।
अशेषं हरणीयं च विद्या न ह्नियते परै:॥)