भविष्य पुराण

धर्मराजका समाराधन-व्रत*

राणा युधिधिरने पूछा-भगवन् ! ऐसा कौन-सा व्रत है, जिसके करनेसे यमराज प्रसन्न हो जायँ और नरकका दर्शन न हो।

भगवान् श्रीकृष्णाने कहा-महाराज! एक बार जब मैं द्वारका-स्थित समुद्र में स्रान करके बाहर निकला, तब देखा कि मुगलमुनि चले आ रहे हैं। उनका तेज सूर्यके समान था और उनके मुखके तपस्तेजसे दिशाएँ उद्भासित हो रही थीं। तब मैंने उनका अय, पाद्य आदिसे सत्कार कर आदरपूर्वक उनसे पूछा-'महाराज! प्राणियोंके लिये अत्यन्त भयदायक नरक तथा यमदूतों आदिका जिससे दर्शन न हो ऐसा कोई व्रत आप मुझसे बतलायें ।' यह सुनकर मुद्गलमुनि भी विस्मित-से हुए। किंतु बादमें शान्त-मन होकर वे बोले-'प्रभो! एक बार ऐसा हुआ कि मुझे अकस्मात् मूर्छा आ गयो और मैं पृथ्वी पर गिर पड़ा, उस स्थिति में मैंने देखा कि हाथ में लाठी लिये कुछ लोग आगसे जलते हुए से मेरे शरीरसे निकलकर बाहर खड़े हुए थे और मेरे हृदयसे एक अँगूठेके बराबर व्यक्तिको बलपूर्वक खींचकर तथा रस्सियोंसे बाँधकर यमपुरीकी ओर ले जा रहे हैं। फिर मैं तत्काल क्या देखता हूँ कि यमराजकी सभा लगी है और लाल पीले नेत्रोंवाले यमराज सभामें विराजमान हैं तथा कफ, वात, पित्त, ज्वर, मांस, शोथ, फोड़े, फुसी, भगंदर, अक्षिरोग, विधूचिका, गलग्रह आदि अनेकों प्रकारके रोग और मृत्यु उन्हें घेरे हुए हैं और वे सभी मूर्तिमान होकर यमदेवकी उपासना कर रहे हैं। यमदूत भयंकर शस्त्र धारण किये हैं। कुछ राक्षस, दानव आदि भी वहाँ बैठे हैं। सिंह, व्याघ, निळू दंश, सियार, साँप, उल्लू, कीड़े मकोड़े आदि भयंकर जीव-जन्तु वहाँ उपस्थित है। यमराजने अपने किकरोंसे पूछा-'दूतो ! तुमलोग यहाँ इन मुगलमुनिको क्यों ले आये? मैंने तो मुगल क्षत्रियको लानेके लिये कहा था, वह कौडिन्यनगरका निवासी भीष्पकका पुत्र है, उसकी आयु समाप्त हो चुकी है, इन मुनिको तत्काल छोड़ दो और उसे ही ले आओ।' यह सुनकर वे दूत कौडिन्यनगर गये, किंतु वहाँ राजा मुद्गलमें मृत्युके कोई लक्षण न देखकर भ्रान्त होकर पुनः यमलोकमें वापस आये और उन्होंने सारा वृत्तान्त यमराजको बता दिया। इसपर यमराजने उनसे कहा-'दूतो! जिन पुरुषोंने नरकार्ति- विनाशिनी त्रयोदशीका व्रत किया है, उन्हें यमकिंकर नहीं देख पाते, इसीलिये तुमलोगोंने राजा मुद्गलको पहचाना नहीं।' पुनः यमदूतोंद्वारा व्रतके विधानको पूछे जानेपर यमराजने उनसे कहा-'मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षकी त्रयोदशीको जब रविवार एवं मंगलवार न हो, तब उस दिन तेरह विद्वान् और पवित्र ब्राह्मणों तथा एक पुराणवाचकका वरण करके पूर्वाहकालमें उन ब्राह्मणोंको उत्तराभिमुख पवित्र आसनपर बैठाये। तिल-तैलसे उनका अभ्यंग करके गन्धकाषाय तथा हलके गरम जलसे उन्हें पृथक्-पृथक् स्नान कराये और उनकी सेवा- शुश्रूषा करे। अनन्तर पूर्वाभिमुख बैठाकर उन्हें शाल्यन्न, मुद्रान, गुड़के अपूप तथा सुपक व्यञ्जन आदरपूर्वक खिलाये।

पुनः व्रती पवित्र होकर आचमन करे और उन ब्राह्मणोंकी अर्चना करे। तानपात्र में प्रस्थमात्र (एक पसर या एक सेर) तिल-तण्डुल, दक्षिणा, छत्र, जलपूर्ण कलश आदि उन्हें अलग अलग प्रदान कर विसर्जित करे।

*यह कथा स्कन्दपुराणके नामसे अनेक व्रत-निबन्धोमें संग्रहीत है।

इसी प्रकार वर्षभरतक व्रत करे। कोई मानव यदि भादरपूर्वक एक बार भी इस व्रतको कर ले तो वह मेरे यमलोकका दर्शन नहीं करता। वह मेरी मायासे अदृष्ट रहता है, अन्तमें विमानद्वारा अर्कमण्डलमें प्रवेश कर यह विष्णुपुर और शिवपुरको प्राप्त करता है। यमदूतो। उस राजा मुद्रलने इस त्रयोदशी-व्रतको पहले किया था, इसीलिये तुम सब उस क्षत्रिय-श्रेष्ठका दर्शन नहीं कर पाये।

श्रीकृष्ण! उसी क्षण मेरी मूर्छा दूर हो गयी और मैं स्वस्थ हो गया। भगवन्! मैं आपके दर्शनकी इच्छासे यहाँ आया था, जैसा पहले वृत्तान्त हुआ, वह सब मैंने आपको बतलाया।

भगवान् श्रीकृष्ण पुनः बोले-राजन्! वे मुनि मुझसे इतना कहकर अपने स्थानको चले गये। कौन्तेय! आप भी इस व्रतको करें। इससे आपको यमलोक नहीं जाना पड़ेगा। इसी प्रकार जो कोई स्त्री-पुरुष इस त्रयोदशी-व्रतका श्रद्धापूर्वक आचरण करेंगे, वे सभी पापोंसे मुक्त होकर अपने पुण्य- कर्मके प्रभावसे स्वर्ग में पूजित होंगे और उन्हें कभी यमयातना नहीं सहनी पड़ेगी। (अध्याय ८९)