वैतालने पुनः कहा-राजन् ! चित्रकूटमें रूपदत्त नामका एक विख्यात राजा रहता था। एक दिन वह एक मृगका पीछा करते हुए एक वनमें प्रविष्ट हो गया। मध्याह्नकालमें वह एक सरोवरके पास पहुंचा और वहां उसने अपनी सखाक साथ कमल- पुष्योंका चयन करती हुई एक सुन्दर मुनि कन्याको देखा। उसके बट रूपको देखकर राजाने उसे अपनी रानी बनानेका तिशय किया। वह कन्या भी राजाको देखकर सब हुई। दोनों परस्पर प्रातिपूर्वक एक दूगायो देखने लगे। उसको सखीसे
राजाने जब उस कन्याका पता पूछा, तब उसने कहा कि यह एक मुनिकी धर्मपुत्री है। उसी समय उस कन्याके पिता वहाँ आ पहुँचे। मुनिको देखकर राजाने विनयपूर्वक उनसे पूछा-'मुने! उत्तम धर्म क्या है?' इसपर महामनीषी मुनि बोले-'राजन्! असहायका पालन-पोषण, शरणागतकी रक्षा और दया करना यही मुख्य धर्म है। भयभीतको अभय-दान देनेके समान कोई दान नहीं है। उद्दण्डोंको दण्ड देना चाहिये। पूज्यजनोंकी पूजा करनी चाहिये। गौ एवं ब्राह्मणमें नित्य आदरभाव रखना चाहिये। दण्ड देने में समानभाव रखना चाहिये, पक्षपात नहीं करना चाहिये। देवताको पूजामें छल-छद्म एवं कपटको छोड़कर श्रद्धा-भक्तिरूपी सत्यका आश्रय ग्रहण करना चाहिये। गुरु एवं श्रेष्ठ जनोंकी पूजामें इन्द्रिय निग्रह एवं समाहितचित्तताका विशेष ध्यान रखना चाहिये। दान देते समय मृदुताका आश्रय ग्रहण करना चाहिये। थोड़े-से भी हुए निन्द्य कर्मकी बहुत बड़ा अपराध समझकर सर्वथा उससे विरत रहना चाहिये*।
ऐसा कहकर उस मुनिने अपनी कन्याका विवाह राजकुमारके साथ कर दिया। राजा उसे लेकर अपनी राजधानीकी ओर चला। मार्ग उसने एक वटवृक्षके नीचे विश्राम किया। उसी समय उसकी पत्नीको खा जानेके लिये एक राक्षस वहाँ आया और कहने लगा कि 'तुम दोनोंने मेरा स्थान अपवित्र कर दिया है, अतः मैं तुमलोगोंको खा जाउंगा।' राजाके क्षमा मांगनेपर उसने पुन कहा-'यदि तुम किसी सात ताकि ब्राह्मण-बालकको मेरे खानेके लिये प्रस्तुत करो तो मैं तुम्हें छोड़ दूंगा।' राजा राक्षसको वचन देकर अपनी पत्नीके साथ महलमें चला आया। दूसरे दिन राजाने मन्त्रियोंको सब समाचार कह सुनाया। मन्त्रियोंके परामर्शपर राजाने एक ब्राह्मणको एक लक्ष स्वर्ण-मुद्राएँ देकर उसके मध्यम पुत्रको राक्षसको समर्पित करनेके लिये राजी कर लिया। उस ब्राह्मणपुत्रने भी पिताके लिये अपना बलिदान देना स्वीकार कर लिया। यथासमय उसे लेकर सभी राक्षसके पास पहुंचे। ज्यों ही बलिदानका समये आया, त्यों ही वह ब्राह्मणका बालक पहले हँसा और फिर उच्च स्वरसे रोने लगा।
वैतालने पूछा- राजन् ! बताओ कि मृत्युके समय वह ब्राह्मण-बालक पहले क्यों हँसा और बादमें फिर क्यों रोया?
राजाने कहा-वैताल ! बड़ा पुत्र पिताको प्रिय होता है और छोटा पुत्र माताको प्रिय होता है। इसलिये माता-पितासे अपनेको उपेक्षित जानकर और अन्य कोई शरण्य न देखकर बड़ी आशासे मध्यम पुत्रने राजाकी शरण ग्रहण की, परंतु अपनी पत्नीका प्रिय चाहनेवाले उस निर्दयो राजा रूपदत्तके हाथो मृत्युरूपी तलवार देखकर उस चाहाणकुमारको पहले हंसी आ गयी और फिर मेरा यह उत्तम शरीर अधम राक्षसको पास होगा, यह सोचकर पाइ होकर उच्च स्वामे रोख पक्षालाप
*तमुवाच निधोमान् ट्याधर्मपोषणम् ।
निर्भयम्य सपं दानं न 'पून न पाविति ॥
अनहांन् दण्डमादधादई पूजाफल भजेत् ।
मित्रता गोदिजे नित्य समता दण्डनिग्रहे।
सत्यता सुरपूजायां दमता गुरुपूजने ।
मृदुता दानमामय संधिनिन्धकथा
(प्रतिसर्गपर्ण दाहा-१)