भगवान् श्रीकृष्णने कहा-राजन्! विधिपूर्वक वापी, कूप, तडाग, बावली, वृक्षोद्यान तथा देवमन्दिर आदिका निर्माण करानेवाले तथा इन कार्यों में सहयोगी-कर्मकार शिल्पी, सूत्रधार आदि सभी पुण्यकर्मा पुरुष अपने इष्टापूर्तधर्मके प्रभावसे सूर्य एवं चन्द्रमाको प्रभाके समान कान्तिमा विमानमें बैठकर दिव्यलोकको प्राप्त करते हैं जलाशय आदिकी खुदाई के समय जो जीव मर जाते हैं, उन्हें भी उत्तम गति प्राप्त होती है। गायके शरीरमें जितने भी रोमकूप हैं, उतने दिव्य वर्षक तडाग आदिका निर्माण करनेवाला स्वर्गमें निवास करता है। यदि उसके पितर दुर्गतिको प्राप्त हुए हों तो उनका भी वह उद्धार कर देता है। पितृगण यह गाथा गाते है कि देखो! हमारे कुला एक धर्मात्मा पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसने जलाशयका निर्माणकर प्रतिष्ठा की। जिस तालाबके जलको पीकर गाएँ संतृप्त हो जाती हैं, उस तालाब बनवानेवाले के सात कुलों का उद्धार हो जाता है। तहाग, वापी, देवालय और सघन छायावाले वृक्ष-ये चारों इस संसारसे उद्धार करते हैं।
१-तिष्ठन् भुखन स्वपन गच्छत्तथा पायन्त्रितस्ततः ।
उत्क्रान्तिकाले गोविन्दं स्मरेस्तन्मयो भवेत्॥
व चापि स्मरन् भायं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभाषितः ॥
(उत्तरपर्व १२६/३९-४०)
२-भविष्यपुराणमें यह विषय तीन पर्यो तीन बार आया है और वेदोंसे लेकर स्मृतियों तथा अन्य पुराणों में भी बार बार आता है। यह अन्तर्वेदी और. बहिर्वेदीके नामसे विख्यात है। इसमें जलाशय, वृक्ष, उद्यान आदि लगानेसे सर्वाधिक पुष्योंका लाभ बताया गया है। यहाँ इसका थोड़ा-सा संक्षेप कर दिया गया है। मात्र सारभूत बातें दी गयी है।
जिस प्रकार पुत्रके देखनेसे माता-पिताके स्वरूपका ज्ञान होता है, उसी प्रकार जलाशय देखने और जल पीनेसे उसके कतकि शुभाशुभका ज्ञान होता है। इसलिये न्यायसे धनका उपार्जन कर तडाग आदि बनवाना चाहिये। धूप और गर्मीसे व्याकुल पथिक यदि तडागादिके समीप जलका पान करे और वृक्षोंकी घनी छायामें ठंडी हवाका सेवन करता हुआ विश्राम करे तो तडागादिकी प्रतिष्ठा करनेवाला व्यक्ति अपने मातृकुल और पितृकुलका उद्धार कर स्वयं भी सुख प्राप्त करता है । इष्टापूर्तकर्म करनेवाला पुरुष कृतकृत्य हो जाता है। इस लोकमें जो तडागादि बनवाता है, उसीका जन्म सफल है और उसीकी माता पुत्रिणी कहलाती है। वही अजर है, वही अमर है। जबतक तडाग आदि स्थित हैं और उसकी निर्मल कीर्तिका प्रचार-प्रसार होता रहता है, तबतक वह व्यक्ति स्वर्गवासका सुख प्राप्त करता है। जो व्यकि हंस आदि पक्षीको कमल और कुवलय आदि पुष्पोंसे युक्त अपने तड़ागमें जल पीता हुआ देखता है और जिसके तालाबमें घट, अञ्जलि, मुख तथा चंचु आदिसे अनेक जीव जन्तु जले पीते हैं, उसी व्यक्तिका जन्म सफल है, उसकी कहाँतक प्रशंसा की जाय। जो तडाग आदि बनाकर उसके किनारे देवालय बनवाता है तथा. उसमें देवप्रतिष्ठा करता है, उसके पुण्यका कहाँतक वर्णन किया जाय? देवालयकी ईंट जबतक खण्ड-खण्ड न हो जाय, तबतक देवालय बनानेवाला व्यक्ति स्वर्गमें निवास करता है। कूप ऐसे स्थानपर बनवाना चाहिये, जहाँ बहुत से जीव जल पी सकें, कूपका जल स्वादिष्ट होनो कूप बनवानेवाले के सात कुलोंका उद्धार हो जाता है। जिसके बनाये हुए कूपका जल मनुष्य पीते हैं, वह सभी प्रकारका पुण्य प्राप्त कर लेता है, ऐसा मनुष्य सभी प्राणियों का उपकार करता है। वडाग बनवाकर उसके तटपर वृक्षोंके बीच उत्तम देवालय बनवानेसे उस व्यक्तिको कीर्ति सर्वत्र व्याप्त रहती है और बहुत समयतक दिव्य भोग भोगकर वह चक्रवर्ती राजाका पद प्राप्त करता है। जो व्यक्ति वापी, कूप, तडाग, धर्मशाला आदि बनवाकर अन्नका दान करता है और जिसका वचन अति मधुर है, उसका नाम यमराज भी नहीं लेते।
वे वृक्ष धन्य हैं, जो फल, फूल, पत्र, मूल, वल्कल, छाल, लकड़ी और छायाद्वारा सबका उपकार करते हैं। वस्तुओंके चाहनेवालोंको वे कभी निराश नहीं करते। धर्म-अर्थसे रहित बहुतसे पुत्रोंसे तो मार्गमें लगाया गया एक ही वृक्ष श्रेष्ठ है, जिसकी छायामें पथिक विश्राम करते हैं। सघन छायावाले श्रेष्ठ वृक्ष अपनी छाया, पल्लव और छालके द्वारा प्राणियोंको, पुष्पोंके द्वारा देवताओंको और फलोंके द्वारा पितरोंको प्रसत्र करते हैं। पुत्र तो निश्चित नहीं है कि एक वर्षपर भी श्राद्ध करेगा या नहीं, परंतु वृक्ष तो प्रतिदिन अपने फल मूल, पत्र आदिका दानकर वृक्ष लगानेवालेका श्राद्ध करते हैं। वह फल न तो अग्निहोत्रादि कर्म करनेसे और न ही पुत्र उत्पन्न करनेसे प्राप्त होता है, जो फल मार्गमें छायादार वृक्षके लगानेसे प्राप्त होता है।
छायादार वृक्ष, पुष्प देनेवाले वृक्ष, फल देनेवाले वृक्ष तथा वृक्षवाटिका कुलीन स्त्रीको भांति अपने पितृकुल तथा पतिकुल दोनों कुलोंको उसी प्रकार सुख देनेवाले होते हैं, जैसे लगाये गये वृक्ष आदि अपने लगानेवाले तथा रक्षा आदि करनेवाले दोनों के कुलोंका उद्धार कर देते हैं। जो भी बगीचा आदि लगाता है, उसे अवश्य ही उत्तम लोककी प्राप्ति होती है और वह व्यक्ति नित्य गायत्रीजपका, नित्य दानका और नित्य यज्ञ करनेका फल पाता है। जो पुरुष एक पीपल, एक नीम, एक बरगद, दस इमली तथा एक-एक कैथ, बिल्व और आमलक तथा पाँच आमके वृक्ष लगाता है, वह कभी नरकका मुँह नहीं देखता*। जिसने जलाशय न बनवाया हो और एक भी वृक्ष न लगाया हो, उसने संसारमें जन्म लेकर कौन-सा कार्य किया। वृक्षोंके समान कोई भी परोपकारी नहीं है। वृक्ष धूपमें खड़े रहकर दूसरोंको छाया प्रदान करते हैं तथा फल, पुष्प आदिसे सबका सत्कार करते हैं। मानवोंकी शुभ गति पुत्रोंके बिना नहीं होती-यह कथन तो उचित ही है, किंतु यदि पुत्र कुपुत्र हो गया तो वह अपने पिताके लिये कलंकस्वरूप तथा नरकका हेतु भी बन जाता है। इसलिये विद्वान् व्यक्तिको चाहिये कि विधिपूर्वक वृक्षारोपण करके उसका पालन-पोषण करे। इससे संसारमें न तो कलंक होता है और न निन्ध गति ही प्राप्त होती है, बल्कि कीर्ति, यश एवं अन्तमें शुभ गति प्राप्त होती है।
इसी प्रकार जो व्यक्ति भव्य देव-मन्दिर बनवाकर उसमें देवमूर्तियोंकी प्रतिमाओंको स्थापित करता है, मन्दिरमें अनुलेपन, देवताओंका अभिषेक, दीपदान तथा विविध उपचारोंद्वारा उनकी अर्चा करता अथवा करवाता है, वह इस संसारमें राज्य श्री प्राप्त कर अन्तमें परमधामको प्राप्त करता है तथा इस लोकमें कीर्ति एवं यशरूपी शरीरसे प्रतिष्ठित रहता है। ( अध्याय १२७-१२९)