महाराज युधिष्ठिरने पूछा- भगवन्! आप किसी ऐसे व्रत अथवा दानकी विधि बतलायें, जिसके करनेसे आयु, यश और ऐश्वर्यकी वृद्धि हो।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले-महाराज ! मैं आपके स्नेहके वशीभूत होकर संसारका कल्याण करनेको इच्छासे हिरण्यगर्ध-दानको विधि बता रहा हूँ, जिसके करनेसे मनुष्य मेरी समताको प्राप्त कर लेता है। राजन् ! सुवर्ण अग्निदेवका ज्येष्ठ पुत्र है, वह सभी धातुओ श्रेष्ठ और परम पवित्र है। उसीका दूसरा नाम हिरण्य है। वही जलके गर्भमें प्रविष्ट होकर पृथ्वीपर उत्पन्न हुआ। जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक ब्राह्मणको सुवर्णका दान देता है, वह मेरे तुल्य हो जाता है।
महाराज ! अब उसके दानकी विधि सुनिये। किसी पर्वकाल, अयनसंक्रान्ति, विषुवयोग, ग्रहणकाल, व्यतीपात, कार्तिकी पूर्णिमा, जन्मनक्षत्र, ग्रहपीड़ा, दुःस्वप्नदर्शन आदि कालोंमें प्रयाग, नैमिष, कुरुक्षेत्र, अर्बुद, गङ्गा, यमुना, गङ्गासागर-संगम और पुण्य नदियोंके तटपर हिरण्यगर्भका दान करना चाहिये अथवा घर, देवालय, बाग, तड़ाग आदि पवित्र स्थानों में यह दान करना चाहिये। सर्वप्रथम भूमिशोधनकर बारह हाथ लम्बा-चौड़ा एक मण्डप बनाकर उसे स्तम्भ, तोरण, पताका आदिसे अलंकृत करे। मण्डपके बीच में पाँच हाथकी वेदी बनाकर उसमें वितान लगाकर उसे फूलमाला आदिसे सजा दे। वेदीपर हिरण्यगर्भ-कलशको स्थापित करना चाहिये। सर्वप्रथम वस्त्र तथा आभूषणसे शिल्पीका पूजनकर ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर कार्य आरम्भ करे। शिल्पी उत्तम सुवर्णसे हिरण्यमय माङ्गलिक कलशकी रचना करे। उसकी ऊँचाई चौंसठ अङ्गुल कही गयी है और मुख ऊँचाईका तीसरा भाग हो। कलशको पेंदी मुख-परिमापसे आधा रहे। उसकी गोलाई कर्णिकाके समान हो। यह कलश सुन्दर, ग्रन्थिविहीन होना चाहिये । कलशका ढक्कन मुखके परिमापसे एक अङ्गुल अधिक रहे और उसके समीप दस अस्त्र सुवर्णनाल, सूर्यमूर्ति, स्वर्णमय सूची, क्षुर तथा कमण्डलु, छत्र, पादुका आदि सभी सामग्रियोंके साथ ब्रह्माकी मूर्ति स्थापित करनेके बाद वेदध्वनि एवं शङ्ख आदिकी मङ्गलध्वनि करते हुए ब्राह्मण उस हिरण्यगर्भ-कलशको हाथी अथवा रथसे मण्डपमें ले आये। वहाँ वेदीके ऊपर एक द्रोण तिल रखकर उसपर उसे स्थापित करना चाहिये। उसके बाद हिरण्यगर्भको कुंकुमसे उपलिप्तकर तथा रेशमी वस्वसे ढककर पुष्पमालाओंसे अलंकृत करे। तदनन्तर धूप, दीप आदिसे उसकी पूजा करे और यह कहकर नमस्कार करे-
भूलोकप्रमुखालोकास्तव गर्ने व्यवस्थिताः ॥
ब्रह्मादयस्तथा देवा नमस्ते भवनोद्भव।
नमस्ते भुवनाधार नमस्ते भुवनेश्वर ॥
नमो हिरण्यगर्भाय गर्ने यस्य पितामहः ।
(उत्तरपर्व १७६।३०-३२)
भवनोदव! भूलोक आदि सभी लोक तथा ब्रह्मा आदि देवगण आपके गर्भमें स्थित हैं। अतः विश्वाधार! विश्वेश्वर। आपको नमस्कार है। जिनके गर्भमें पितामह स्थित हैं, अतः हिरण्यगर्भको प्रणाम है।'
इस प्रकार पूजा करनेके बाद एक रात्रितक उसका अधिवासन करना चाहिये। वेदीके चारों, ओर चौरस चार, कुण्ड बनाकर उसमें चार वेदवेत्ता ब्राह्मण क्रमसे मौन होकर हवन करें। वे ब्राह्मण उत्तम वस्त्र आदिसे अलंकृत हों तथा उनकी गन्ध, धूप आदिसे पूजा कर दो-दो ताम्रपात्र देने चाहिये। वेदीके ईशानकोणमें ग्रहवेदी बनाकर उसपर नवग्रह, दस दिक्पाल और ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवकी सुवर्ण-प्रतिमा स्थापित कर गन्ध, पुष्प, अक्षत तथा वस्त्र आदिसे उनकी पूजा करे। पताका - तोरण आदिसे मण्डपको अलंकृत करे। मण्डपके द्वारोंपर रत्नयुक्त दो-दो कलश स्थापित कर तुलापुरुषदानको रीतिसे लोकपालोंका का आवाहन कर नैवेद्यादि बलि देनी चाहिये। इस यजमें पलाशकी समिधा इबनके लिये उत्तम होती है। चरु, तिल एवं गायके घृतसे व्याहति और ग्रहों तथा देवताओंके नाम-मन्त्रोंसे बीस हजार आहुतियाँ दे। शुभ मुहूर्तमें यजमान स्नानकर श्वेत वस्त्र धारण कर हिरण्यगर्भका पूजन करने के बाद इस प्रकार प्रार्थना और प्रदक्षिणा करे-
नमो हिरण्यगर्भाय विश्वगर्भाय वै नमः।
चराचरस्य जगतो गृहभूताय ते नमः॥
मात्राहं जनितः पूर्व मर्त्यधर्मा सुरोत्तम ।
त्वदर्भसम्भवादद्य दिव्यदेहो भवाम्यहम्।।
(उत्तरपर्व १७६ । ४२-४३)
'हिरण्यगर्भको नमस्कार है। विश्वगर्भको प्रणाम है। हे चराचरजगत्के गृहभूत !आपको नमस्कार है। हे सुरोत्तम। पहले मुझे मावाने जन्म दिया है। मैं मृत्युधर्मा हूँ, वही मैं आपके गर्भसे उत्पन्न होनेके कारण दिव्य शरीरयुक्त हो जाऊँ।' तदनन्तर दूध, दही तथा घृतसे परिपूर्ण उस कलशको मण्डपमें प्रवेश कराये। बायें हाथमें सुवर्णनिर्मित धर्मराजकी प्रतिमा और दाहिने हाथमें सूर्यकी सुवर्णप्रतिमा लेकर, मुट्ठी बाँधकर दोनों घुटनोंके बीच सिर करके पाँच बार साँस लेकर शिवका ध्यान करते हुए स्थित रहे। उस समय ब्राह्मण हिरण्यगर्भप्रतिमाका गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन और जातकर्म आदि संस्कार करें। अनन्तर आचार्य यजमानको उठाये । संस्कारके समय यजमान किसी व्यक्तिके मुखको न देखे। उसके बाद उठकर प्रदक्षिणा कर वेदध्वनिपूर्वक यजमानको स्नान कराना चाहिये और सुवर्ण, चाँदी, ताम्र अथवा मिट्टीके आठ कलशोंके अभिमन्त्रित जलसे 'देवस्य त्वाः' इस मन्त्रद्वारा आठ ब्राह्मण यजमानको एक पीठपर बैठाकर उसका अभिषेक करें और कहें-
अद्य जातस्य तेऽङ्गानि अभिषेक्ष्यामहे वयम्।
दिव्येनानेन वपुषा चिरं जीव सुखी भव॥
(उत्तरपर्व १७६१५४)
'आज उत्पन्न हुए तुम्हारे इन अङ्गोंका हमलोग अभिषेक कर रहे हैं। अब तुम इस दिव्य शरीरसे चिरकालतक जीवित रहो और आनन्दका उपभोग करो।' इसके बाद यजमान संकल्पपूर्वक उस हिरण्यगर्भ-प्रतिमाको ब्राह्मणों को दान कर दे, अन्य ब्राह्मणोंकी भी पूजा करे। यज्ञकी अन्य सभी सामग्रियाँ गुरुको अर्पणकर पादुका, छत्र, वस्त्र, आसन आदि सामग्री सभासद ब्राह्मणोंको देनी चाहिये। दीन, अन्ध, कृपण आदिको भोजनसे संतुष्ट करना चाहिये। उस दिन अन्न-सत्र करना चाहिये। इस विधिसे जो व्यक्ति हिरण्यगर्भका दान करता है, वह अपने कुलका उद्धार करते हुए स्वयं भी दिव्य विमानपर आरूढ़ हो स्वर्गलोकको प्राप्त कर लेता है। वहाँ एक सौ मन्वन्तरपर्यन्त इन्द्रके समान सुख भोगकर भूलोकमें जन्म लेकर पराक्रमी, धार्मिक, सत्यवादी, ब्राह्मण-गुरुओंका भक्त और शत्रुओंको जीतनेवाला सम्पूर्ण जम्बूद्वीपका राजा होता है। जो व्यक्ति इस विधिको सुनता है, वह भी सौ वर्षसे अधिक स्वर्गसुखका भोग करता है। (अध्याय १७६)