भगवान् श्रीकृष्णने कहा-राजन्! प्राचीन कालमें अजपाल नामके एक राजर्षि थे। एक बार प्रजाने अपने दुःखोंको दूर करनेकी उनसे प्रार्थना की, तब उन्होंने इसपर गम्भीरतापूर्वक विचार किया और फिर नीराजन-शान्तिका अनुष्ठान किया। राजन्! आपको उस व्रतकी विधि बतलाता हूँ। हे पाण्डवश्रेष्ठ! राजाको पुरोहितके द्वारा इसे सविधि सम्पन्न कराना चाहिये।
जब अजपाल राजा था, उस समय राक्षसोंका स्वामी रावण लङ्काका राजा था। देवताओंको उसने अपनी सेवामें नियुक्त कर लिया था। रावणने चन्द्रमाको छत्र, इन्द्रको सेनापति, वायुको धूल साफ करनेवाला, बरुणको जलसेवक, कुबेरको धनरक्षक, यमको शत्रुको संयत करनेवाला तथा राजेन्द्र मनुको मन्त्रणाके लिये नियुक्त किया। मेघ उसके इच्छानुसार शीतल मन्द वृष्टि करते थे। ब्रह्माके साथ समर्षिगण नित्य उसको शान्तिको कामना करते रहते थे। रावणने गन्धर्वोको गानके लिये, अप्सराओंको नृत्य-गीतके लिये, विद्याधरोंको वाद्य-कार्यके लिये, गङ्गादि नदियोंको जलपान करानेके लिये, अग्निको गार्हपत्य-कार्यके लिये विश्वकर्माको अन्न-संस्कारके लिये तथा यमको शिल्प आदि कार्योके लिये नियुक्त किया और दूसरे राजागण नगरको सेवाके विधानमें तत्पर रहते थे। रावणने ऐसा अपना प्रभाव देखकर अपने प्रसस्ति नामक प्रतिहारसे कहा-'यहाँ मेरी सेवाके लिये कौन आया है?' प्रणाम कर निशाचरने कहा-'प्रभो! ककुत्स्थ, मान्धाता, धुन्धुमार, गल, अर्जुन, ययाति नहुष, भीग, राघव, बिदूरथ-ये सभी तथा अन्य बहुत से राजा आपको सेवाके लिये यहाँ आये हैं, किंतु राजा अजपाल आपकी रोवामें नहीं आया है।' रावणाने कुद्ध होकर शीघ्र ही धूम्राक्ष नामक राक्षससे कहा-'धूम्राक्ष ! जाओ और अजपालको मेरी आज्ञाके अनुसार यह सूचना दो कि तुम आकर मेरी सेवा करो, अन्यथा तलवारसे तुमको मैं मार डालूँगा।' रावणके द्वारा ऐसा कहनेपर धूमाक्ष गरुड़के समान तेज गतिसे उसको रमणीय नगरीमें गया और राजकुलमें पहुंचा। धूम्राक्षने रावणके द्वारा कही गयी बातें उसे सुनायीं, किंतु अजपालने धूम्राक्षके आक्षेपपूर्वक अन्य कारणोंको कहते हुए लौटा दिया। तदनन्तर ज्वरको बुलाकर राजाने कहा-'तुम लङ्केश्वर रावणके पास जाओ और वहाँ यथोचित कार्य सम्पन्न करो।' अजपालके द्वारा नियुक्त मूर्तिमान् ज्वर वहाँ गया और उसने सभी गणोंके साथ बैठे हुए राक्षसपतिको प्रकम्पित कर दिया। रावणने उस परम भयंकर ज्वरको आया जानकर कहा कि अजपाल राजा वहीं रहे, मुझे उसकी जरूरत नहीं है। उसी बुद्धिमान् राजर्षि अजपालके द्वारा यह शान्ति प्रवर्तित हुई है, शान्ति सभी उपद्रवोंको दूर करनेवाली है। सभी रोगोंको नष्ट करनेवाली है।
कार्तिक मासके शुक्ल पक्षकी द्वादशी तिथिमें सायंकाल भगवान् विष्णुके जग जानेके बाद ब्राह्मणोंके द्वारा विष्णुका हवन करे। वर्धमान (एरण्ड) वृक्षोंसे प्राप्त तेलयुक्त दीपिकाओंसे भगवान् विष्णुका धीरे धीरे नीराजन करे। पुष्य, चन्दन, अलंकार, वस्त्र एवं रब आदिसे उनकी पूजा करे। साथ ही लक्ष्मी, चण्डिका, ब्रह्मा आदित्य, शंकर, गौरी, यक्ष, गणपति, ग्रह, माता-पिता तथा नाग सभीका नीराजन (आरती) करे। गौ, महिष आदिका भी नीराजन करे। घंटा आदि वाद्योंको बजाये। गौओंका सिन्दूर आदिसे तथा चित्र विचित्र वस्त्रोंसे शृङ्गार करे और बछड़ोंके साथ उनको ले चले एवं उनके पीछे गोपाल भी ध्वनि करते चलें। मङ्गलध्वनिसे युक्त गौओंके नीराजन-उत्सवमें घोड़ों आदिको भी ले चले। अपने घरके आँगनको राजचिह्नोंसे सुशोभित कर पुरोहितोंके साथ मन्त्री, नौकर आदिको लेकर राजा शङ्ख, तुरही आदिके द्वारा एवं गन्ध, पुष्प, वस्त्र, दीप आदिसे पूजा करे। पुरोहित 'शान्तिरस्तु', 'समृद्धिरस्तु' ऐसा कहते रहें। यह महाशान्ति नामसे प्रसिद्ध नीराजन जिस राष्ट्र, नगर और गाँवमें सम्पन्न होता है, वहाँक सभी रोग एवं दुःख नष्ट हो जाते हैं तथा सुभिक्ष हो जाता है। राजा अजपालने इसी नीराजन-शान्तिसे अपने राष्ट्रकी वृद्धि की थी और सम्पूर्ण प्राणियोंको रोगसे मुक्त बना दिया था। इसलिये रोगादिकी निवृत्ति और अपना हित चाहनेवाले व्यक्तिको नीराजन-व्रतका अनुष्ठान प्रतिवर्ष करना चाहिये। भगवान् विष्णुका जो नौराजन करता है, वह गौ, ब्राह्मण, रथ, घोड़े आदिसे युक्त एवं नीरोग हो सुखसे जीवन-यापन करता है। (अध्याय ७१)