भविष्य पुराण

सौर-धर्म-निरूपणमें सूर्यावतारका कथन

शतानीकने पूछा-ब्रह्मन् ! जिन तेजस्वी भगवान् सूर्यनारायणने ब्रह्माजीको वर प्रदान किया, देवताओं और पृथ्वीको उत्पन्न किया, जो ब्रह्मादि देवताओंको प्रकाशित करनेवाले तथा समस्त जगत्के पालक, महाभूतोंसहित चौदह लोकोंके स्रष्टा, पुराणों में तेजरूपसे स्थित एवं पुराणोंकी आत्मा हैं तथा अग्निमें स्वयं स्थित हैं, जिनके सहस्रों सिर, सहस्रों नेत्र तथा सहस्रों चरण हैं, जिनके मुखसे लोकपितामह ब्रह्मा, वक्षःस्थलसे भगवान् विष्णु और ललाटसे साक्षात् भगवान् शिव उत्पन्न हुए हैं, जो विनों के विनाशक एवं अन्धकारनाशक, लोककी शान्तिके लिये जो अग्नि, वेदि, कुशा, सुवा, प्रोक्षणी, व्रत आदिको उत्पन्न कर इनके द्वारा हव्य भाग ग्रहण करते हैं, जो युगके अनुरूप कर्मोंके विभाजन तथा क्षण, काल, काष्ठ, मुहूर्त, तिथि, मास, पक्ष, संवत्सर, ऋतु, कालयोग, विविध प्रमाण और आयुके उत्पादक तथा विनाशक हैं एवं परमज्योति और परम तपस्वी हैं, जो अच्युत तथा परमात्माके नामसे जाने जाते हैं, वे ही महर्षि

कश्यपके यहाँ पुत्रके रूपमें कैसे अवतरित हुए? ब्रह्मादि जिनकी उपासना करते हैं तथा बेद- वेत्ताओं में जो उत्तम और देवताओं में प्रभु विष्णु हैं, जो सौम्योंमें सौम्य और अग्निमें तेज:स्वरूप हैं, मनुष्यों में मनरूपसे तथा तपस्वियों में तप- रूपसे विद्यमान है, जो विग्रहोंमें विग्रह हैं, जो देवताओं और मनुष्योंसहित समस्त लोकोंको उत्पन्न करनेवाले हैं, वे देवों के देव भगवान् सूर्य किसलिये अदितिके गर्भसे स्वयं उत्पन्न हुए? ब्रह्मन् ! इस विषयमें मुझे महान् आश्चर्य हो रहा है, भगवान् सूर्यकी उत्पत्तिसे आचर्यचकित होकर ही मैंने आपसे उनके आख्यानको पूछा है। महामुने! भगवान् सूर्यके बल-वीर्य, पराक्रम, यश और उज्वलित तेजका आप वर्णन करें।

सुमन्तु मुनि बोले-राजन्! आपने भगवान् भास्करकी उत्पत्तिके साम्बन्धमें बहुत ही जटिल प्रश्न पूछा है। मैं अपनी सामर्थ्य के अनुसार कह न रहा हूँ। आप उसे श्रद्धा-भक्तिपूर्वक सुनें।

जो भगवान् सूर्य सहसों नेत्रोंवाले, सहस्रों किरणोंसे युक्त और सहस्रों सिर तथा सहनों हाथवाले हैं, सहस्रों मुकुटोंसे सुशोभित तथा सहस्रों भुजाओंसे युक्त एवं अव्यय हैं, जो सभी लोकोंके कल्याण एवं सभी लोकोंको प्रकाशित करनेके लिये अनेक रूपोंमें अवतरित होते हैं, वही भगवान् सूर्य कश्यपद्वारा अदितिके गर्भसे पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए। महाराज! कश्यप और अदितिसे जो-जो पुत्र उत्पन्न होते थे, वे उसी क्षण मर जाते थे। इस पुत्र-विनाशको देखकर पुत्र-शोकसे दुःखी माता अदिति व्याकुल हो अपने पति महर्षि कश्यपके पास गयीं। अदितिने देखा कि महर्षि कश्यप अग्निके समान तेजस्वी, दण्ड धारण किये कृष्ण मृगचर्मपर आसीन तथा वल्कल धारण किये हुए भगवान् भास्करके सदृश देदीप्यमान हो रहे हैं। इस प्रकारसे उन्हें स्थित देखकर अदितिने प्रार्थना करते हुए कहा 'देव! आप इस तरह निश्चिन्त होकर क्यों बैठे हैं? मेरे पुत्र उत्पत्र होते ही मृत्युको प्राप्त होते जा रहे हैं। अदितिके इस वचनको सुनकर ऋषियोंमें उत्तम कश्यपजी ब्रह्मलोक गये और उन्होंने अदितिकी बातें ब्रह्माजीको बतलायीं।'

ब्रह्माजीने कहा-पुत्र - हमें भगवान् भास्करके परम दुर्लभ स्थानपर चलना चाहिये। यह कहकर ब्रह्मा कश्यप और अदितिके साथ विमानपर आरूढ होकर सूर्यदेवके भवनकों गये। उस समय सूर्यलोकको सभामें कहीं वेद-ध्वनि हो रही थी, कहीं यज्ञ हो रहा था। ब्राहाण वेदको शिक्षा दे रहे थे। अठारह पुराणों के ज्ञाता, विद्याविशारद, मीमांसक, नैयायिक, वेदान्तविद् लोकायतिक आदि सभी सूर्यको उपासनामें लगे हुए थे। विद्वान् ब्राह्मण जप, तप, हवन आदि संलग्न थे। उस सभामें रश्मिमाली भगवान् दिवाकरको महर्षि कश्यप आदिने देखा देवताओंके गुरु बृहस्पति, असुरोंके गुरु शुक्राचार्य आदि भी. बहोंपर भगवान् सूर्वकी उपासना कर रहे थे। दक्षा, प्रचेता, पुलह,  मरीचि, भृगु, अत्रि, वसिष्ठ, गौतम, नारद, अन्तरिक्ष तेज, पृथ्वी, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, प्रकृति विकृति, अङ्ग-ठपाङ्गोंसहित चारों वेद और लद ऋतु, संकल्प, प्रणव आदि बहुत-से मूर्तिमान् होक भगवान् भास्करकी स्तुति-उपासना कर रहे थे अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष, द्वेष, हर्ष, मोह, मत्स मान, वैष्णव, माहेश्वर, सौर, मारुत, विश्वकर्मा तक अश्विनीकुमार आदि सुन्दर-सुन्दर वचनोंसे भगवा सूर्यका गुणगान कर रहे थे।

ब्रह्माजीने भगवान् भास्करसे निवेदन किया- भगवन्! आप देवमाता अदितिके गर्भसे उत्प होकर लोकका कल्याण कीजिये। इस त्रैलोक्यन अपने तेजसे प्रकाशित कीजिये। देवताओंको शर दीजिये। असुरोंका विनाश एवं अदिति-पुत्रोंक रक्षा कीजिये।

भगवान् सूर्यने कहा- आप जैसा कह रहे हैं, वैसा ही होगा। प्रसन्न होकर महर्षि कश्य देवी अदितिके साथ अपने आश्रममें चले और ब्रह्माजी भी अपने लोकको चले गये।

सुमन्तु मुनि बोले- महाराज! कालान्तर भगवान् सूर्य अदितिके गर्भसे उत्पन्न हुए, जिस तीनों लोकोंमें सुख छा गया और दैत्योंका विना हो गया, देवताओंको वृद्धि हुई तथा उनके प्रभाव सभी लोगोंमें परम आनन्द व्याप्त हो गया।

इस प्रकार देवमाता अदितिके गर्भसे भगवा सूर्यक जन्म ग्रहण करनेपर आकाशमें दुन्दुभिव बजने लगी, गन्धर्वगण गान करने लगे। द्वादशात्म भगवान् सूर्यकी सभी देवगण, ऋषि महर्षि तक्ष दक्ष प्रजापति आदि स्तुति करने लगे। उस समा एकादश रुद्र, अश्विनीकुमार, आठों वसु, महाबल गरुड, विश्वेदेव, साध्य, नागराज वासुकि त अन्य बहुत-से नाग और राक्षस भी हाथ जो खड़े थे। पितामह ब्रह्मा भी स्वयं पृथ्वीपर

और सभी देवता एवं ऋषि-महर्षियोंसे बोले- 'देवर्षिगण। जिस प्रकार बालकरूपमें उत्पन्न होकर ये सभीको देख रहे हैं, उसी प्रकार ये लोकेश्वर श्रीमान् और विवस्वान्-रूपमें विख्याच होंगे। देव, दानव, यक्ष, गन्धर्व आदिके जो कारण हैं वे ही आदिदेव भगवान् आदित्य हैं। इस प्रकार कहकर पितामह ब्रह्माने देवताओं और ऋषियोंसहित उन्हें नमस्कार कर विधिपूर्वक उनकी अर्चना की तत्पश्चात् वे अपने-अपने लोकोंको चले गये।

वेदोंद्वारा गेय तथा इन्द्रादि बारह नामोंसे युक्त भगवान् सूर्यको पुत्ररूपमें प्राप्तकर महर्षि कश्यप अदितिके साथ परम संतुष्ट हो गये एवं सारा विश्व हर्षसे व्याप्त हो गया तथा सभी राक्षस भयभीत हो गये

भगवान् सूर्य बोले-महर्षे! आपके पुत्र नष्ट हो जाते थे, इसलिये गर्भको सिद्धिके लिये मैं आपके यहाँ पुत्ररूपमें उत्पन्न हुआ हूँ।

सुमन्तु मुनि बोले-राजन् ! इस प्रकार भगवान् भास्करकी आराधना करके ब्रह्माजीने सृष्टि करनेका वर प्राप्त किया और कश्यपमुनिने भी भगवान् भास्करको प्रसन्नकर उन्हें पुत्ररूपमें प्राप्त कर लिया। (अध्याय १५७ -१५९)