सूतजी कहते हैं-ब्राह्मणो ! अब मैं याग-विशेषों में स्वगृह्याग्नि विधि कह रहा हूँ। अपनी वेदादि शाखाके अनुकूल ही गृह्याग्नि-विश्चि करनी चाहिये। दूसरेकी शाखाके विधानसे याग- विशेषोंका अनुष्ठान करनेपर भयको प्राप्ति होती है और कीर्तिका नाश होता है। पुत्र, कन्या और आगे उत्पन्न होनेवाले पुत्रादि गृह्यनामसे कहे जाते हैं। यजमानके जितने दायाद होते हैं, वे सब गृह्यनामसे कहे जाते हैं। उनके संस्कार, याग और शान्तिकर्म क्रियाओंमें अपने गृह्याग्निसे ही अनुमान करना चाहिये। आचार्यद्धारा विहित कल्पको दक्षस्मृतिमें कहा गया है। आचार्य इन कोंमें तीन कुशाओका परिग्रहण करता है। जिस मन्बसे कुशा ग्रहण करता है, उसके ऋषि दक्ष जगती छन्द और विष्णु देवता हैं। पृथ्वीके शोधनमें 'भूरसि.' (यजु. १३।१८) इस मन्त्रका विनियोग करे। इस मन्चके जषि सुवर्ण है, पानी और जगती छन्द तथा सूर्य देवता हैं। अनन्तर उन तीन कुशाओंको तर्जनी तथा अंगूठेसे पकड़कर ईशानकोणसे लेकर दक्षिण होते हुए ईशानकोणतक वलयाकृतिमें घुमाये तथा उनसे भूमिका मार्जन करे। यही परिसमूहन क्रिया है। 'मा नस्तोके ' (यजु १६। १६) इस मन्त्रक द्वारा गोगरसे भूमिका उपलेपन करे। तदनन्तर (खैरकी लकड़ीसे बने स्मयके द्वारा) रेखाकरण करे। पूरबसे पधिमकी ओर तीन रेखाएँ खींचे। पहली रेखा दक्षिणको ओर अनन्तर उत्तरकी ओर बढ़े। इसके विपरीत करनेपर अमङ्गल होता है। इसके बाद अङ्गुछ तथा अनामिकासे उन तीनों रेखाओंसे मिट्टी निकाले, इसे उद्धरण कहा जाता है। इस समय 'मित्रावरुणाभ्यां (यजु ७।२३) इत्यादि मन्त्रोंका स्मरण करे। अनन्तार कुशपुमोदक अथवा पञ्चगव्य या पवारजोदक अथवा पञ्चपल्लवोंके जलसे अध्यक्षण (अधिसिशन) करे। अनन्तर
नमो देवादिदेवाय विण्णये शाश्चताय च।
अनन्तायाप्रेमाय नमस्ते गरुडध्वज।।
ब्रह्मस्तमिम प्रोक्त महादेवेन भाषितम् ।
प्रत्यजाद यः पठेभिल्यममतत्त्व स गच्छति ॥
ध्यायन्ति ये हिलामनराम मयुरी इत्पामध्ये स्वयमाग्यवस्थितम् ।
उपारकानां प्रभुमिकामी वरं से पान्ति सिद्धि परमां तु वैष्णवीम्॥
(मध्यमपर्व २।१२ । १५६-१६३)
कर्मसाधनभूत लौकिक स्मार्त अथवा श्रौताग्निका आनयन करे और अपने सामने स्थापित करे। इस क्रियामें 'मे गृह्णामिः' इस मन्त्रका पाठ करे। 'क्रव्यादग्नि' (यजु ३५1१९) इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए लायी गयी अग्निमेंसे कुछ आग दक्षिण दिशाकी ओर फेंक दे, यह 'क्रव्यादाग्नि' कही गयी है। क्रव्यादाग्निका ग्रहण न करे। 'संसरक्षः' इस मन्त्रसे उस अग्निका आवाहन करे। तदनन्तर 'वैश्वानर' (यजु २६।७) इस मन्त्रसे कुण्ड आदिमें अग्नि-स्थापन करे। 'बध्नासिक' इस मन्त्रसे अग्निको प्रदक्षिणा करे तथा अग्निदेवको नमस्कार करे। अग्निके दक्षिणमें वरण किये गये ब्रह्माको कुशके आसनपर 'ब्रह्मन् इह उपविश्यताम्' कहकर बैठाये। उस समय 'ब्रह्म जज्ञानः' (यजुः १३ । ३) तथा 'दोग्धी धेनु: ' इन दो मन्त्रोंका पाठ करे। अग्निके उत्तरभाग में प्रणीता-पात्रको स्थापित करे। 'इम मे वरुणा' (यजु २१ । १) इस मन्त्रसे प्रणीता-पात्रको जलसे भर दे। इसके अनन्तर कुण्डके चारों और कुश-परिस्तरण करे और काष्ठ (समिधा), द्रोहि, अन्न, तिल, अपूप, भृङ्गराज, फल, दही, दूध, पन्स, नारिकेल, मोदक आदि यज्ञ-सम्बन्धी प्रयोज्य पदार्थोको यथास्थान स्थापित करे। विकंकतवृक्षको लकड़ीसे बनी सुवा तथा शमी, शमीपत्र, चरुस्थाली आदि भी स्थापित करे। प्रणीता पात्रका स्पर्श होम-कालमें नहीं करना चाहिये। स्नान-कुम्भको यज्ञपर्यन्त स्थिर रखना चाहिये। प्रादेशमात्रके दो पवित्रक बनाकर प्रोक्षणी पात्रमें स्थापित करे। प्रणीता पात्रके जलसे प्रोक्षणी पात्रमें तीन बार जल डाले। प्रोक्षणी पात्रको बायें हाथमें रखकर मध्यमा तथा अङ्गुमसे पवित्रक ग्रहण कर 'पवित्र है(५1८1) इस सबसे तीन बार जल बिहके, स्थापित गदार्थाका प्रोक्षण करे और प्रोक्षणी-पात्रको प्रणीता-पात्रके दक्षिण-भागमें यथास्थान रख दे। प्रादेशमात्रके अन्तरमें आवस्थाली रखे। घीको अग्निमें तपाये, घीमेंसे अपद्रव्योंका निरसन करे। इसके बाद पर्यग्निकरण करे। एक जलते हुए आगके अंगारेको लेकर आज्यस्थाली और चरुस्थालीके ऊपर भ्रमण कराये। इस समय 'कुलायिनी' (यजुः १४।२) इस मन्त्रका पाठ करे। अनन्तर सुवाको दायें हाथमें ग्रहण कर अग्निपर तपाये। सम्मार्जन-कुशाओंसे नुवाको मूलसे अग्रभागकी ओर सम्मार्जित करे। इसके बाद प्रणीताके जलसे तीन बार प्रोक्षण करे। पुन: सुवाको आगपर तपाये और प्रोक्षणीके उत्तरकी ओर रख दे। आज्यपात्रको सामने रख ले। पवित्रीसे घीका तीन बार उत्प्लवन कर ले। पवित्रीसे ईशानसे आरम्भकर दक्षिणावर्त होते हुए ईशानपर्यन्त पर्युक्षण करे। अनन्तर अग्निदेवका इस प्रकार ध्यान करे-'अग्नि देवताका रक्त वर्ण हैं, उनके तीन मुख हैं, वे अपने बायें हाथमें कमण्डलु तथा दाहिने हाथमें जुवा ग्रहण किये हुए हैं।' ध्यानके अनन्तर सुवा लेकर हवन करे। इस प्रकार स्वगृह्योक्त विधिके द्वारा ब्रह्मा तथा ऋत्विजोंका वरण करना चाहिये। कुशकण्डिका- में कर्म करके अग्निका पूजन करे। आधार, आज्यभाग, महाव्याहृति, प्रायश्चित्त, प्राजासत्य तथा स्विष्टकृत् हवन करे। प्रजापति और इन्द्रके निमित्त दी गयी आहुतियाँ आधारसंज्ञक हैं। अग्नि और सोमके निमित्त दी जानेवाली आहुतियाँ आज्यभाग कहलाती हैं। 'भूर्भुवः स्वः'-ये तीन महाच्याहतियाँ हैं। 'अयाश्चाग्ने' इत्यादि पाँच मन्त्र प्रायश्चित्त-संज्ञक हैं। एक प्राजापत्य आहुति तथा एक स्विष्टकृत आहुति इस प्रकार होममें चौदह आहुतियाँ नित्य- संज्ञक हैं। इस प्रकार चतुर्दश आहुत्यात्मक हवन कर कर्म-निमित्तक देवताको उद्देश्यकर प्रधान
हवन करना चाहिये। अग्निकी सात जिह्वाएँ कही गयी हैं, जिनके नाम इस प्रकार है-(१) हिरण्या, (२) कनका, (३) रक्ता, (४) आरक्ता, (५) सुप्रभा, (६) बहुरूपा तथा (७) सती। इन जिला-देवियोंके ध्यान करनेसे सम्पूर्ण फलकी प्राप्ति होती है। (अध्याय १४-१६)