भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं-महाराज! अब मैं महर्षि अगस्त्यजीद्वारा बतायी गयी ब्रह्माण्डदानको विधि बता रहा हूँ। इससे शारीरिक, मानसिक तथा वाचिक तीनों प्रकारके पाप दूर हो जाते हैं और यश, धन, आयु. माल तथा सद्गति प्राप्त
अपनी शक्तिके अनुसार बीस पलसे लेकर एक हजार पलतकको ब्रह्माण्डकी सुवर्ण-प्रतिमा बनाये *। उसकी लम्बाई-चौड़ाई बारह अङ्गुलसे लेकर सौ अङ्गुलतक होनी चाहिये। उसमें देवता, दैत्य, मनुष्य, गन्धर्व, नाग, राक्षस, नदी, सरोवर, समुद्र, पर्वत, दिग्गज आदि चित्रित करे। बीच में मेरु पर्वतके शिखरोंपर पजियोंसहित ब्रह्मा, विष्णु और शिवको भी अङ्कित करे। उसमें आठों दिग्गजों और चौदह भुवनोंको भी चित्रित करे। इस प्रकारके सुवर्णमय ब्राण्डका श्रेष्ठ शिल्पीद्वारा निर्माण करवाये।
*ब्रह्माण्ड-निर्माण एवं दानकी ससंकल्प पूरी विधि दानसागर, दान-मयूस्र दानचन्द्रिका दानकल्पतमें है। अधिक जानेकी इच्छा रखनेवाली सज्जनोंकी इसे वहीं देखना चाहिये। मस्त्यपुराण अध्याय में भी यह अध्याय इसी प्रकार होता है।
अयन-संक्रान्ति, विषुवयोग, ग्रहण आदिके समयोंमें तथा अन्य पोंमें पुष्पसे एक मण्डप बनाकर उसमें एक द्रोण (बत्तीस सेर) परिमाणवाले तिलोंके ऊपर ब्रह्माण्डको स्थापित करना चाहिये। कुंकुमचूर्णसे चर्चित कर दो वस्त्रोंसे ढककर गन्ध, धूप आदिसे उस ब्रह्माण्डकी पूजा करनी चाहिये। उसके चारों ओर पूर्ण कलशकी स्थापना कर अठारह प्रकारके धान्य एक-एक द्रोणके परिमाणमें रखे। खड़ाऊँ, जूता, छाता, पात्र, आसन, दर्पण, भोजन आदि सभी सामग्रियोंको भी वहाँ रखे। इस विधिसे घरमें अथवा मण्डपमें ब्रह्माण्डकी प्रतिमा स्थापित कर एक हस्त प्रमाणवाला एक चौरस कुण्ड बनाकर उसमें चार वेदोंको जाननेवाले चारणिक ब्राह्मणोंसे जो वस्त्रादि आभूषणों से अलंकृत हों, हवन कराना चाहिये। उपाध्याय और राजाके पुरोहित भी हवन करें। ग्रहयज्ञविधिसे हवन करना चाहिये। विष्णु, शिव, ब्रह्मा आदि देवताओं के नाममन्त्रोंसे तिलोंकी आहुति देकर दस हजार आहुति महाव्याहृतियोंसे दे और ब्राह्मण रुद्रीका पाठ भी करें। उसके बाद यजमान स्नान कर देत वस्त्र धारण कर सभी उपचारोंसे ब्रह्माण्डका पूजनकर पुष्पाञ्जलि लेकर इस प्रकार प्रार्थना करे-
नमो जगत्प्रतिष्ठाय विश्वथाम्ने नमोऽस्तु ते॥
वाङ्मनोऽतीतरूपाय ब्रह्माण्ड शुभकद्भव।
ब्रह्माण्डोदरवर्तीनि यानि सत्त्वानि कानिचित्॥
तानि सर्वाणि मे तुष्टि प्रयच्छन्त्वतुला सदा।
ब्रह्मा विष्णुश रुद्रश्च लोकपालास्तथा ग्रहाः ॥
नक्षत्राणि तथा नागा ऋषयो मरुतस्तधा।
सर्वे भवन्तु संतुष्टाः सप्तजन्मान्तराणि मे॥
(उत्तरपर्व १७७।१९-२२)
'जगत् की प्रतिक्षा करनेवाले विधधामन्! आपको नमस्कार है। वाणी एवं मनसे अतीत रूपवाले ब्रह्माण्ड! आप मेरे लिये कल्याण करनेवाले हों। ब्रह्माण्डके उदरमें रहनेवाले जितने भी सत्त्व है, वे सभी मुझे अतुल तुष्टि प्रदान करें। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, लोकपाल, ग्रह, नक्षत्रमण्डल, नागगण, ऋषि तथा मरुद्गण सात जन्मोंतक मुझपर संतुष्ट रहें।'
इस प्रकार पुष्पाञ्जलि देकर दक्षिणासहित ब्रह्माण्ड-प्रतिमा ब्राह्मणको दानमें देनी चाहिये।
राजन्! इस दानकी महिमामें एक आख्यान है, उसे आप सुनें । सत्ययुगमें ऐश्वर्यवान्, धनवान्, शक्तिशाली, दस हजार हाथियों के बराबर बलवाला सुद्युम्र नामका एक राजा हुआ है। वह तीस हजार वर्षोंतक निष्कण्टक राज्य करनेके बाद अपने पुत्रको राज्यभार सौंपकर विरक्त हो वनमें तपस्या करने चला गया। वहाँ उसने घोर तपस्या की। अन्त-समयमें वह दिव्य विमानपर चढ़कर इन्द्रादि लोकोंको पार करता हुआ ब्रह्मलोक चला गया। वहाँ ब्रह्माजीने उसका बड़ा आदर-सत्कार किया और श्रेष्ठ आसन देकर बैठाया। वह वहाँ निवास करने लगा। यद्यपि वहाँ सभी आनन्दकी सामग्रियाँ उपलब्ध थी; किंतु वह दिव्य भोगोंको भोगने में असमर्थ रहता। ब्रह्मलोकमें रहते हुए भी वह भूख-प्याससे दुःखी रहता था। एक बार उसने हाथ जोड़कर ब्रह्माजीसे प्रार्थना की-'भगवन् ! यह ब्रहालोक सभी दोघोंसे रहित है, फिर भी यहाँ रहते हुए मुझे भूख-प्यास सता रही है, आप कृपाकर बतलाइये कि यह मेरे किस कर्मका कुफल है।'
ब्रह्माजी बोले-राजन्! तुमने भलीभाँति राज्यका भोग किया। प्रजाओंका पालन किया। यद्यपि तुम अध्यात्मवादी थे, पर दानादि सत्कर्म नहीं किये और उन्हें प्रतिबन्धक रूपमें समझा। तुम ज्ञानी हो, तुमने तप किया है, इस कारण तुम्हें यह ब्रहालोक पास हुआ, किंतु दान आदि सत्कर्म न करलेके कारण यहाँ रहते हुए भी तुम भूख-प्याससे व्याकुल हो।
राजाने कहा-प्रभो! यदि ऐसी बात है तो मुझपर कृपाकर मेरी भूख-प्यास दूर करनेके लिये कोई उपाय बतलाइये।
ब्रह्माजी बोले-राजन् ! अब तुम भूलोकमें जाओ और सम्पूर्ण कामनाओंको सफल बनानेवाले ब्राह्मणोंको ब्रह्माण्डकी प्रतिमा दान करो, उससे तुम्हें तृप्ति हो जायगी। ब्रह्माजीके उपदेशसे राजाने पृथ्वीलोकमें आकर ब्राह्मणोंको ब्रह्माण्ड-दान किया। फलस्वरूप उसने पुनः स्वर्ग, शाश्वती तृप्ति प्राप्त की।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले-राजन्! यह मैंने ब्रह्माण्डके महादानका फल बतलाया। जिसने ब्रह्माण्डका दान किया उसने मानो सम्पूर्ण चराचर जगत् का दान कर लिया। वह अपने कुलोंका उद्धार कर देता है और छत्तीस मन्वन्तरोंतक ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है। पुनः मनुष्यलोकमें आकर धार्मिक कुलमें जन्म लेता है। उसे न दरिद्रता सताती है, न व्याधि होती है और न अपने इष्टजनोंसे वियोग होता है। जो इस दानके माहात्म्यको भक्तिपूर्वक सुनता है अथवा सुनाता है, वह भी सद्गति प्राप्त करता है। फिर जो इस ब्रह्माण्ड-दानको करता है, उसके विषयमें क्या कहना। (अध्याय १७७)