राजा युधिष्ठिरने कहा-भगवन् ! भक्तिपूर्वक नारायणकी आराधना करनेसे सभी मनोवाञ्छित फल प्राप्त हो जाते हैं, किंतु स्त्री-पुरुषोंके लिये संतानहीन होनेसे अधिक कोई दुःख और शोक नहीं है, परंतु कुपुत्रता तो और भी महान् दुःखका कारण है। योग्य संतान सब सुखोंका हेतु है। जगत् में वे धन्य हैं, जो सर्वगुणसम्पन्न, आरोग्य, बलवान्, धर्मज्ञ, शास्त्रवेत्ता, दीन-अनार्थोके आश्रय, भाग्यवान्, हृदयको आनन्द देनेवाले और दीर्घायु पुत्र प्राप्त करते हैं। प्रभो! मैं ऐसा व्रत सुनना चाहता हूँ कि जिसके करनेसे ऐसे शुभ लक्षणोंसे युक्त पुत्र उत्पन्न हों।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले-महाराज! इस सम्बन्धमें एक प्राचीन इतिहास प्रसिद्ध है। हैहयवंशमें माहिष्मती (महेश्वर) नगरीमें कृतवीर्य नामका एक महान् राजा हुआ। उसको एक हजार रानियों में प्रधान तथा सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न शीलधना नामकी एक रानी थी। उसने एक दिन पुत्र-प्राप्तिके लिये ब्रह्मवादिनी मैत्रेयीसे पूछा। मैत्रेयोने उसको श्रेष्ठ अनन्तवतका उपदेश दिया और कहा–'शोलधने ! स्त्री या पुरुष जो कोई भी भगवान् जनार्दनकी आराधना करता है, उसके सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। मार्गशीर्ष मासमें जिस दिन मृगशिरा नक्षत्र हो उस दिन स्नान कर गन्ध, पुष्प, धूप, दीप आदिसे अनन्तभगवान्के वाम चरणका पूजन करे और प्रार्थना कर एकाग्रचित्त हो बारम्बार प्रणाम कर ब्राह्मणको दक्षिणा दे। रात्रिके समय तैल-क्षारवर्जित भोजन करे। इसी विधिसे पौष मासमें पुष्य नक्षत्रमें भगवान के बाये कटिप्रदेशका पूजन करे। माघ मास मघा नक्षत्र भगवान्की बायों भुजाका पूजन करे। फाल्गुनमें फाल्गुनी नक्षमें बायें स्कयका पूजन करे। इन चार महीनोंमें गोमूत्रका प्राशन करे और सुवर्णसहित तिल ब्राह्मणको दान दे।'
चैत्रमें चित्रा नक्षत्रमें भगवान्के दाहिने कन्धेका पूजन करे, वैशाखमें विशाखा नक्षत्रमें दाहिनी भुजाका पूजन करे, ज्येष्ठमें ज्येष्ठा नक्षत्र में दाहिने कटिप्रदेशका पूजन करे। इसी प्रकार आषाढ़ मासमें आषाढ़ा नक्षत्रमें दाहिने पैरका पूजन करे। इन चार महीनोंमें पञ्चगव्यका प्राशन करे। ब्राह्मणको सुवर्ण-दान दे और रात्रिको भोजन करे। श्रावण मास में श्रवण नक्षत्रमें भगवान् विष्णुके दोनों चरणों का पूजन करे। भाद्रपद मासमें उत्तराभाद्रपद नक्षत्रमें गुह्य-स्थानका पूजन करे। आश्विनमें अश्विनी नक्षत्र में हृदयका पूजन करे और कार्तिक मासमें कृत्तिका नक्षत्रमें अनन्तभगवान्के सिरका पूजन करे। इन चार महीनों में घृतका प्राशन करे और घृत ही ब्राह्मणको दान दे।
मार्गशीर्ष आदि प्रथम चार मासोंमें घृतसे, द्वितीय चैत्र आदि चार मासों में शालिधान्यसे और तृतीय श्रावण आदि चार मासोंमें अनन्तभगवान्की प्रीतिके लिये दुग्ध हवन करे । हविष्यान्नका भोजन करना सभी मासों में प्रशस्त माना गया है। इस प्रकार बारह महीनों में तीन पारणा कर वर्षके अन्त में सुवर्णकी अनन्तभगवान्की मृति और चाँदीके हल-मूसल बनाये। बादमें मूर्तिको लाभपीठपर स्थापित कर दोनों ओर हल, गूसल रखकर पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि उपचारोंसे पूजन को। नक्षत्र, देवता, मास, संवत्सर और नक्षत्रों के अधिपति चन्द्रमाका भी विधिपूर्वक पूजन करे। अनन्तर पुराणवेत्ता, धर्मज्ञ, शान्तप्रिय ब्राहाणका वस्त्र-आभूषण आदिसे पूजन कर यह सब सामग्री उसे अर्पण कर दे और 'अनन्तः प्रीयताम' यह वाक्य कहे। पीले अन्य ब्राह्मणांको भी भोजन, दक्षिणा आदि देकर संतुष्ट
करे। इस विधिसे जो इस अनन्तव्रतको सम्पन्न करता है, वह सभी अभीष्ट फलोंको प्राप्त करता है। शीलधने ! यदि तुम उत्तम पुत्रकी इच्छा रखती हो तो विधिपूर्वक श्रद्धासे इस अनन्तव्रतको करो।
भगवान् श्रीकृष्णने कहा-महाराज! इस प्रकार मैत्रेयीसे उपदेश प्राप्त कर शीलधना भक्तिपूर्वक व्रत करने लगी। व्रतके प्रभावसे भगवान् अनन्त संतुष्ट हुए और उन्होंने उसे एक श्रेष्ठ पुत्र प्रदान किया। पुत्रके जन्म होते ही आकाश निर्मल हो गया। आनन्ददायक वायु प्रवाहित होने लगी। देवगण दुन्दुभि बजाने लगे। पुष्पवृष्टि होने लगी, सारे जगत्में मङ्गल होने लगा। गन्धर्व गाने लगे और अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। सभी लोगोंका मन धर्ममें आसक्त हो गया। राजा कृतवीर्यने अपने पुत्रका नाम अर्जुन रखा। कृतवीर्यका पुत्र होनेसे वही अर्जुन कार्तवीर्य कहलाया। कार्तवीर्यार्जुनने कठिन तप किया और विष्णुभगवान्के अवतार श्रीदत्तात्रेयजीकी आराधना की। भगवान दत्तात्रेयने यह वर दिया कि 'अर्जुन! तुम चक्रवर्ती सम्राट् होओगे। जो व्यक्ति सार्यकाल और प्रातः 'नमोऽस्तु कार्तवीर्याय' यह वाक्य उच्चारण करेगा, उसे प्रस्थभर तिल-दानका पुण्य प्राप्त होगा और जो तुम्हारा स्मरण करेंगे, उन पुरुषोंका द्रव्य कभी नष्ट नहीं होगा।' भगवान् से वर प्राप्त कर राजा कार्तवीर्य धर्मपूर्वक सप्तद्वीपा वसुमतीका पालन करने लगे। उन्होंने बड़ी-बड़ी दक्षिणावाले यज्ञ सम्पन्न किये और शत्रुओंपर विजय प्राप्त की। इस तरह रानी शीलधनाने अनन्तव्रतके प्रभावसे अति उत्तम पुत्र प्राप्त किया, पिताको पुत्रजनित कोई भी दुःख नहीं हुआ। जो पुरुष अथवा स्त्री इस कार्तवीर्यके जन्मको अवण करते हैं, वे सात जन्मपर्यन्त संतानका दुःख प्राप्त नहीं करते। जो इस अनन्त-व्रतको भक्तिसे करता है, वह उत्तम संतान और ऐश्वर्यको प्राप्त करता है। (अध्याय १०६)