भविष्य पुराण

भविष्योत्तरपर्वकी संक्षिप्त अनुक्रमणिका

इस पर्वके प्रारम्भमें महाराज युधिष्ठिरके पास महर्षि वेदव्यासके साथ अनेक ऋषियोंके आगमन, ब्रह्माण्डकी उत्पत्ति, नारदको वैष्णवीमायाका दर्शन, संसारके दोषोंका वर्णन, पापोंके भेद, शुभ और अशुभ लक्षणों का वर्णन है। शकटव्रत, तिलकव्रत, अशोक और करवीर, कोकिला, बृहत्तप, भद्रोपवास, यमद्वितीया, अशून्यशयन, कामाख्यातृतीया, मेघपाली, पञ्चाग्निसाधन, त्रिरात्रगोष्पद, हरकाली, ललिता- तृतीया, योगाख्यातृतीया, उमामहेश्वरव्रत, रम्भा-तृतीया, सौभाग्यतृतीया, आर्द्रानन्दकरीतृतीया तथा चैत्र, भाद्र और माघके तृतीयाव्रतोंका वर्णन हुआ है। फिर आनन्तर्यतृतीया, विनायक-शान्ति, सारस्वतव्रत, नागपञ्चमी, श्रीपञ्चमी, शोकप्रणाशिनीषष्ठी, फलषष्ठी, मन्दारषष्ठी, ललिताषष्ठी, कार्तिकेयषष्ठी, महत्तपससमी, विभूषासप्तमी, आदित्यमण्डपविधि, त्रयोदशवयंसप्तमी, कृकवाकुप्लवङ्गसप्तमी, उभयसप्तमी, कल्याणसप्तमी, शर्कराससमी, कमलासप्तमी, शुभासप्तमी, सपनसप्तमी, व्रतसप्तमी. और अचलासतमी, बुधाष्टमी, जन्माष्टमी, दूर्वाष्टमी, कृष्णाष्टमी, अनघाष्टमी, अष्टिमी व्रतोंका वर्णन है। तदनन्तर श्रीवृक्षनवमी, ध्वजनवमी, उल्कानवमी, दशावतार, आशादशमी, रोहिणीचन्द्र, इन्द्रहरि- शम्भु-ब्रह्मा-सूर्य-अवियोगवत, गोवत्सद्वादशी, नीराजनद्वादशी, भीष्मपञ्चक, मल्लद्वादशी, भीमाद्वादशी, श्रवणद्वादशी, सम्पासिद्वादशी, गोविन्दद्वादशी, अखण्डद्वादशी, तिलद्वादशी, सुकृतद्वादशी, परणीव्रत, विशोकद्वादशी, विभूतिद्वादशी, पुष्यद्वादशी, श्रवणद्वादशी, अनङ्गद्वादशी, अङ्कपादनत, निम्बार्क-करवीर-माहात्म्य, यमदर्शनत्रयोदशी, अनङ्गत्रयोदशी, पालीव्रत, रम्भाव्रत, आग्नेयी चतुर्दशी, अनन्तचतुर्दशी, श्रावणी, नक्तचतुर्दशी, शिवचतुर्दशी, फलत्यागचतुर्दशीव्रत तथा वैशाख, कार्तिक और माषकी पूर्णिमाके माहात्म्यका वर्णन किया गया है। तत्पश्चात् कार्तिकमें कृत्तिकाके योगमें कृत्तिकाव्रत, फाल्गुन पूर्णिमामें पूर्णमनोरथव्रत, अशोकपूर्णिमाव्रत, अनन्तव्रत, साम्भरायणीव्रत, नक्षत्रपुरुषव्रत, शिवनक्षत्रपुरुषव्रत, कामदानव्रत, वृन्ताकविधि, आदित्यदिननक्तव्रत, संक्रान्तिके उद्यापनका विधान, भद्राव्रत, अगस्त्यार्थ्यव्रत, नवचन्द्रार्घ्य, शुक्र-बृहस्पति- अर्य-प्रदानव्रत, पञ्चाशीतित्रत, माघस्नान, नित्यस्नान, रुद्रस्नानकी विधि, चन्द्र और सूर्य-ग्रहणमें स्नान, भोजन विधि, वापी, कूप तथा तडागका उत्सर्ग, वृक्ष-पूजा, देवपूजा, दीपदान, वृषोत्सर्गविधि, फाल्गुनी-उत्सव, मदनोत्सव, भूतमातोत्सव, श्रावणीमें रक्षाबन्धनकी विधि, चन्द्रोत्सव, दीपमालिका, होम, लक्षहोम, कोटिहोमकी विधि, महाशान्ति तथा विनायक-शान्ति, नक्षत्रहोम, गोदान-विधि, गुडधेनु, घृतधेनु, तिलधेनु, जलधेनु, लवणधेनु और नवनीतधेनु एवं सुवर्णधेनुदानके विधानोंका निरूपण हुआ है। ये सभी देवकार्य हैं, कल्याणकामी पुरुषों को इन धर्मकार्योको यथाशक्ति अवश्य करना चाहिये। (अध्याय २०८)

॥ भविष्यपुराणान्तर्गत उत्तरपर्व सम्पूर्ण।।

॥ श्रीभविष्यमहापुराण सम्पूर्ण।।