गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
2 - गरुडपुराणकी वक्त्तृ- श्रोतृ-परम्परा, भगवान् विष्णुद्वारा अपने स्वरूपका वर्णन तथा गरुडजीको पुराणसंहिताके प्रणयनका वरदान
ऋषियोंने पुनः कहा -(हे सूतजी महाराज!) आपको महात्मा व्यासजीने विष्णुकथासे आश्रित इस श्रेष्ठ गरडमहापुराणको किस प्रकार सुनाया था? वह सब आप हमें विधिवत् सुनानेकी कृपा करें।
सूतजी बोले - एक बार मुनियोंके साथ मैं बदरिकाश्रम गया था। वहाँपर परमेश्वरके ध्यानमें निमग्र भगवान् व्यासका मुझे दर्शन हुआ। उन्हें प्रणाम करके मैं वहींपर बैठ गया और उन मुनीश्वरसे मैंने पूछा--हे व्यासजी! आप परमेश्वर भगवान् श्रीहरिके स्वरूप और जगतूकी सृष्टि आदिको मुझे सुनायें, क्योंकि मैं जानता हूँ कि आप उन्हीं परम पुरुषका ध्यान कर रहे हैं और उन सर्वज्ञके स्वरूपका परिज्ञान भी आपको है। हे विप्रवृन्द! मैंने व्यासदेवके सामने जब ऐसी जिज्ञासा की तो उन्होंने मुझसे जो कुछ कहा था, वह सब मैं आप सभीसे कह रहा हूँ, सुनें।
व्यासजीने कहा - हे सूतजी! ब्रह्माजीने जिस प्रकार नारद एवं प्रजापति दक्ष आदिसे तथा मुझसे इस पुराणकी कथा कही थी, उसी प्रकार मैं गरुडमहापुराणको सुनाता हूँ। आप सब (उसे) सुनें।
सूतजीने पूछा - (हे भगवन्!) ब्रह्माजीने देवर्षि नारद और प्रजापति दक्षसहित आपसे किस प्रकारके पवित्र एवं सारतत्त्व बतानेवाले पुराणकों कहा था?
व्यासजीने कहा--एक बार नारद, दक्ष तथा भृगु आदि ऋषियोंके साथ मैं ब्रह्मलोकमें विद्यमान श्रीब्रह्माजीके पास गया और उन्हें प्रणामकर मैंने प्रार्थना की कि हे प्रभो! आप हमें सारतत्त्व बतानेकी कृपा करें।
ब्रह्माजी बोले - यह गरुडमहापुराण अन्य सभी शास्त्रोंका सारभूत है। प्राचीन कालमें भगवान् विष्णुने अन्य देवताओंसहित रुद्रदेव (शिव) और मुझसे जिस प्रकार इसे कहा था, उसी प्रकार मैं भी इसका वर्णन आपसे कर रहा हूँ।
व्यासजीने कहा - भगवान् श्रीहरिने अन्य देवोंके साथ रुद्रदेबको किस प्रकारसे सारभूत और महान् अर्थ बतलानेवाले इस गरुडमहापुराणको सुनाया था? हे ब्रह्मन्! उसे आप सुनायें।
ब्रह्माजी बोले - एक बार इन्द्रादि देवताओंके साथ मैं कैलासपर्वतपर पहुँच गया। वहाँ मैंने देखा कि रुद्रदेव शट्डूर परम तत्त्वके ध्यानमें निमग्र हैं। मैंने प्रणाम करके उनसे पूछा--हे सदाशिव! आप किस देवका ध्यान कर रहे हैं? मैं तो आपसे अतिरिक्त अन्य किसी देवताको नहीं जानता हूँ। इन सभी देवताओंके साथ उस परम सारतत्त्वको जाननेकी मेरी इच्छा है। अतः आप उसका वर्णन करें|
श्रीरुद्रजीने ब्रह्माजीसे कहा - मैं तो सर्वफलदायक, सर्वव्यापी, सर्वरूप, सभी प्राणियोंके हृदयमें अवस्थित परमात्मा तथा सर्वेध्वर उन भगवान् विष्णुका ध्यान करता हूँ। हे पितामह ! उन्हीं विष्णुकी आराधना करनेके लिये मैं शरीरमें भस्म तथा सिरपर जटाजूट धारण करके व्रताचरणमें निरत रहता हूँ। जो सर्वव्यापक, जयशील, अद्दैत, निराकार एवं पद्मनाभ हैं, जो निर्मल (शुद्ध) तथा पवित्र हंसस्वरूप हैं, मैं उन्हीं परमपद परमेश्वर भगवान् श्रीहरिका ध्यान करता हूँ। इस सारतत्त्व (श्रीविष्णु) - के विषयमें उन्हींके पास चलकर हम सभीको पूछना चाहिये।
जिनमें सम्पूर्ण जगत्का वास है। प्रलयकालमें जिनमें सम्पूर्ण जगत् प्रविष्ट हो जाता है, सब प्रकारसे अपनेको उन्हींकी शरणमें करके मैं उन्हींका चिन्तन करता हूँ। जिन सर्वभूतेश्वरमें सत्त्वगुण, रजोगुण एवं तमोगुण एक सूत्रमें अवगुम्फित मणियोंके समान विद्यमान रहते हैं, जो हजार नेत्र, हजार चरण, हजार जंघा तथा श्रेष्ठ मुखसे युक्त हैं, जो सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म, स्थूलसे भी स्थूल, गुरुसे गुरुतम और पूज्योंमें पूज्यतम तथा श्रेष्ठोंमें भी श्रेष्ठ तम हैं, जो सत्योंके परम सत्य और सत्यकर्मा कहे गये हैं, जो (पुराणोंमें) पुराणपुरुष और द्विजातियोंमें ब्राह्मण हैं, जो प्रलयकालमें सड्डर्षण कहलाते हैं; मैं उन्हीं परम उपास्यकी उपासना करता हूँ।
जिन सतू - असतूसे परे, ऋत (सत्यस्वरूप), एकाक्षर (प्रणवस्वरूप) परब्रह्मकी देव, यक्ष, राक्षत और नागगण अर्चना करते हैं, जिनमें सभी लोक उसी प्रकार स्फुरित होते हैं, जिस प्रकार जलमें छोटी-छोटी मछलियाँ स्फुरित होती हैं, जिनका मुख अग्नि, मस्तक झुलोक, नाभि आकाश, चरणयुग्म पृथ्वी और नेत्र सूर्य तथा चन्द्र हैं; ऐसे उन (विष्णु)-देवका मैं ध्यान करता हूँ।
जिनके उदरमें स्वर्ग, मर्त्य एवं पाताल - ये तीनों लोक विद्यमान हैं। समस्त दिशाएँ जिनकी भुजाएँ हैं, पवन जिनका उच्छवास है, मेघमालाओंका समूह जिनका केश-पुझ् है, नदियाँ ही जिनके सभी अड्गोंकी सन्धियाँ हैं और चारों समुद्र जिनकी कुक्षि हैं, जो कालातीत हैं, यज्ञ एवं सतू - असतूसे परे हैं, जो जगत्के आदि कारण तथा स्वयं अनादि हैं, ऐसे उन नारायणका मैं चिन्तन करता हूँ।
जिनके मनसे चन्द्रमा, नेत्रोंसे सूर्य और मुखसे अग्नि उत्पन्न है, जिनके चरणोंसे पृथिवीकी, कानोंसे दिशाओंकी और मस्तकसे स्वर्गकी सृष्टि हुई है, जिन परमेश्वरसे सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर तथा वंशानुचरित प्रवर्तित हुआ है; उन देवकी मैं आराधना करता हूँ| परम सारतत्त्वका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये हम सभीको उन्हींकी शरणमें जाना चाहिये|
ब्रह्माजीने कहा-हे व्यासजी! प्राचीन कालमें रुद्रके द्वारा ऐसा कहे जानेपर श्रेतद्वीपमें निवास करनेवाले भगवान् विष्णुको प्रणाम करके उनकी स्तुतिकर उस परम तत्त्वके सारको सुननेकी इच्छासे देवगणोंके साथ मैं भी वहींपर स्थित हो गया| तदनन्तर हमारे मध्य अवस्थित रुद्रने उन परम सारतत्त्वस्वरूप विष्णुको प्रणाम करके (यह) जिज्ञासा करते हुए कहा- हे देवेश्वर! हे हरे! आप हम सबको यह बतायें कि कौन देवाधिदेव हैं और कौन ईश्वर हैं? कौन ध्येय तथा कौन पूज्य हैं? किन व्र से वे परम तत्त्व संतुष्ट होते हैं? किन धर्मोंके द्वारा, किन नियमोंसे अथवा किस धार्मिक पूजासे और किस आचरणसे वे प्रसन्न होते हैं? उन ईश्वरका वह स्वरूप कैसा है? किन देवके द्वारा इस जगत्की सृष्टि हुई है और कौन इस जगतूका पालन करते हैं? वे किन - किन अवतारोंको धारण करते हैं? प्रलयकालमें यह विश्व किन देवमें लीन होता है? सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश तथा मन्वन्तर किन देवसे प्रवर्तित होते हैं और यह सब(दृश्यमान जगत्) किन देवमें प्रतिष्ठित है? हे हरे! इन सभी विषयोंके साथ अन्य जो भी सारतत्त्व हैं, उन्हें बतायें और इसके साथ ही परमेश्वरके माहात्म्य तथा ध्यानयोगके विषयमें भी बतानेकी कृपा करें|
तदनन्तर भगवान् विष्णुने रुद्रको उस परमेश्वरके माहात्म्य एवं (उसकी प्राप्तिके साधनभूत) ध्यान और योगादिक नियमों तथा अष्टादश विद्याओंका ज्ञान (इस प्रकारसे) दिया-
श्रीहरिने कहा- हे रुद्र! मैं बताता हूँ, ब्रह्मा और अन्य देवोंके साथ आप उसका श्रवण करें - मैं ही सभी देवोंका देव हूँ| मैं ही सभी लोकोंका स्वामी हूँ| देवोंका मैं ही ध्येय, पूज्य और स्तुतियोंसे स्तुति करने योग्य हूँ| हे रुद्र! मैं ही मनुष्योंसे पूजित होकर उन्हें परम गति प्रदान करता हूँ तथा व्रत, नियम और सदाचरणसे संतुष्ट होकर हे शिव! मैं ही इस संसारकी स्थितिका मूल कारण हूँ| मैं ही जगत्की रचना करनेवाला हूँ| हे शङ्कर! मैं ही दुष्टोंका निग्रह और धर्मकी रक्षा करता हूँ| मैं ही मत्स्य आदिके रूपमें अवतीर्ण होकर अखिल भूमण्डलका पालन करता हूँ| मैं ही मन्त्र हूँ| मैं ही मन्त्रका अर्थ हूँ और मैं ही पूजा तथा ध्यानके द्वारा प्राप्त होनेवाला परम तत्त्व हूँ| मैंने ही स्वर्ग आदिकी सृष्टि की है और मैं ही स्वर्गादि भी हूँ| मैं ही योगी, आद्य योग और पुराण हूँ| ज्ञाता, श्रोता तथा मननकर्ता मैं ही हूँ| वक्ता और सम्भाषणका विषय भी मैं ही हूँ| इस जगत्के समस्त पदार्थ मेरे ही स्वरूप हैं और मैं ही सब कुछ हूँ| मैं ही भोग और मोक्षका प्रदायक परम देव हूँ| हे रुद्र! ध्यान, पूजाके उपचार और (सर्वतोभद्र) मण्डल आदि सब कुछ मैं ही हूँ| हे शिव! मैं ही सम्पूर्ण वेद हूँ| मैं ही इतिहास स्वरूप हूँ| मैं ही सर्वज्ञानमय हूँ| मैं ही ब्रह्म और सर्वात्मा हूँ, मैं ही ब्रह्मा हूँ, मैं ही सर्वलोकमय हूँ तथा मैं ही सभी देवोंका आत्मस्वरूप हूँ| मैं ही साक्षात् सदाचार हूँ| मैं ही धर्म हूँ| मैं ही वैष्णव हूँ| मैं ही वर्णाश्रम हूँ| मैं ही सभी वर्णों और आश्रमोंका सनातन धर्म हूँ| हे रुद्र! मैं ही यम - नियम और विविध प्रकारका व्रत हूँ| मैं ही सूर्य, चन्द्र एवं मंगल आदि ग्रह हूँ|
प्राचीन कालमें पृथिवी पर पक्षिराज गरुडने तपस्याके द्वारा मेरी ही आराधना की थी| उनकी तपस्यासे संतुष्ट होकर मैंने उनसे कहा था कि आप मुझसे अभीष्ट वर माँग लें|
उस समय गरुडने कहा - हे हरि! नागोंने मेरी माता विनताको दासी बना लिया है| हे देव! आप प्रसन्न होकर मुझे यह वर प्रदान करें कि मैं उनको जीतकर अमृत प्राप्त करनेमें समर्थ हो सकूँ और माँको (नागोंकी माता) कद्रूकी दासतासे मुक्त करा सकूँ, मैं आपका वाहन बन सकूँ, महान् बली, महान् शक्तिशाली, सर्वज्ञ और नागोंको विदीर्ण करनेमें समर्थ हो सकूँ तथा जिस प्रकार पुराण - संहिताका रचनाकार हो सकूँ वैसा ही करनेकी कृपा करें|
श्रीविष्णु बोले - हे पक्षिराज गरुड! आपने जैसा वर माँगा है, वैसा ही सब कुछ होगा| आप नागोंकी दासतासे अपनी माता विनताको मुक्त करवा सकेंगे| सभी देवताओंको जीतकर अमृत ग्रहण करनेमें आपको सफलता प्राप्त होगी| अत्यन्त शक्तिसम्पन्न होकर आप मेरे वाहन होंगे। विषोंके विनाशकी शक्ति भी आपको प्राप्त होगी| मेरी कृपासे आप मेरे ही माहात्म्यको कहनेवाली पुराण - संहिताका प्रणयन करेंगे| मेरा जैसा स्वरूप कहा गया है, वैसा ही आपमें भी प्रकट होगा|
आपके द्वारा प्रणीत यह पुराण संहिता आपके 'गरुड' नामसे लोकमें प्रसिद्ध होगी|
है विनतासुत! जिस प्रकार देव - देवोंके मध्य मैं ऐश्वर्य और श्रीरूपमें विख्यात हूँ, उसी प्रकार हे गरुड! सभी पुराणोंमें यह गरुड महापुराण भी ख्याति अर्जित करेगा| जैसे विश्वमें मेरा कीर्तन होता है, वैसे ही गरुड के नामसे आपका भी संकीर्तन होगा| हे पक्षिश्रेष्ठ! अब आप मेरा ध्यान करके उस पुराणका प्रणयन करें|
हे रुद्र! मेरे द्वारा यह वरदान दिये जानेके बाद इसी सम्बन्धमें कश्यप ऋषिके द्वारा पूछे जानेपर गरुडने इसी पुराणको उन्हें सुनाया| कश्यपने इस गरुडमहापुराणका श्रवण करके गारुडीविद्याके बलसे एक जले हुए वृक्षको भी जीवित कर दिया था| गरुडने स्वयं (भी) इसी विद्याके द्वारा अनेक प्राणियोंको जीवित किया था। 'यक्षि ॐ उं स्वाहा' यह जप करने योग्य गारुडी पराविद्या है| हे रुद्र! मेरे स्वरूपसे परिपूर्ण गरुडद्वारा कहे गये इस गरुड महापुराणको आप सुनें|