राजा शतानीकने सुमन्तु मुनिसे पूछा - भगवन्! स्त्रियोंके लक्षणोंको तो मैंने सुना, अब उनके सद्वृत्त (सदाचार)-को भी मैं सुनना चाहता हूँ, उसे आप बतलानेकी कृपा करें।
सुमन्तु मुनि बोले- महाबाहु शतानीक! ब्रह्माजीने ऋषियोंको स्त्रियोंके सद्वृत्त भी बतलाये हैं, उन्हें मैं आपको सुनाता हूँ, आप ध्यानपूर्वक सुनें। जब ऋषियोंने स्त्रियोंके सद्वृत्तके विषयमें ब्रह्माजीसे 'प्रश्न किया तब ब्राजी कहने लगे-मुनीश्वरो! सर्वप्रथम गृहस्थाश्रममें प्रवेश करनेवाला व्यक्ति यथाविधि विद्याध्ययन करके सत्कर्मोद्वारा धनका उपार्जन करे, तदनन्तर सुन्दर लक्षणोंसे युक्त और सुशील कन्यासे शास्त्रोक्त विधिसे विवाह करे। धनके बिना गृहस्थाश्रम केवल विडम्बना है। इसलिये धन-सम्पादन करनेके अनन्तर ही गृहस्थाश्रममें प्रवेश करना चाहिये। मनुष्य के लिये घोर नरककी यातना सहनी अच्छी है, किंतु घरमें क्षुधासे तड़पते हुए स्त्री पुत्रोंको देखना अच्छा नहीं है। फटे और मैले कुचैले वस्त्र पहने, अति दीन और भूखे स्त्री-पुत्रों को देखकर जिनका
हृदय विदीर्ण नहीं होता, वे वज्रके समान अति कठोर हैं। उनके जीवनको धिक्कार है, उनके लिये तो मृत्यु ही परम उत्सव है अर्थात् ऐसे पुरुषका मर जाना ही श्रेष्ठ है। अत: स्त्रीग्रहण करनेवाले अर्थहीन पुरुषके त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ, काम)-को सिद्धि कहाँ सम्भव है? वह स्त्री- सुख न प्राप्त कर यातना ही भोगता है। जैसे स्त्रीके बिना गृहस्थाश्रम नहीं हो सकता, उसी प्रकार धन-विहीन व्यक्तियोंको भी गृहस्थ बननेका अधिकार नहीं है। कुछ लोग संतानको ही त्रिवर्गका साधन मानते हैं अर्थात् संतानसे हो धर्म, अर्थ और कामकी प्राप्ति होती है, ऐसा समझते हैं; परंतु नीतिविशारदोंका यह अभिमत है कि धन और उत्तम स्त्री-ये दोनों त्रिवर्ग-साधनके हेतु हैं। धर्म भी दो प्रकारका कहा गया है-इष्ट धर्म और पूर्त धर्म। यज्ञादि करना इष्ट धर्म है और वापी, कूप, तालाब आदि बनवाना पूर्त धर्म है। ये दोनों धनसे ही सम्पन्न होते हैं।
दरिद्रीके बन्धु भी उससे लज्जा करते हैं और धनादयके अनेक बन्धु हो जाते हैं। धन ही निवर्गका
*लक्षणेभ्यः प्रशस्तं तु स्त्रीणां सद्वृत्तमुच्चते।
सद्वृत्तयुत्त्का या स्त्री सा प्रशस्ता न च लक्षणैः।।
मूल है। धनवान्में विद्या, कुल, शील अनेक उत्तम गुण आ जाते हैं और निर्धनमें विद्यमान होते हुए भी ये गुण नष्ट हो जाते हैं। शास्त्र, शिल्प, कला और अन्य भी जितने कर्म हैं, उन सबका तथा धर्मका साधन भी धन ही है। धनके बिना पुरुषका जन्म अजागल-स्तनवत् व्यर्थ ही है। पूर्वजन्ममें किये गये पुण्योंसे ही इस जन्ममें प्रभूत धनकी प्राप्ति होती है और धनसे पुण्य होता है। इसलिये धन और पुण्यका अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है अर्थात् ये एक-दूसरेके कारक हैं। पुण्यसे धनार्जन होता है और धनसे पुण्यार्जन होता है-
प्राक्पुण्यैर्विपुला सम्पद्धर्मकामादिहेतुजा।
भूयो धर्मेण सामुत्र तया ताविति च क्रमः॥
(ब्राह्मपर्व ६ । २३)
-इसलिये बिहान् मनुष्यको इसी रीतिसे त्रिवर्ग- साधन करना चाहिये । स्त्रीरहित तथा निर्धन पुरुषका त्रिवर्ग-साधनमें अधिकार नहीं है। अतः भार्या- ग्रहणसे पूर्व उत्तम रीतिसे अर्थार्जन अवश्य कर लेना चाहिये। न्यायोपार्जित धनकी प्रासि होनेपर दार-परिग्रह करना चाहिये। अपने कुलके अनुरूप, धन, क्रिया भादिसे प्रसिद्ध, अनिन्दित, सुन्दर तथा धर्मकी साधनभूता वान्याको प्राप्त करना चाहिये। जबतक विवाह नहीं होता है, तबतक पुरुष अर्ध- शरीर ही होता है। इसलिये यथाक्रम उचित अवसर प्राप्त हो जानेपर विवाह करना चाहिये। जैसे एक पहियेका रथ अथवा एक पखवाला पक्षी किसी कार्यमें सफल नहीं हो पाता, वैसे हो स्वौहीन पुरुष
भी प्रायः सभी धर्मकृत्योंमें असफल ही रहता है-
एकचक्रो रथो यद्वदेकपक्षो यथा खगः।
अभार्योऽपि नरः तद्वदयोग्यः सर्वकर्मसु।।
(ब्राह्मपर्व ६।३०)
पत्नी-परिग्रहसे धर्म तथा अर्थ दोनोंमें बहुत लाभ होता है और इससे आपसमें प्रीति उत्पन्न होती है, सत्प्रीतिसे कामरूपी तृतीय पुरुषार्थ भी प्राप्त हो जाता है, ऐसा विद्वानोंका कहना है। विवाह-सम्बन्ध तीन प्रकारका होता है-नीच कुलमें, समान कुलमें और उत्तम कुलमें। नीच कुलमें विवाह करनेसे निन्दा होती है। उत्तम कुलवालेके साथ विवाह करनेसे वे अनादर करते हैं। अपनेसे बड़े लोगों के साथ बनाया गया विवाह-सम्बन्ध, नीचके साथ बनाये गये विवाह-सम्बन्धके प्रायः समान ही होता है। इस कारण अपने समान कुलमें ही विवाह करना चाहिये । मनस्वी लोग विजातीय सम्बन्ध भी ठीक नहीं मानते। यह वैसा ही सम्बन्ध होता है जैसे कोवल और शुकका। जिस सम्बन्धमें प्रतिदिन स्नेहकी अभिवृद्धि होती रहती है और विपत्ति-सम्पत्तिके समय भी प्राणतक भी देने में विचार न किया जाय, बह सम्बन्ध उत्तम कहलाता है। परंतु यह बात उनमें ही होती हैं जो कुल, शील, विद्या और धन आदिमें समान होते हैं। मनुष्योंके स्नेह और कृतज्ञताकी परीक्षा विपत्तिमें ही होती है। इसलिये विवाह और परामर्श समानके साथ ही करना चाहिये, अपने से बड़े तथा छोटेके साथ नहीं। इसी में अच्छी मित्रता रहती है। (अध्याय6 )
Summary of chapter 5 of the Bhavishya Purāṇa is as follows:
The yajñopavīta ceremony — the sacred thread rite that marks a dvija's formal entry into brahmacarya and Vedic study — is taught in full. The chapter completes the sixteen-fold saṃskāra framework established across the preceding chapters, declaring this entire system the divine foundation upon which a dharmic human life is properly built.