ब्रह्माजी बोले-त्रिलोचन! माघ मासके शुक्ल पक्षकी सप्तमी तिथि जयन्ती-सप्तमी कही जाती है, यह पुण्यदायिनी, पापविनाशिनी तथा कल्याणकारिणी है। इस तिथिपर जिस विधिसे उपासना करनी चाहिये, उसे आप सुनें। पण्डितोंने इस व्रतमें चार पारणाओंका उल्लेख किया है। पञ्चमी तिथिमें एकभुक्त, षष्ठीमें नक्तव्रत और सप्तमीमें उपवास करके अष्टमीमें पारणा करनी चाहिये। माघ, फाल्गुन तथा चैत्र मासमें जब जयन्ती- सप्तमीका व्रत किया जाय तब भगवान् सूर्यको बकुलके सुन्दर पुष्प चढ़ाने चाहिये तथा कुंकुमका विलेपन करना चाहिये, मोदकोंका नैवेद्य और घृतका धूप देना चाहिये। पञ्चगव्य-प्राशन करके
पवित्रीकरण करना चाहिये। ब्राह्मणोंको मोदक यथाशक्ति खिलाना चाहिये तथा शालि नामक चावलका भात भी देना चाहिये। इस प्रकार जो मनुष्य लोकपूज्य भगवान् भास्करकी पूजा करता है, वह इस व्रतको सभी पारणाओंमें अश्वमेध एवं राजसूय यज्ञका फल प्राप्त करता है।
द्वितीय पारणामें सूर्यभगवान्की पूजा करके राजसूय यज्ञका फल प्राप्त होता है। वैशाख, ज्येष्ठ और आषाढ़ मासमें सूर्यदेवकी पूजा करनेके लिये शतदल कमल तथा त चन्दन और गुग्गुलके धूपका विधान कहा गया है। इसमें गुड़के बने हुए अपूपका नैवेद्य अर्पित करना चाहिये और गोमयका प्राशन करना चाहिये। ब्राहाणोंको गुड़से बने हुए अपूपोंका भोजन कराना अच्छा माना गया है। यह पारणा पापनाशिका है।
तृतीय पारणाकी विधि इस प्रकार है-श्रावण, भाद्रपद और आश्विन मासमें रक्त चन्दन, मालतीके पुष्प और विजय नामक धूपका पूजनमें प्रयोग करना चाहिये। घृतमें बनाये गये अपूपोंका नैवेद्य निवेदित करना चाहिये। ब्राह्मणोंको भोजन भी उसी घृतके अपूपोंसे करानेका विधान है। शरीरको परम पवित्र करनेवाले कुशोदकका पान करना चाहिये। यह तृतीय पारणा पापोंका नाश करनेवाली कही गयी है। अब चौथी पारणा बर्ता रहा हूँ, इसे सुनें-
कार्तिक, मार्गशीर्ष तथा पौष मासमें सूर्यपूजनको पारणा करनेसे अनन्त पुण्यफल प्राप्त होते हैं। इस पारणामें कनेरके लाल पुष्प, रक्त चन्दन देने चाहिये। अमृत' नामका धूप, पायसका श्रेष्ठ नैवेद्य निवेदित करना चाहिये। श्वेत गायके मढेका प्राशन करनेका विधान है।
चारों पारणाओंमें क्रमश: 'चित्रभानुः प्रीयताम्', 'भानुः प्रीयताम्', 'आदित्यः प्रीयताम्' तथा 'भास्करः प्रीयताम्'- ऐसा उच्चारण करना चाहिये। इस विधिसे जो मनुष्य विभावसु भगवान् सूर्यनारायणकी पूजा करता है, वह परम पदको प्राप्त होता है। इस प्रकार, सप्तमी-व्रत करनेपर व्रतकर्ताको सभी अभीष्ट कामनाओंकी प्राप्ति हो जाती है। पुत्रार्थी पुत्र तथा धनार्थी धन प्राप्त करता है और रोगी मनुष्य रोगोंसे मुक्त हो जाता है तथा अन्तमें वह नितान्त कल्याण प्रास करता है।
इस प्रकार जो मनुष्य इस सप्तमी व्रतका आचरण करता है, वह सर्वत्र विजयी होता है तथा सभी पापोंसे मुक्त होकर वह विशुद्धात्मा सूर्यलोकको प्राप्त करता है। (अध्याय ९७)
Summary of chapter 61 of the Bhavishya Purāṇa is as follows:
Two important special-occasion rites are taught. The Agastya-arghya is performed when the star Agastya (Canopus) rises on the horizon during the Kanyā-rāśi period. A golden image of Agastya Maharṣi is installed on a kalaśa, worshipped with the mantra *Kāśapuṣpa-pratīkāśa*, and given as dāna. The phala is differentiated by varṇa: knowledge for brāhmaṇas, sovereignty for kṣatriyas, prosperity for vaiśyas, health for śūdras, and saubhāgya for women. The Bhadra Śānti rites — for pacifying Bhadra, Sūrya's daughter by Chāyā who presides over the Viṣṭi-karaṇa in the pañcāṅga — are also given, with her twelve auspicious names and the method of converting her inauspicious periods into benefic ones.