भविष्य पुराण

सप्तमी-स्रपनव्रत और उसकी विधि

महाराज युधिष्ठिरने पूछा-प्रभो! मनुष्यको अपने मनमें उद्भूत उद्वेग तथा खेद-खिन्नता और अपनी दरिद्रताकी निवृत्ति के लिये अद्धतर-शान्तिके निमित्त कौन-सा धर्म-कृत्य करना चाहिये? मृतवत्सा स्त्रीको (जिसके बच्चे पैदा होकर मर जाते हैं) अपनी संततिकी रक्षा और दुःस्वप्रादिकी शान्तिके लिये क्या करना चाहिये?

भगवान् श्रीकृष्ण बोले-राजन् ! पूर्वजन्मके पाप इस जन्ममें रोग, दुर्गति तथा इष्टजनोंकी मृत्युके रूपमें फलित होते हैं। उनके विनाशके लिये मैं कल्याणकारी सप्तमी-स्नपन नामक व्रतका वर्णन कर रहा हूँ, यह लोगोंकी पीड़ाका विनाश करनेवाला है। जहाँ दुधमुंहे शिशुओं, वृद्धों, आतुरों और नवयुवकोंकी आकस्मिक मृत्यु होती देखी जाती है, वहाँ उसकी शान्तिके लिये इस 'मृतवत्साभिषेक' को बतला रहा हूँ। यह समस्त अद्भुत उत्पातों, उद्वेगों और चित्त-भ्रमौका भी विनाशक है। वराह-कल्पके वैवस्वत मन्वन्तरमें सत्ययुगमें हैहयवंशीय क्षत्रियोंके कुलकी शोभा बढ़ानेवाला कृतवीर्य नामक एक राजा हुआ था। उसने सतहत्तर हजार वर्षतक धर्म और नीतिपूर्वक समस्त प्रजाओंका पालन किया। उसके सौ पुत्र थे, जो च्यवनमुनिके शापसे दग्ध हो गये। फिर राजाने भगवान् सूर्यकी विधिपूर्वक उपासना प्रारम्भ की। कृतवीर्यके उपवास-व्रत, पूजा और स्तोत्रोंसे संतुष्ट होकर भगवान् सूर्यने उसे अपना दर्शन दिया और कहा-'कृतवीर्य! तुम्हें (कार्तवीर्य नामक) एक सुन्दर एवं चिरायु पुत्र उत्पत्र होगा, किंतु तुम्हें अपने पूर्वकृत पापोंको विनष्ट करनेके लिये सपन-सप्तमी नामक व्रत करना पड़ेगा। तुम्हारी मृतवत्सा पलीके जब पुत्र उत्पन्न हो जाय तो सात महीनेपर बालकके जन्म नक्षत्रकी तिथिको छोड़कर शुभ दिनमें गृह एवं ताराबलको देखकर ब्राह्मणों द्वारा स्वस्तिवाचन कराना चाहिये। इसी प्रकार वृद्ध, रोगी अथवा अन्य लोगोंके लिये किये जानेवाले इस व्रतमें जन्म-नक्षत्रका परित्याग कर देना चाहिये । गोदुग्धके साथ लाल अगहनीके चावलोंसे हव्यान्न पकाकर मातृकाओं, भगवान् सूर्य एवं रुद्रको तुष्टिके लिये अर्पण करना चाहिये और फिर भगवान् सूर्यके नामसे अग्निमें घीकी सात आहुतियाँ प्रदान करनी चाहिये। फिर बादमें रुद्रसूक्तसे भी आहुतियाँ देनी चाहिये। इस आहुतिमें आक एवं पलाशकी समिधाएँ प्रयुक्त करनी चाहिये तथा हवन कार्यमें काले तिल, जौ एवं घीकी एक सौ आठ आहुतियाँ प्रदान करनी चाहिये। हवनके बाद शीतल गङ्गाजलसे स्नान करना चाहिये। तदनन्तर हाथमें कुश लिये हुए वेदज्ञ ब्राहाणद्वारा चारों कोणोंमें चार सुन्दर कलश

१-भविष्यपुराणका यह अध्याय मत्स्यपुराण (अध्याय ८०) में इसी रूपमें प्राप्त होता है।

२-सामवेदीय 'अद्भुतवाह्मण' (ताण्ड्य २६) तथा अथर्वपरिशिष्ट (७२)-में अद्भुत-शान्तिका विस्तारसे उल्लेख है।

स्थापित कराये। पुनः ठसके बीचमें छिद्ररहित पाँचवाँ कलश स्थापित करे। उसे दही-अक्षतसे विभूषित करके सूर्यसम्बन्धी सात ऋचाओंसे अभिमन्त्रित कर दे। फिर उसे तीर्थ-जलसे भरकर उसमें रत्न या सुबर्ण डाल दे। इसी प्रकार सभी कलशोंमें सौषधि, पञ्चगव्य, पञ्चरत्न, फल और पुष्प डालकर उन्हें वस्त्रोंसे परिवेष्टित कर दे। फिर हाथीसार, घुड़शाल, बिमौट, नदीके संगम, तालाब, गोशाला और राजद्वार-इन सात जगहोंसे शुद्ध मृत्तिका लाकर उन सभी कलशोंमें डाल दे।'

तदनन्तर ब्राहाण रत्नगभित चारों कलशोंके मध्यमें स्थित पाँचवें कलशको हाथ में लेकर सूर्य- मन्त्रोंका पाठ करे तथा सात सुलक्षणा स्त्रियोंद्वारा जो पुष्य माला और वस्त्राभूषणोंद्वारा यूजित हों, ब्राह्मणके साथ साथ उस घड़ेके जलसे मृतवत्सा स्त्रीका अभिषेक कराये। (अधिवेकके समय इस प्रकार कहे-) 'यह बालक दीर्घायु और यह स्त्री जीवत्युत्रा (जीवित पुत्रवाली) हो। सूर्य, ग्रहों 'और नक्षत्र समूहोंसहित चन्द्रमा, इन्द्रसहित लोकपालगण, ब्रह्मा, विष्णु, महे पर इनके अतिरिक्त अन्यान्य देव-समूह इस कुमारकी सदा रक्षा करें। सूर्य, शनि, अग्नि अथवा अन्यान्य जो कोई बालग्रह हों, वे सभी इस बालकको तथा इसके माता-पिताको कहीं भी कष्ट न पहुँर्चायें।' अभिषेकके पश्चात् वह स्त्रीश्वेत वस्त्र धारण करके अपने बच्चे और पतिके साथ उन सातों स्त्रियोंकी भक्तिपूर्वक पूजा करे। पुन: गुरुकी पूजा करके धर्मराजको स्वर्णमयी प्रतिमा ताम्रपात्रके ऊपर स्थापित करके गुरुको निवेदित कर दे। उसी प्रकार कृपणता छोड़कर अन्य ब्राह्मणोंका भी वस्त्र, सुवर्ण, रत्नसमूह आदिसे पूजन करके उन्हें घी और खीरसहित भक्ष्य पदार्थाका भोजन कराये। भोजनोपरान्त गुरुदेवको बालककी रक्षाके लिये इन मन्त्रोंका उच्चारण करना चाहिये-'यह बालक दीर्घायु हो और सौ वर्षातक सुखका उपभोग करे। इसका जो कुछ पाप था, उसे वडवानलमें डाल दिया गया। ब्रह्मा, रुद्र, वसुगण, स्कन्द, विष्णु, इन्द्र और अग्नि-ये सभी दुष्ट ग्रहोंसे इसकी रक्षा करें और सदा इसके लिये वरदायक हों।' इस प्रकारके वाक्योंका उच्चारण करनेवाले गुरुदेवका यजमान पूजन करे। अपनी शक्तिके अनुसार उन्हें एक कपिला गौ प्रदान करे और फिर प्रणाम करके बिदा करे। तत्पश्चात् मृतवत्सा स्त्री पुत्रको गोदमें लेकर सूर्यदेव और भगवान् शंकरको नमस्कार करे और हवनसे बचे हुए हव्यान्नको ‘सूर्यदेवको नमस्कार है'- यह कहकर खा जाय। यह व्रत उद्विग्नता और दुःस्वप्रादिमें भी प्रशस्त माना गया है

इस प्रकार कांके जन्मदिनके नक्षत्रको छोड़कर शान्ति प्राप्तिके हेतु शुक्ल पक्षकी सप्तमी तिथिमें सदा (सूर्य और शंकरका) पूजन करना चाहिये, क्योंकि इस व्रतका अनुष्ठान करनेवाला कभी कष्ट में नहीं पड़ता। जो मनुष्य इस विधानके अनुसार इस व्रतका सदा अनुष्ठान करता है, वह दीर्घायु होता है। (इसी व्रतके प्रभावसे) कार्तवीर्यने दस हजार वर्षांतक इस पृथ्वीपर शासन किया चा। राजन् ! इस प्रकार सूर्यदेव इस पुण्यपद, परम पावन और आयुवर्धक सतभी सपननतका विधान

१-दीर्घायुरस्तु बालोऽयं रोचपुत्रा च भाविनी ।

आदित्यचन्द्रमासार्ध ग्रहनक्षत्रमण्डलम्॥

शक्रः सलोकपालो वै ब्रह्मा विष्णुमहेकरः ।

एते चान्ये च वै देयाः सदा पान्तु कुमारकम् ॥

मा शनिर्मास हुतभुष्मा च बालग्रहा: कनित् ।

पौद्धों कुर्वन्तु बासस्य मा मातृजनकस्य वै॥

(उत्तरपर्व १२रा २६-२८)

२-दोर्षापुस्तु सालोऽयं यावर्षशतं सुखी ।

यत्किञ्चिदस्य दुरितं तरिक्षम बड़वामुखे ॥

ब्रह्मा दो विष्णुः स्कन्दो वायुः शक्रो हुताशनः ।

रक्षन्तु सर्वे दुष्टेभ्यो वरदा यान्तु सर्वदा ॥

(उत्तरपर्व ५२ । ३२-३३)

बतलाकर वहीं अन्तर्हित हो गये। मनुष्यको सूर्यसे नीरोगता, अग्निसे धन, ईश्वर (शिवजी)- से ज्ञान और भगवान् जनार्दनसे मोक्षकी अभिलाषा करनी चाहिये। यह व्रत बड़े-बड़े पापोंका विनाशक, बाल-वृद्धिकारक तथा परम हितकारी है। जो मनुष्य अनन्यचित्त होकर इस व्रत- विधानको सुनता है, उसे भी सिद्धि प्राप्त होती है। (अध्याय ५२)