भविष्य पुराण

पाली-व्रत एवं रम्भा(कदली)-व्रत

राजा युधिष्ठिरने पूछा- भगवन् ! श्रेष्ठ स्त्रियाँ जलपूर्ण तडागों और सरोवरों में किस निमित्त स्नान-दान आदि कर्म करती हैं? इसे आय बतायें।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले-महाराज! भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षकी चतुर्दशीको बावली, कुएँ, पुष्करिणी तथा बड़े-बड़े जलाशयों आदिके पास पवित्र होकर भगवान् वरुणदेवको अर्ध्व प्रदान करना चाहिये। व्रतीको चाहिये कि तडागके तटपर जाकर फल, पुष्प, वस्त्र, दीप, चन्दन, महावर, समधान्य, बिना अग्निके स्पर्शसे पका हुआ अन्न, तिल, चावल, खजूर, नारिकेल, बिजौरा नीबू, नारंगी, अंगूर, दाडिम, सुपारी आदि उपचारोंसे वारुपीसहित वरुणदेवकी एवं जलाशयको विधिपूर्वक पूजा करे और उन्हें अर्घ्य प्रदान कर इस प्रकार

उनकी प्रार्थना करे-

वरुणाय नमस्तुभ्यं नमस्ते यादसाम्पते।

अपाम्पते नमस्तेऽस्तु रसानाम्पतये नमः॥

मा क्लेदं मा च दौर्गन्थ्यं विरस्यं मा मुखेऽस्तु मे।

वरुणो वारुणीभर्ता वरदोऽस्तु सदा मम ।।

(उत्तरपर्व ९१।७-८)

'जलचर जीवोंके स्वामी वरुणदेव! आपको नमस्कार है। सभी जल एवं जलसे उत्पन्न रस- द्रव्योंके स्वामी वरुणदेव! आपको नमस्कार है। मेरे शरीरयों पसीना, दुर्गन्ध था विरसतार आदि मेरे मुखमें न हों। वारुणीदेवीके स्वामी वरुणदेव । आप मेरे लिये सदा प्रसन्न एवं वरदायक बने रहें।'

व्रतीको चाहिये कि इस दिन बिना अग्निके पके हुए भोजन अर्थात् फल आदिका भोजन करे।

इसका अर्थ कृपाडाग आदि

१- पाली' शब्द जटिल है, यह कोशोंमें प्रायः नहीं मिलता। इसका अर्थ कूप, वडाग आदि जलाशयों की रक्षाके लिये बने डरी है। उसी पर बैठकर ल्जियाँ इस व्रतको सम्पन्न करती हैं। वरुणदेव कि सभी जलों में रहते हैं, अतः इसे वहीं बैठकर करना चाहिये।

२- चर आदिसे मुखका स्वाद बिगड़ जाता है, उसे विरसता कहते हैं।

इस विधिसे जो पाली-व्रतको करता है, वह तरक्षण सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। आयु, यश और सौभाग्य प्राप्त करता है तथा समुद्रके जलकी भौति उसके धनका कभी अन्त नहीं होता।

भगवान् श्रीकृष्णाने पुनः कहा-राजन्! अब मैं ब्रह्माजीकी सभा देवर्षियोंक द्वारा पूछे जानेपर, देवलमुनिप्रोक्त रामा-व्रतका वर्णन कर रहा हूँ। यह भी भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशीको ही होता है। सभी देवताओं, गन्धों तथा अप्सराओंने भी इस व्रतका अनुष्ठान कर कदली-वृक्षको सादर अर्घ्य प्रदान किया था। व्रतीको चाहिये कि इस चतुर्दशीको नाना प्रकारके फल, अंकुरित अत्रों, सप्तधान्य, दीप, चन्दन, दही, दूर्वा, अक्षत, वस्त्र, पश्चात्र, जायफल, इलायची तथा लवंग आदि उपचारोंसे कदली-वृक्षका पूजनकर उसे निम्रलिखित मन्त्रसे अर्घ्य प्रदान करे-

चित्या त्वं कन्दलदलैः कदली कामदायिनि।

शरीरारोग्यलावण्यं देहि देवि नमोऽस्तु ते॥

(उत्तरपर्व २२॥७)

'कदली देवि! आप अपने पत्तोंसे वायुके व्याजसे ज्ञान एवं चेतनाका संचार करती हुई सभी कामनाओंको देती है। आप मेरे शरीरमें रूप, लावण्य, आरोग्य प्रदान करनेकी कृपा करें। आपको नमस्कार है*।'

इसके अनन्तर स्वयं पके हुए फल आदिका भोजन ग्रहण करे। जो भी पुरुष अथवा स्त्री भक्तिसेइस व्रतको करती है, उसके वंशमें दुर्भगा, दरिद्रा, वन्ध्या, पापिनी, व्यभिचारिणी, कुलटा, पुनर्भू, दुष्टा और पतिकी विरोधिनी कोई कन्या नहीं उत्पन्न होती। इस व्रतको करनेपर नारी सौभाग्य, पुत्र-पौत्र, धन, आयुष्य तथा कीर्ति आदि प्राप्त कर सौ वर्षपर्यन्त अपने पतिके साथ आनन्दपूर्वक रहती है। इस रम्भा-ब्रतको गायत्रीने स्वर्गमें किया था। इसी प्रकार गौरीने कैलासमें, इन्द्राणीने नन्दनवनमें, लक्ष्मीने श्वेतद्वीपमें, राज्ञीने रविमण्डलमें, अरुन्धतीने दारुवनमें, स्वाहाने मेरुपर्वतपर, सीतादेवीने अयोध्यामें वेदवतीने हिमाचलपर और भानुमतीने नागपुरमें इस व्रतको किया था। (अध्याय ९१-९२)