भगवान् श्रीकृष्ण बोले-महाराज ! अब आप चैत्र, भाद्रपद तथा माघके शुक्ल तृतीया-व्रतोंके विषयमें सुनें। इन व्रतोंसे रूप, सौभाग्य तथा उत्तम पुत्रकी प्राप्ति होती है। इस विषयमें आप एक वृत्तान्त सुनें-
भगवती पार्वतीकी जया और विजया नामकी दो सखियाँ थीं। किसी समय मुनि-कन्याओंने उन दोनोंसे पूछा कि आप दोनों तो भगवती पार्वतीके साथ सदा निवास करती हैं। आप सब यह बतायें कि किस दिन, किन उपचारों और मन्त्रोंसे पूजा करनेसे भगवती पार्वती प्रसन्न होती हैं।
इसपर जया बोली–मैं सभी कामनाओंको सिद्ध करनेवाले व्रतका वर्णन करती हूँ। चैत्र मासके शुक्ल पक्षको तृतीयाको प्रातःकाल उठकर दन्तधावन आदि क्रियाओंसे निवृत्त होकर इस व्रतके नियमको ग्रहण करे। कुंकुम, सिंदूर, रक्त वस्त्र, ताम्बूल आदि सौभाग्यके चिह्नोंको धारणकर भक्तिपूर्वक देवीको पूजा करे। प्रथम अतिशय सुन्दर एक मण्डप बनवाकर उसके मध्य में एक मनोहर मणिजटित वेदीकी रचना करे। एक हस्त प्रमाणका कुण्ड बनाये, तदनन्तर खानकर उत्तम वस्त्र धारणाकर देवताओं और पितरोंको पूजा कर देवीके मण्डपमें जाय और पार्वती, ललिता, गौरी, गान्धारी, शांकरी, शिवा, उमा और सती-इन आठ नामोंसे भगवतीकी पूजा करे। कुंकुम, कपूर, अगरु, चन्दन आदिका लेपन करे। अनेक प्रकारके सुगन्धित पुष्प चढ़ाकर धूप, दीप आदि उपचार अर्पण करे। लड्डू, अनेक प्रकारके अपूप तथा विभिन्न प्रकारके घृतपक्व नैवेद्य, जीरक, कुंकुम, नमक, ईख और ईखका रस, हल्दी, नारिकेल, आमलक, अनार, कूष्माण्ड, कर्कटी, नारंगी, कटहल, बिजौरा नींबू आदि ऋतुफल भगवतीको निवेदित करे। गृहस्थोके उपकरण-ओखली, सिल, सूप, टोकरी आदि तथा शरीरको अलंकृत करनेकी सामग्रियाँ भी निवेदित करे। शङ्ख, तूर्य, मृदङ्ग आदिके शब्द और उत्तम गीतोंके साथ महोत्सव करे। इस प्रकार भक्तिपूर्वक अपनी शक्तिके अनुसार पार्वतीजीको पूजा करके कुमारी कन्याएँ सौभाग्यकी अभिलाषासे प्रदोषके समय नये कलशोंमें जल लाकर उससे स्रान करें। पुन: पूर्वोक्त विधिसे भगवतीको पूजा करे। प्रत्येक प्रहरमें पूजा और घृतसमन्वित तिलोंसे हवन करे। भगवतीके सम्मुख पड़ासन लगाकर रात्रि जागरण करे। नृत्यसे भगवान् शंकर, गीतसे भगवती पार्वती और भक्तिसे सभी
देवता प्रसन्न होते हैं। ताम्बूल, कुंकुम और उत्तम- उत्तम पुष्प सुवासिनी स्त्रीको अर्पित करे।
प्रात:-नानके अनन्तर पार्वतीजीकी पूजा कर गुड़, लवण, कुंकुम, कपूर, अगरु, चन्दन आदि द्रव्योंसे यथाशक्ति तुलादान करे और देवीसे क्षमा-प्रार्थना करे। ब्राह्मणों तथा सुवासिनी स्त्रियोंको भोजन कराये। नैवेद्यका वितरण करे । इससे उसका कर्म सफल हो जाता है।
भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको भी चैत्र-तृतीयाकी भाँति व्रत एवं पूजन करना चाहिये। इसमें सप्तधान्योंसे एक सूपमें उमाकी मूर्ति बनाकर पूजा करनी चाहिये तथा गोमूत्र-प्राशन करना चाहिये। यह व्रत उत्तम सौन्दर्य-प्रदायक है।
इसी प्रकार माघ मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको चैत्र-तृतीयाकी भाँति पूर्वोक्त क्रियाओंको करनेके पश्चात् कुन्द-पुष्पोंसे तुलादान करे तथा चतुर्थीको गणेशजीका भी पूजन करे।
इस विधिसे जो स्त्री व्रत और तुलादान करती है, वह अपने पतिके साथ इन्द्रलोकमें निवास कर ब्रह्मलोकमें और वहाँसे शिवलोकमें जाती है। इस लोकमें भी वह रूप, सौभाग्य, संतान, धन आदि प्राप्त करती है। उसके वंशमें दुर्भगा कन्या और दुर्विनीत पुत्र कभी भी उत्पन्न नहीं होता। घरमें दारिद्रय, रोग, शोक आदि नहीं होते। जो कन्या इस व्रतको करती है तथा ब्राह्मणकी पूजा करती है, वह अभीष्ट वर प्राप्त कर संसारका सुख भोगती है। (अध्याय २८)