व्यासजीने कहा-अनन्तर पुराणपुरुषसे उत्पत्र भगवान् कल्कि खग, कवच और ढाल धारण कर दिव्य अश्वपर आरूढ हो दैत्यस्वरूप म्लेच्छोंको मारकर योगमार्गका आश्रय लेंगे और सोलह हजार वर्षातक उनकी योगाग्रिसे तपायी गयी कर्मभूमि भस्मीभूत होकर निर्जीव हो जायगी। अनन्तर प्रलयंकर मेघ उत्पन्न होकर प्रलयकारी वृष्टि करेंगे और भूमि उस जलमें निमग्न हो जायगी। उस समय घोर कलियुग बलिके पास चला जायगा । कलियुगके जाने के बाद भगवान् हरि पुनः कर्मभूमिको रमणीय स्थलमयो करके योंसे देवोंका वजन करेंगे। यज्ञभाग ग्रहण करके वे देवगण शक्तिसम्पन्न हो जायेंगे और वैवस्वतमनुके पास जाकर सम्पूर्ण वृत्तान्त कहेंगे। अनन्तर कल्किके मुखसे ब्राह्मण, बाहुसे क्षत्रिय, जानुसे वैश्य और पैरसे शूद्र वर्ण उत्पन्न होंगे। ये ब्राहाणादि क्रमश: गौर, रक्त, पीत एवं श्यामवर्णके होंगे और देवीसे शक्ति प्राप्त करके अनेक पुत्र उत्पन्न करेंगे। उस समय मनुष्य जाति-धर्मका आश्रय लेकर देवताओंका यजन करेंगे। तब धोमान् वैवस्वत्त विष्णुरूप उस कल्कि हरिको नमस्कार कर उनको आज्ञासे अयोध्यामें राजपद पहण करेंगे। उनकी इच्छासे जो पर उत्पन्न होगा उसका नाम होगा इक्ष्वाकु। राजा 'इचाकु पिता वैवस्वतके राज्यको प्राप्त कर दिव्य सौ वर्षकी आयु प्राप्त कर अन्तमें
शरीरका परित्याग कर देंगे।
जब भगवान् कल्कि ब्रह्मसत्र करेंगे, तब अङ्गोंके साथ चारों वेद मूर्तिमान् हो जायेंगे। अष्टादश पुराणों के साथ वे वहाँ आयेंगे और वे सभी पुराणपुरुषके अंशभूत कल्किकी स्तुति करेंगे। कार्तिक मासके शुक्ल पक्षकी नवमी तिथिमें गुरुवारको एक श्रेष्ठ पुरुष यज्ञकुण्डसे उत्पन्न होगा। सत्यमार्गका प्रदर्शक वह सत्ययुग नामसे कहा जायगा। ब्रह्मादि देवगण नवमी तिथिमें इस रमणीय पुरुषके आविर्भावको देखकर उस तिथिका, समस्त कर्मोका क्षय करनेवाली तिधिके रूपमें वर्णन करेंगे। इस तिथिको जो मनुष्य आँवला-वृक्षके नीचे जिन देवताओंकी पूजा करेगा वे देवता उसके वशमें हो जायँगे। यह नवमी अक्षयनवमी और युगादि नवमीके नामसे प्रसिद्ध है। यह लोकमङ्गलदायिनी और सभी पापोंका नाश करनेवाली है। आँवलाके वृक्षके नीचे जो मालती और तुलसीको स्थापित कर विधिपूर्वक शालग्रामकी पूजा करता है, वह पितरोंका तृप्तिकारक एवं जीवन्मुक्त होता है। आँवला-वृक्षके नीचे जो श्राद्ध करता है, वह हजारों गया-श्राद्ध करनेका फल प्राप्त करता है और जो व्यक्ति वहाँपर होम करता है, उसे हजारों यज्ञ करनेका फल प्राप्त होता है तथा वह मरनेके बाद अनेक कुटुम्बियोंके साथ स्वर्म प्रास करता है। कल्किदेवता प्रसन्न होकर देवताओंके प्रति 'ऐसा ही हो' यह कहेंगे, यह कहकर भगवान् कल्कि देवताओंके देखते-देखते वहीं अन्तर्धान होकर सुषुप्त हो जायेंगे।
भगवान् कल्किके जानेके बाद दुःखित भगवती कर्मभूमि विरहाग्निसे संतप्त बीजोंका नाश कर देंगी। उस समय पातालनिवासी महान् दैत्यगण प्रह्लादके साथ अपने वाहनोंपर आरूढ हो अनेक अस्त्र- शस्त्रोंको लेकर देवताओंके पास गरजते हुए जायेंगे। तब इन्द्र आदि तैंतीस देवगण अपने आयुधोंको ग्रहण कर उनसे भयंकर युद्ध करेंगे। दिव्य एक वर्षतक उनका भयंकर युद्ध होगा। मरे हुए दैत्योंको शुक्राचार्य जिला देंगे, तब थके हुए देवगण युद्ध छोड़कर क्षीरसागर चले जायेंगे, जहाँ साक्षात् हरि विराजमान रहते हैं। देवगण उनकी स्तुति करेंगे। उनकी स्तुतिसे वे भगवान् देवताओंके कल्याणके लिये अपने पूर्वार्धसे हंसरूप बना लेंगे। वे हंसरूपी साक्षात् हरि सैकड़ों सूर्यको कान्तिके समान प्रभावशाली होंगे। प्रह्लादादि प्रमुख दैत्यगण एवं शुक्राचार्यको वे अपने तेजसे तप्त कर देंगे। तब पराजित दैत्यगण पृथ्वीको छोड़कर दुःखित हो वितललोकमें चले जायेंगे। महादेवसे रक्षित वे सभी देवगण निर्भय, निरुपद्रव हो जायेंगे और पृथ्वीपर वैवस्वतके पुत्रका अभिषेक करेंगे। वे इश्वाकु दिव्य सौ वर्षकी आयुवाले होंगे, उस समय मनुष्यकी आयु चार सौ वर्षकी होगी। धर्मके चार पाद हैं-