भगवान् श्रीकृष्णा कहते हैं -महाराज! अब मैं घृतधेनुदान और घृतधेनु-निर्माणको विधि बता रहा हूँ, इसे आप प्रेमपूर्वक सुनें। गायके घीसे भरे हुए कलशोंको गायकी आकृतिमें बनाकर उन्हें गन्ध, पुष्प आदिसे अलंकृत कर वेत वस्त्रसे भलीभाँति ढंक दे और दोहन-स्थानपर कांस्यकी दोहनी रख दे। पैरोंकी जगहमर ईखके डंडे, खुरकी जगह पर चाँदी, आँखके स्थानपर सोना, सींगोंके स्थानपर अगरुकाप्ट, दोनों बगलमें ससधान्य, गलकम्बल स्थानपर ऊनी वस्त्र, नासिकाके स्थानपर तुरुष्कदेशीय कपूर, स्तनोंके स्थानपर फल, जिलाके स्थानपर शर्करा, मुखके स्थानपर दूधमिश्चित गुड, छकी जगहपर रेशमी वस्त्र तथा रोजओकी जगहपर सफेद (गौर) सरसों और पीढकी जगहपर ताचपात्र स्थापित करे। इस प्रकारसे धृतधेनुकी रचना करे। इसी प्रकार घृतधेनुके पास ही घृतधेनु वत्सकी भी कल्पना करे। तदनन्तर विधिपूर्वक घृतधेनुकी प्रतिष्ठा कर भलीभाँति पूजन करे और इस प्रकार कहे-
आज्यं तेजः समुद्दिष्टमायं पापहरं परम्।
आज्यं सुराणामाहारः सर्वमाज्ये प्रतिष्ठितम्॥
त्वं चैवाज्यमयी देवि कल्पितासि मया किल।
सर्वपापापनोदाय सुखाय भव भामिनि।।
( उत्तरपर्व १५४।८-९)
'घृतको तेजोवर्धक तथा पापापहारी बतलाया गया है। देवताओंका आहार घृत ही है, सभी कुछ घृतमें ही प्रतिष्ठित है, इसलिये घृतमयी देवि! तुम मेरे द्वारा घृतकुण्डोंमें कल्पित की गयी हो, मेरे पापोंको नष्टकर मुझे आनन्द प्रदान करो।'
ऐसा कहकर दक्षिणासहित घृतधेनुका दान ब्राह्मणको दे दे और कहे कि ब्राह्मणदेवता। मेरा उपकार करने के लिये आप इस आज्यमयी धेनुको
१-यो न वित्तविभवन वासोभिर्न भूपमैः । तुष्यते इदयेनैव कप्तमीशं न पूजयेत् ॥
(उत्तरपर्व १५३ । ६५)
३-महर्षि मुद्दलप्रोत मुलपुराण सभी उपपुराणों में बड़ा है और इनकी धर्मनिष्ठा एवं भक्तिकी विशिष्ट कथा महाभारतके सक्तुप्रस्थीय मुदलोपाख्यान में भी अटीच आकर्षक है। धर्मको उपेक्षा के कारण पुदलपुराण अब प्रायः सुप्त-सा हो रहा है। ऐसे ही गनेशपुराण भी स्तुष्ट- सा हो रहा है। समर्थ व्यक्तियोंको इन दोनोंको प्रकाशित करनेका प्रपत्र अवश्य करना चाहिये।
ग्रहण करें। उस दिन घृतका ही आहार करना चाहिये। इसी विधिसे नवनीत (मक्खन)-धेनुका भी दान करना चाहिये। घृतधेनुका दान करनेवाला व्यक्ति उस लोकमें निवास करता है, जहाँ घी और दूधकी नदियाँ बहती हैं। वह व्यक्ति अपने सात पीढीके लोगोंका भी उद्धार कर देता है। ये फल तो सकाम दान देनेवाले व्यक्तियोंके हैं, किंतु जो व्यक्ति निष्कामभावसे घृतधेनुका दान करता है, वह निष्कल्मष होकर परम पदको प्राप्त करता है। घृत सर्वदेवमय है, इसलिये घृतके दानसे सभी देवता प्रसन्न हो जाते हैं। (अध्याय १५४)