श्रीगणेशजीको नमस्कार है, श्रीराधावल्लभको जय हो।
नैमिषारण्यवासी ऋषियोंने कहा-सूतजी महाराज! हमलोगोंने आपके द्वारा कहे गये कृष्णांश (उदयसिंह)-के चरित्रको सुना। अब आप अग्निवंशमें उत्पन्न हुए राजाओं (प्रमर, चयहानि तथा परिहार आदि) के राजवंशोंका वर्णन करें। जब भगवान् हरि त्रियुगी कहे जाते हैं तो वे कलियुगमें किस प्रकार अवतरित हुए इसे भी आप बतलायें।
सूतजी बोले- मुनि श्रेष्ठ ! आपलोगोंने बहुत ही उत्तम प्रश्न किया है। अग्निशके राजाओंके चरित्रको मैं कह रहा हूँ, आपलोग सुनिये। दक्षिण दिशामें अम्बाद्वारा रचित दिव्य अम्बावती नामको पुरीमें प्रमर नामका एक राजा हुआ। वह राजा सामवेदी था। महाबली उस राजाने अम्बावतीमें 'छः वर्षातक राज्य किया। प्रमरका पुत्र महामर (महामद) हुआ, उसने तीन वर्षातक राज्य किया और उसका पुत्र हुआ देवापि। उसने भी पिताके समान राज्य किया और उसका पुत्र देवदूत हुआ। देवदूतने भी अपने पिताके समान ही राज्य किया। देवदूतका महाबलशाली गन्धर्वसेन नामक पुत्र हुआ। गन्धर्वसेन पचास वर्षांतक राज्य करनेके पश्चात् तपस्या करनेके लिये वनमें चला गया। कुछ समयके बाद शिवके आशीर्वादसे उसे विक्रम नामका पुत्र हुआ। महार ज विक्रमने सौ वर्षतक राज्य किया और उसका पुत्र हुआ देवभक्त । देवभक्तने दस वर्षातक राज्य किया और वह दुष्ट शकोंद्वारा मारा गया। देवभक्तका पुत्र हुआ शालिवाहन । उसने शकोंको जीतकर साठ वान्तक राज्य किया। अनन्तर वह दिवंगत हो गया। उसका पुत्र शालिहोत्र हुआ और शालिहोत्रने पचास वर्धतक राज्य किया। उसका पुत्र शालिवर्धन राजा हुआ, उसने पिताके समान राज्य किया। उसको शकहन्ता नामका पुत्र प्राप्त हुआ, उसका पुत्र महोत्र हुआ और उसका पुत्र हुआ हविर्होत्र। उसने भी पिताके समान पचास वर्थतक राज्य किया और उसका पुत्र इन्द्रपाल हुआ। इन्द्रपालने इन्द्रावती (इन्दौर) नामकी पुरी| मनाकर उसमें राज्य किया। इन्द्रपालने भी अपने पिता हविर्होत्रके समान राज्य किया और उसका पुत्र हुआ माल्यवान्! माल्यवान्ने भी माल्यवती नामकी पुरी बनाकर पिताके समान राज्य किया। उसके राज्यमें चार वर्षतक अनावृष्टि होनेसे घोर अकाल पड़ गया। अन्नके दानेका दर्शन भी दुर्लभ हो गया। प्रजाके साथ-साथ राजा भी भूख-प्याससे व्याकुल हो गया। अनावृष्टि दूर करनेके लिये राजाने भगवान् शालग्रामकी शरण ली। राजाके पास नैवेद्य निवेदित करने के लिये कुछ भी न था। एक स्थानपर पड़े कुछ अनाजके दानोंको राजाने बीन लिया और जिस किसी तरह उन्हें धोकर पवित्र कर उन्हींसे पूजा आदि की। उसकी श्रद्धा-भक्तिसे संतुष्ट होकर भगवान्ने आकाशवाणीद्वारा कहा--'राजन्! आजसे तुम्हारे वंशजों के उत्तम राज्यमें पृथ्वी पर कभी भी अनावृष्टिका भय नहीं होगा।'
माल्यवान्का पुत्र शंकर भक्त शम्भुदरा हुआ और उसका पुत्र भौगराज हुआ। भौमराजका पुत्र वत्सराज हुआ। उसका पुत्र हुआ भोजराज । भोजराजका पुत्र शम्भुदत्त हुआ। उसने चालीस वर्षतक राज्य किया। शम्भुदत्तका पुत्र बिंदुपाल हुआ। बिंदुपालने बिदुखण्ड नामक राष्ट्र का निर्माणकर सुखपूर्वक राज्य किया। बिंदुपालने अपने पिताके समान हो राज्य किया। बिंदुपालका पुत्र राजपाल हुआ और उसको महानर नामका पुत्र हुआ। महीनरका पुत्र हुआ सोमवर्मा और उसका पुत्र कामवर्मा हुआ। कामवर्माका पुत्र भूमिपाल हुआ। उसने एक तालाब खुदवाया और उसके किनारे एक सुन्दर नगरका निर्माण कराया। भूमिपालका पुत्र रंगपाल हुआ। भूमिपालने राजाका पद प्रास कर अनेक राजाओं पर विजय प्राप्त की और इस पृथ्वीपर वह वीरसिंहके नामसे विख्यात हुआ। अपने राज्यपर अपने पुत्र रंगपालका अभिषेक कर वह तपस्या करने वनमें चला गया। राजाओंमें उत्तम रंगपालको कल्पसिंह नामका पुत्र हुआ। कल्पसिंहके कोई संतान नहीं हुई। एक बार स्नान करनेके लिये वह गङ्गातटपर गया, वहाँ उसने प्रसन्न होकर द्विजातियोंको दान दिया। निर्जन कल्पक्षेत्रकी पुण्यभूमिको देखकर उस भूमिपर प्रसन्नचित्त हो उसने वहाँ एक नगरका निर्माण कराया। वह नगर 'कलाप' नामसे इस पृथ्वीपर प्रसिद्ध हुआ। कलापमें उसने राज्य किया और गङ्गाकी कृपासे उसको गंगासिंह नामका पुत्र प्राप्त हुआ। उसने नब्बे वर्षातक राज्य किया, किंतु उसके कोई संतान न हुई। अन्तमें युद्ध करते हुए कुरुक्षेत्रमें प्राण त्यागने के बाद उसने स्वर्गलोकको प्राप्त किया।
सूतजीने पुनः कहा-मुनियो! इस प्रकार पवित्र प्रमरवंश समाप्त हो गया। गंगासिंहके वंशमें उसके बाद जो क्षत्रिय शेष बच गये थे, उनकी स्त्रियोंसे आगे चलकर अनेकों वर्णसंकर पैदा हुए। वे सभी वैश्य-वृत्तिवाले थे। वे सभी म्लेच्छोंके सम्मान पृथ्वीपर निवास करने लगे। इस प्रकार मैंने दक्षिणके राजाओंके वंशका वर्णन किया। (अध्याय)
* स्मिथ आदि इतिहासकार आन्धराज ओंसे लेकर हर्षवर्धनके राज्यटकके कोई ऐतिहासिक सूत्र नहीं देखते। प्रायः चार सौ बोके इतिहासको घोर अन्धकारमय मानते हैं। पर यहाँ जो वंशवृक्ष निर्दिष्ट हुआ है, यह उन्हीं चार सौ वर्षोंका संमित वृत्तान्त समझना चाहिये और आजके ऐतिहासिकोंको इससे लाभ उठाना चाहिये।