महर्षि शौनकने पूछा-लोमहर्षणजी! आप यह बताइये कि महाराज संवरण* किस समय पृथ्वीपर आये और उन्होंने कितने समयतक राज्य किया तथा द्वापरमें कौन-कौन राजा हुए, यह सब भी बतायें।
सूतजी बोले-महर्षे! महाराज संवरण भाद्रपदके कृष्ण पक्षको त्रयोदशी तिथिको शुक्रवारके दिन मुनियोंके साथ प्रतिष्ठानपुर (झूसी)-में आये। विश्वकर्मान वहाँ एक ऐसे विशाल प्रासादका निर्माण किया, जो ऊँचाईमें आधा कोस या डेढ किलोमीटरके लगभग था। महाराज संवरणने पाँच योजन या बीस कोसके क्षेत्रमें प्रतिष्ठानपुरको अत्यन्त सुन्दरता एवं स्वच्छतापूर्वक बसाया। एक ही समयमें (चन्द्रमाके पुत्र) बुधके वंशमें उत्पन्न प्रसेन और यदुवंशीय राजा सात्वत शूरसेन मधुरा (मथुरा)-के शासक हुए। म्लेच्छवंशीय शमशुपाल (दाढ़ी रखनेवाला) मरुदेश (अरब, ईरान और ईराक)- के शासक हुए। क्रमशः प्रजाओंके साध राजाओंकी संख्या बढ़ती गयी। राजा संवरणने दस हजार वर्षातक राज्य किया। इसके बाद उनके पुत्र अर्चाज्ञ हुए, उन्होंने भी दस हजार वर्षांतक शासन किया। उनके पुत्र सूर्यजापीने पिताके शासनकालके आधे समयतक राज्य किया। उनके पुत्र सौरयज्ञपरायण सूर्ययज्ञ हुए। उनके पुत्र आदित्यवर्धन, आदित्यवर्धनके पुत्र द्वादशात्मा और उनके पुत्र दिवाकर हुए। इन्होंने भी प्राय: अपने पितासे कुछ कम हो दिनोंतक राज्य किया। दिवाकरके पुत्र प्रभाकर और प्रभाकरके पुत्र भास्वदात्मा हुए। भास्वदात्माके पुत्र विवस्वक्षा, उनके पुत्र हरिदश्वार्चन और उनके पुत्र वैकर्तन हुए। वैकर्तनके पुत्र अर्केष्टिमान्, उनके पुत्र मार्तण्डवत्सल और मार्तण्डवत्सलके पुत्र मिहिरार्थ तथा उनके अरुणपोषण हुए। अरुणपोषणके पुत्र घुमणि, छुमणिके पुत्र तरणियज्ञ और उनके पुत्र मैत्रेष्टिवर्धन हुए। मैत्रेष्टिवर्धनके पुत्र चित्रभानूर्जक, उनके वैरोचन और वैरोचनके पुत्र हंसन्यायी हुए। उनके पुत्र वेदप्रवर्धन, वेदप्रवर्धनके और इनके पुत्र धनपाल हुए। धनपालके पुत्र म्लेच्छहन्ता, म्लेच्छहन्ताके आनन्दवर्धन, इनके धर्मपाल और धर्मपालके पुत्र ब्रह्मभक्त हुए। उनके पुत्र ब्रहोष्टिवर्धन, उनके पुत्र आत्मप्रपूजक हुए और उनके परमेष्ठी नामक पुत्र हुए। परमेष्ठीके पुत्र हैरण्यवर्धन, उनके धातृयाजी, उनके विधातृप्रपूजक और उनके पुत्र द्रुहिणक्रतु हुए। द्रुहिणक्रतुके पुत्र वैरंच्य, उनके पुत्र कमलासन और कमलासनके पुत्र शमवर्ती हुए। शमवर्तीके पुत्र श्राद्धदेव और उनके पितृवर्धन, उनके सोमदत्त और सोमदत्तके पुत्र सौमदत्ति हुए। सौमदत्तिके पुत्र सोमवर्धन, उनके अवतंस, अवतंसके पुत्र प्रतंस और प्रतंसके पुत्र परातंस हुए। परस्तंसके पुत्र अयतंस, उनके पुत्र समातंस, उनके पुत्र अनुतंस और अनुतंसके पुत्र अधितंस हुए। अधिसके अभितंस, उनके पुत्र समुत्तंस, उनके तंस और तंसके पुत्र दुष्यन्त हुए।
महाराज दुष्यन्तकी पत्नी शकुन्तलासे भरत नामके पुत्र हुए, जो सदा सूर्यदेवकी पूजामें तत्पर रहते थे। महाराज भरतने महामाया भगवतीकी कृपासे सम्पूर्ण पृथ्वीपर छत्तीस. हजार वर्षांतक चक्रवर्ती सम्राट्के रूपमें राज्य किया और उनके पुत्र महाबल हुए। महाबलके पुत्र भरद्वाज हुए। भरद्वाजके पुत्र मन्युमान् हुए, जिन्होंने अद्वारह हजार वर्षांतक पृथ्वीपर शासन किया। उनके पुत्र बृहत्क्षेत्र, उनके पुत्र महोत्र और सुतोत्रके पुत्र वीतिहोत्र हुए, इन्होंने दस हजार वर्षोतक राज्य
*इनकी विस्तृत कथा महाभारत के आदिपर्व में विस्तारसे किंतु तक प्रायः आती रही है।
किया। वीतिहोत्रके पुत्र यत्नहोत्र, यज्ञहोत्रके पुत्र शाक्रहोत्र हुए। इन्द्रदेवने प्रसन्न होकर इन्हें स्वर्ग प्रदान किया। उस समय अयोध्यामें महाबली प्रतापेन्द्र नामक राजा हुए, उन्होंने दस हजार वर्षांतक भारतपर शासन किया। इनके पुत्र मण्डलीक हुए। मण्डलीकके पुत्र विजयेन्द्र, विजयेन्द्र के पुत्र धनुर्दीप्त हुए।
महाराज शक्रहोत्र इन्द्रकी आज्ञासे घृताचीके साथ पुनः भूतलपर आये और उन्होंने राजा धनुर्दीप्तको जीतकर पृथ्वीपर शासन किया। शक्रहोत्रके घृताचीसे हस्ती नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। हस्तीने ऐरावत हाथीके बच्चेपर आरूढ़ होकर पश्चिममें अपने नामसे हस्तिना नामक नगरीका निर्माण किया। यह दस योजन विस्तृत है तथा स्वर्गङ्गाके तटपर अवस्थित है। वहाँ उन्होंने दस हजार वर्षांतक निवासकर राज्य किया। महाराज हस्तीके पुत्र अजमीढ, अजमीढके पुत्र रक्षपाल, रक्षपालके पुत्र सुशम्यर्ण और उनके पुत्र कुरु हुए। इन्द्रके वरदानसे वे सदेह स्वर्ग चले गये।
उस समय मथुरामें सात्वत वंशमें वृष्णि नामके एक महाबली राजा हुए। उन्होंने भगवान् विष्णुके वरदानसे पाँच हजार वर्षांतक सम्पूर्ण राज्यको अपने अधीन रखा। राजा वृष्णिके पुत्र निरावृत्ति हुए, निरावृत्तिके पुत्र दशारी, दशारोके पुत्र वियामुन और वियामुनके पुत्र जीमूत और इनके पुत्र विकृति हुए। विकृतिके पुत्र भीमरथ, उनके पुत्र नवरथ और नवरथके दशरथ हुए। उनके पुत्र शकुनि, उनके कुशुम्भ और कुशुम्भके पुत्र देवस्थ हुए। देवरथके पुत्र देवक्षेत्र, उनके पुत्र मधु और मधुके पुत्र नवाथ और उनके कुरुवत्स हुए। इन सभी लोमोने अपने अपने पिताके तुल्य वर्षातक राज्य किया। कुरुवा सके पुत्र अनुरथ उनके पुरुहोत्र और पुष्कोरके पुरविधिमाशहए. उनके सात्वतवान् और उनके पुत्र भजमान हुए। उनके पुत्र विदूरथ, उनके सुरभक्त और सुरभक्तके सुमना हुए। इन सभीने अपने-अपने पिताके तुल्य वर्षोंतक राज्य किया। सुमनाके पुत्र ततिक्षेत्र, उनके स्वायम्भुव, उनके हरिदीपक और हरिदीपकके देवमेधा हुए। इन सभीने अपने-अपने पिताके तुल्य वर्षोंतक राज्य किया। देवमेधाके पुत्र सुरपाल हुए। द्वापरके तृतीय चरणके समाप्त होनेपर देवराज इन्द्रकी आज्ञासे आयी सुकेशी नामकी अप्सराके स्वामी कुरु राजा हुए। इन्होंने कुरुक्षेत्रका निर्माण किया जो बीस योजन विस्तृत है। विद्वानोंने उसे पुण्यक्षेत्र बताया है। महाराज कुरुने बारह हजार वर्षोंतक राज्य किया। इनके पुत्र जहु, जहुके सुरथ और सुरथके पुत्र विदूरथ हुए। विदूरथके पुत्र सार्वभौम, इनके जयसेन और उनके पुत्र अर्णव हुए। महाराज अर्णवका शासन क्षेत्र चारों समुद्रतक था और इन्होंने अपने पिताके तुल्य वर्षातक राज्य किया। अर्णवके पुत्र अयुतायु हुए, जिन्होंने दस हजार वर्षांतक राज्य किया। अयुतायुके पुत्र अक्रोधन, उनके ऋक्ष, उनके पुत्र भीमसेन और भीमसेनके पुत्र दिलीप हुए। इन सभी राजाओंने अपने अपने पिताके तुल्य वर्षातक राज्य किया। दिलीपके पुत्र प्रतीप हुए, इन्होंने पाँच हजार वर्षांतक शासन किया। प्रतीपके पुत्र शन्तनु हुए और उन्होंने एक हजार वर्षांतक राज्य किया, उन्हें विचित्रवीर्य नामका पुत्र उत्पन्न हुआ, जिन्होंने दो सौ वर्षांतक राज्य किया। उनके पुत्र पाण्डु हुए, उन्होंने पाँच सौ वर्षातक राज्य किया, उनके पुत्र युधिष्ठिर हुए, उन्होंने पचास वर्षातक राज्य किया। सुयोधन (दुर्योधन)-ने साठ वर्षांतक राज्य किया और कुरुक्षेत्रमें (युधिष्ठिरके भाई भीमसेन) के द्वारा उसकी मृत्यु हुई। प्राचीन कालमे दैल्योंका देवताओद्वारा भारी संहार
हुआ था। वे ही सब दैत्य शन्तनुके राज्यमें पुन: भूलोकमें उत्पन्न हुए। दुर्योधनकी विशाल सेनाके भारसे परिव्याप्त वसुन्धरा इन्द्रकी शरणमें गयी, तब भगवान् श्रीहरिका अवतार हुआ। सौरि वसुदेवके द्वारा देवकीके गर्भसे उन्होंने अवतार लिया। वे एक सौ पैंतीस वर्षांतक' पृथ्वीपर रहकर उसके बाद गोलोक चले गये। भगवान् श्रीकृष्णका अवतार द्वापरके चतुर्थ चरणके अन्तमें हुआ था।
इसके बाद हस्तिनापुरमें अभिमन्युके पुत्र परीक्षित्ने राज्य किया। परीक्षित्के राज्य करनेके बाद उनके पुत्र जनमेजयने राज्य किया। तदनन्तर उनके पुत्र महाराज शतानीक पृथ्वीके शासक हुए। उनके पुत्र यज्ञदत्त (सहस्रानीक) हुए। उनके पुत्र निश्चक्ररे (निचक्नु) हुए। उनके पुत्र उष्ट्र (उष्ण)- पाल हुए। उनके पुत्र चित्ररथ और चित्ररथके पुत्र धृतिमान् और उनके पुत्र सुषेण हुए, सुषेणके पुत्र सुनीष, उनके मखपाल, उनके चक्षु और चक्षुके पुत्र सुखवन्त (सुखावल) हुए। सुखवन्तके पुत्र पारिप्लव हुए। पारिप्लवके पुत्र सुनय, सुनयके पुत्र मेधावी, उनके नृपञ्जय और उनके पुत्र मदु हुए। मृदुके पुत्र तिग्मज्योति, उनके बृहद्रथ और उनके पुत्र वसुदान हुए। इनके पुत्र शतानीक हुए, उनके पुत्र उदयन, उदयनके अहीनर, अहीनरके निरमित्र तथा निरमित्रके पुत्र क्षेमक हुए। महाराज क्षेमक राज्य छोड़कर कलापग्राम चले गये। उनकी मृत्यु म्लेच्छोंके द्वारा-हुई। नारदजीके उपदेश एवं सत्प्रयाससे उनके एक पुत्र हुआ, जिसका नाम प्रद्योत हुआ। राजा प्रद्योतने मलेच्छ यज्ञ किया, जिसमें म्लेच्छोंका विनाश हुआ। (अध्याय ३)