भगवान् श्रीकृष्णने कहा-साम्ब ! अब मैं सूर्यके विशिष्ट अवसरोंपर होनेवाले व्रत-उत्सव एवं पूजनकी विधियोंका वर्णन करता हूँ, उन्हें सुनो। किसी मासके शुक्लपक्षकी सप्तमी, ग्रहण या संक्रान्तिके एक दिन-पूर्व एक बार हविष्यानका भोजन कर सायंकालके समय भलीभाँति आचमन आदि करके अरुणदेवको प्रणाम करना चाहिये तथा सभी इन्द्रियोंको संयतकर भगवान् सूर्यका ध्यान कर रात्रिमें जमीनपर कुशकी शय्यापर शयन करना चाहिये। दूसरे दिन प्रातःकाल उठकर विधिपूर्वक स्नान सम्पन्न करके संध्या करे तथा पूर्वोक्त मन्त्र 'ॐ खखोल्काय स्वाहा' का जप एवं सूर्यभगवान्की पूजा करे। अग्रिको सूर्यतापके रूपमें समझकर वेदी बनाये और संक्षेपमें हवन तथा तर्पण करे। गायत्री-मन्त्रसे प्रोक्षणकर पूर्वाग्रऔर उत्तरान कुशा बिछाये। अनन्तर सभी पात्रोंका शोधन कर दो, कुशाओंकी प्रादेशमात्रकी एक पवित्री बनाये। उस पवित्रीसे सभी वस्तुओंका प्रोक्षण करे, घीको अग्निपर रखकर पिघला ले, उत्तरको ओर पात्र में उसे रख दे, अनन्तर जलते हुए उल्गुकसे पर्वग्रिकरण करते हुए घृतका तीन बार उत्प्लवन करे। सुवा आदिका कुशोंके द्वारा परिमार्जन और सम्प्रोक्षण करके अनिमें सूर्यदेवकी पूजा करे और दाहिने हाधमें खुवा ग्रहणकर मूल मन्त्रसे हवन करे। मनोयोगपूर्वक मौन धारण कर सभी क्रियाएँ सम्पन्न करनी चाहिये। पूर्णाहुतिके पश्चात् तर्पण करे। अनन्तर ब्राह्मणोंको उत्तम भोजन कराना चाहिये और यथाशक्ति उनको दक्षिणा भी देनी चाहिये। ऐसा करनेसे मनोवाञ्छित फलकी प्राप्ति होती है।
माघ मासकी सप्तमीको वरुण नामक सूर्यकी पूजा करे। इसी प्रकार क्रमशः फाल्गुनमें सूर्य, चैत्रमें वैशाख, वैशाखमें धाता, ज्येष्ठमें इन्द्र, आषाढमें रवि, श्रावणमें नभ, भाद्रपदमें यम, आश्विनमें पर्जन्य, कार्तिकमें त्वष्टा, मार्गशीर्ष में मित्र तथा पौष मासमें विष्णु नामक सूर्यका अर्चन करे। इस विधिसे बारहों मासमें अलग-अलग नामोंसे भगवान् सूर्यको पूजा करनी चाहिये। प्रकार श्रद्धा- भक्तिपूर्वक एक दिन पूजा करनेस वर्षपर्यन्त की गयी पूजाका फल प्राप्त हो जाता है।
उपर्युक्त विधिसे एक वर्षतक व्रत कर रखजटित सुवर्णका एक रथ बनवाये और उसमें सात घोड़े बनवाये। रथके मध्य में सोनेके कमलके ऊपर रजोंके आभूषणोंसे अलंकृत सूर्यनारायणको सोनेकी मूर्ति स्थापित करे। रथके आगे उनके सारथिको बैठाये। अनन्तर बारह ब्राह्मणों में बारह महीनोंके सूर्योकी भावना कर तेरहवें मुख्य आचार्यको साक्षात् सूर्यनारायण समझकर उनकी पूजा करे तथा उन्हें रथ, छत्र, भूमि, गौ आदि समर्पित करे। इसी प्रकार रनोंके आभूषण, वस्त्र, दक्षिणा और एक- एक घोड़ा उन बारह ब्राह्मणोंको दे तथा हाथ जोड़कर यह प्रार्थना करे–'ब्राह्मण देवताओ। इस सूर्यव्रतके उद्यापन करनेके बाद यदि असमर्थतावश कभी सूर्यव्रत न कर सकूँ तो मुझे दोष न हो।' ब्राह्मणों के साथ आचार्य भी एवमस्तु ऐसा कहकर यजमानको आशीर्वाद दे और कहे 'सूर्यभगवान् तुमपर प्रसन्न हों। जिस मनोरथकी पूर्ति के लिये तुमने यह व्रत किया है और भगवान्
*प्रायः अन्य सभी पुराणोंमें चैत्रादि बारह महीनोंमें सूर्यके ये नामा मिलते हैं-धाता, अर्यमा, मित्र, वरुणा, इन्द्र, विवस्यान, पूषा, पर्जन्य, अंश त्वष्टा और विष्णु। कल्पभेदके अनुसार नामोमें भेद हैं।
सूर्यकी पूजा की है, वह तुम्हारा मनोरथ सिद्ध हो। और भगवान् सूर्य उसे पूरा करें। अब व्रत न करनेपर भी तुमको दोष नहीं होगा।' इस प्रकार आशीर्वाद प्राप्त कर दीनों, अन्धों तथा अनाथोंको यथाशक्ति भोजन कराये और ब्राह्मणोंको भोजन कराकर, दक्षिणा देकर व्रतकी समाप्ति करे।
जो व्यक्ति इस सप्तमी-व्रतको एक वर्षतक करता है, वह सौ योजन लम्बे-चौड़े देशका धार्मिक राजा होता है और इस व्रतके फलसे सौ वर्षोंसे भी अधिक निष्कण्टक राज्य करता है। जो स्त्री इस व्रतको करती है, वह राजपत्नी होती है। निर्धन व्यक्ति इस व्रतको यथाविधि सम्पन्न कर बतलायी हुई विधिके अनुसार ताँबेका रथ ब्राह्मणको देता है तो वह अस्सी योजन लम्बा- चौड़ा राज्य प्राप्त करता है। इसी प्रकार आटेका रथ बनवाकर दान करनेवाला साठ योजन विस्तृत राज्य प्राप्त करता है तथा वह चिरायु, नीरोग और सुखी रहता है। इस व्रतको करनेसे पुरुष एक कल्पतक सूर्यलोकमें निवास करनेके पश्चात् राजा होता है। यदि कोई व्यक्ति भगवान् सूर्यको मानसिक आराधना भी करता है तो वह भी समस्त आधि-व्याधियोंसे रहित होकर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करता है। जिस प्रकार भगवान् सूर्यको कुहरा स्पर्श नहीं कर पाता, उसी प्रकार मानसिक पूजा करनेवाले साधकको किसी प्रकारको आपत्तियाँ स्पर्श नहीं कर पाती। यदि किसीने मन्त्रों के द्वारा भक्तिपूर्वक विधि विधानसे व्रत सम्पत्र करते हुए भगवान् सूर्यनारायणकी आराधना को तो फिर उसके विषय में क्या कहना? इसलिये अपने कल्याणके लिये भगवान् सूर्यको पूजा अवश्य करनी चाहिये।
पुत्र ! सूर्यनारायणने इस विधि विधानको स्वयं अपने मुखसे मुझसे कहा था। आजतक उसे गुप्त रखकर पहली बार मैंने तुमसे कहा है। मैंने इसी व्रतके प्रभावसे हजारों पुत्र और पौत्रोंको प्राप्त किया है, दैत्योंको जीता है, देवताओंको वशमें किया है, मेरे इस चक्रमें सदा सूर्यभगवान् निवास करते हैं। नहीं तो, इस चक्रमें इतना तेज कैसे होता? यही कारण है कि सूर्यनारायणका नित्य जप, ध्यान, पूजन आदि करनेसे मैं जगत्का पूज्य हूँ। वत्स! तुम भी मन, वाणी तथा कर्मसे सूर्यनारायणकी आराधना करो। ऐसा करनेसे तुम्हें विविध सुख प्राप्त होंगे। जो पुरुष भक्तिपूर्वक इस विधानको सुनता है, वह भी पुत्र-पौत्र, आरोग्य एवं लक्ष्मीको प्राप्त करता है और सूर्यलोकको भी प्राप्त हो जाता है
भगवान् कृष्णने कहा-साम्ब ! माघ मासके शुक्ल पक्षकी पञ्चमी तिधिको एकभुक्त व्रत और षष्ठीको नक्तवत करना चाहिये । सुव्रत ! कुछ लोग ससमोमें उपवास चाहते हैं और कुछ विद्वान् षष्ठीमें उपवास और सप्तमी तिथिमें पारण करनेका विधान कहते हैं (इस प्रकार विविध मंत हैं)। वस्तुतः पाठीको उपचास र भगवान् सूर्यनारायणको पूजा करनी चाहिये १ऊचन्दन, करवीर पुष्प, गुग्गुल धूप, पायस आदि नैवेद्योंसे माघ आदि चार महीनोतक सूर्यनारायणकी पूजा करनी चाहिये। आत्मशुद्धिके लिये गोमयमिश्रित जलसे स्नान, गोमयका प्राशन और यथाशक्ति ब्राह्मण भोजन भी कराना चाहिये।
ज्येष्ठ आदि चार महीनों में शेत चन्दन, खेत पुष्प कृपा अगर धूप और उत्तम नैवेद्य सूर्यनारायणको अर्पण करना चाहिये। इसमें पञ्चगव्यप्राशन कर ब्राहाणोंको उत्कृष्ट भोजन कराना चाहिये।
*जिस दिन प्रायः दिनका अधिक अंश विताकर सायं चार बजे के लगभग पोजन कर पूरी रात ठयवास रहकर बिताया
है, उसे एकभुक्त-मत कहा जाता है और दिनभर उपवासका गत्रिको भोजन करना 'नक्तव्रत' कहलाता है।
आश्विन आदि चार मासोंमें अगस्त्य-पुष्प, अपराजित धूप और गुरुके पूए आदिका नैवेद्य तथा इक्षुरस भगवान् सूर्यको समर्पित करना चाहिये। यथाशक्ति ब्राह्मण- भोजन कराकर आत्मशुद्धिके लिये कुशाके जलसे मान करना चाहिये। उस दिन कुशोदकका ही प्राशन करे। व्रतकी समाप्तिमें माघ मासकी शुक्ला ससमीको रथका दान करे और सूर्यभगवान्की प्रसन्नताके लिये रथयात्रोत्सवका आयोजन करे। महापुण्यदायिनी इस सप्तमीको रथसप्तमी कहा गया है। यह महासप्तमीके नामसे अभिहित है। रथसप्तमीको जो उपवास करता है, वह कीर्ति, बन, विह्या, पुत्र, आरोग्य, आयु और उत्तमोत्तम कान्ति प्रास करता है। हे पुत्र। तुम भी इस व्रतको करो, जिससे तुम्हारे सभी अभीष्टोंकी सिद्धि हो। इतना कहकर शङ्ख, चक्र, गदा-पद्मधारी श्रीकृष्ण अन्तर्हित हो गये।
सुमन्तुने कहा-राजन् ! उनकी आजा पाकर साम्बने भी भक्तिपूर्वक सूर्यनारायणकी आराधनामें तत्पर हो रथसप्तमीका व्रत किया और कुछ ही समयमें रोगमुक्त होकर मनोवाञ्छित फल प्राप्त कर लिया*। (अध्याय ५०-५१)
Summary of chapter 33 of the Bhavishya Purāṇa is as follows:
Chapter after chapter, the Vetāla releases a new tale — each a moral riddle ranging across marriage, inheritance, justice, the rights of competing claimants, and the nature of virtue and sin. Each time Vikramāditya breaks his silence to give the correct judgment, the Vetāla flies back to his tree and the king must begin the journey again. The sustained teaching in dharma-vicāra through the medium of story — with each resolution revealing a new facet of how dharma operates in the complexities of actual human situations — constitutes one of the Purāṇa's most celebrated literary and didactic achievements.