भविष्य पुराण

आल्हा-खण्ड (आल्हा-ऊदलकी कथा)- का उपक्रम

ऋषियोंने पूछा-सूतजी महाराज! आपने महाराज विक्रमादित्यके इतिहासका वर्णन किया। द्वापरयुगके समान उनका शासन धर्म एवं न्यायपूर्ण था और लम्बे समयतक इस पृथ्वीपर रहा। महाभाग! उस समय भगवान् श्रीकृष्णने अनेक लीलाएँ की थीं। आप उन लीलाओंका हमलोगोंसे वर्णन कीजिये, क्योंकि आप सर्वज्ञ हैं।

श्रीसूतजीने मङ्गल-स्मरणपूर्वक कहा-

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।

देवीं सरस्वती व्यासं ततो जयमुदीरयेत्॥

(प्रतिसर्गपर्व १।२)

भगवान् नर नारायणके अवतारस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण एवं उनके सखा नर श्रेष्ठ अर्जुन, उनको लीलाओंको प्रकट करनेवाली भगवती सरस्वती तथा उनके चरित्रों का वर्णन करनेवाले वेदव्यासको नमस्कारकर अष्टादश पुराण, रामायण और महाभारत आदि जय नामसे व्यपदिष्ट ग्रन्धोका वाचन करना चाहिये।

मुनिगणो! भविष्य नामक महाकल्पके वैवस्वत मन्वन्तरके अट्ठाईसवें द्वापरयुगके अन्तमें कुरुक्षेत्रका प्रसिद्ध महायुद्ध हुआ। उसमें युद्ध कर दुरभिमानी सभी कौरवोंपर पाण्डवोंने अठारहवें दिन पूर्ण विजय प्राप्त की। अन्तिम दिन भगवान् श्रीकृष्णने कालकी दुर्गतिको जानकर योगरूपी सनातन शिवजीकी मनसे इस प्रकार स्तुति की-

शान्तस्वरूपी, सब भूतोंके स्वामी, कपर्दी, कालकर्ता, जगद्भर्ता, पाप-विनाशक रुद्र ! मैं आपको बार-बार प्रणाम करता हूँ। भगवन् ! आप मेरे भक्त पाण्डवोंकी रक्षा कीजिये।

इस स्तुतिको सुनकर भगवान् शंकर नन्दीपर आरूढ़ हो हाथमें त्रिशूल लिये पाण्डवोंके शिविरकी रक्षाके लिये आ गये। उस समय महाराज युधिष्ठिरकी आज्ञासे भगवान् श्रीकृष्ण हस्तिनापुर गये थे और पाण्डव सरस्वतीके किनारे रहते थे।

मध्यरात्रिमें अश्वत्थामा, भोज (कृतवर्मा) और कृपाचार्य-ये तीनों पाण्डव-शिविर के पास आये और उन्होंने मनसे भगवान् रुद्रकी स्तुति कर उन्हें प्रसन्न कर लिया। इसपर भगवान् शंकरने उन्हें पाण्डव शिविरमें प्रवेश करनेकी आज्ञा दे दी। बलवान् अश्वत्थामाने भगवान शंकरद्वारा प्रास तलवारसे धृष्टद्युम्न आदि वीरोंकी हत्या कर दी, फिर वह कृपाचार्य और कृतवकि साथ वापस चला गया। वहाँ एकमात्र पार्षद सूत ही बचा रहा, उसने इस जनसंहारकी सूचना पाण्डवोंको दी। भीम आदि

पाण्डवोंने इसे शिवजीका ही कृत्य समझा; वे क्रोधसे तिलमिला गये और अपने आयुधोंसे देवाधिदेव पिनाकीसे युद्ध करने लगे। भीम आदिद्वारा प्रयुक्त अस्त्र-शस्त्र शिवजीके शरीरमें समाहित हो गये। इसपर भगवान् शिवने कहा कि तुम श्रीकृष्णके उपासक हो अतः हमारे द्वारा तुमलोग रक्षित हो, अन्यथा तुमलोग वधके योग्य थे। इस अपराधका फल तुम्हें कलियुगमें जन्म लेकर भोगना पड़ेगा। ऐसा कहकर वे अदृश्य हो गये और पाण्डव बहुत दुःखी हुए। वे अपराधसे मुक्त होनेके लिये भगवान् श्रीकृष्णकी शरणमें आये। निःशस्त्र पाण्डवनि श्रीकृष्णके साथ एकाग्र मनसे शंकरजीकी स्तुति की। इसपर भगवान् शंकरने प्रत्यक्ष प्रकट होकर उनसे वर माँगनेको कहा।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले-देव! पाण्डवोंके जो शस्त्रास्त्र आपके शरीरमें लीन हो गये हैं, उन्हें पाण्डवोंको वापस कर दीजिये और इन्हें शापसे भी मुक्त कर दीजिये।

श्रीशिवजीने कहा- श्रीकृष्णचन्द्र! मैं आपको प्रणाम करता हूँ। उस समय मैं आपको मायासे मोहित हो गया था। उस मायाके अधीन होकर मैंने यह शाप दे दिया। यद्यपि मेरा वचन तो मिथ्या नहीं होगा तथापि ये पाण्डव तथा कौरव अपने अंशोंसे कलियुगमें उत्पन्न होकर अंशतः अपने पापोंका फल भोगकर मुक्त हो जायेंगे। युधिष्ठिर वत्सराजका पुत्र होगा, उसका नाम बलखानि (मलखान) होगा, वह शिरीष नगरका अधिपति होगा। भीमका नाम वीरण होगा और वह वनरसका राजा होगा। अर्जुनके अंशसे जो जन्म लेगा, वह महान् बुद्धिमान् और मेरा भक्त होगा। उसका जन्म परिमलके यहाँ होगा और नाम होगा ब्रह्मानन्द। महाबलशाली नकुलका जन्म कान्यकुब्जय रत्नभानुके पुत्रके रूपमें होगा और नाम होगा लक्षण। सहदेव भीमसिंहका पुत्र होगा और उसका नाम होगा देवसिंह । धृतराष्ट्रके अंशसे अजमेर में पृथ्वीराज जन्म लेगा और द्रौपदी पृथ्वीराजकी कन्याके रूपमें वेला नामसे प्रसिद्ध होगी। महादानी कर्ण तारक नामसे जन्म लेगा। उस समय रक्तबीजके रूपमें पृथ्वीपर मेरा भी अवतार होगा। कौरव माया-युद्ध में निष्णात होंगे तथा पाण्डु-पक्षके योद्धा धार्मिक और बलशाली होंगे।

सूतजी बोले-ऋषियो ! यह सब बातें सुनकर श्रीकृष्ण मुस्कराये और उन्होंने कहा 'मैं भी अपनी शक्ति-विशेषसे अवतार लेकर पाण्डवोंकी सहायता करूँगा। मायादेवीद्वारा निर्मित महावती नामकी पुरीमें देशराजके पुत्र रूपमें मेरा अंश उत्पन्न होगा, जो उदयसिंह (ऊदल) कहलायेगा, वह देवकीके गर्भसे उत्पन्न होगा। मेरे वैकुण्ठधामका अंश आह्वाद नामसे जन्म लेगा, वह मेरा गुरु होगा। अग्निवंशसे उत्पन्न राजाओंका विनाश कर मैं (श्रीकृष्ण-उदयसिंह) धर्मकी स्थापना करूँगा।' श्रीकृष्णको यह बात सुनकर शिवजी अन्तर्हित हो गये।