भविष्य पुराण

सम्प्राप्ति-द्वादशी एवं गोविन्द-द्वादशीव्रत

भगवान् श्रीकृष्णने कहा-पौष मासके कृष्ण पक्षकी द्वादशीसे ज्येष्ठ मासकी द्वादशीतक प्रत्येक मासकी कृष्ण द्वादशीको पाण्मासिक सम्प्राप्ति-द्वादशीव्रत किया जाता है। प्रत्येक मासमें क्रमश: पुण्डरीकाक्ष, माधव, विश्वरूप, पुरुषोत्तम, अच्युत तथा जय-इन नामोंसे उपवासपूर्वक भगवान् की पूजा करनी चाहिये। पुनः आषाढ़ कृष्ण द्वादशीसे व्रत ग्रहणकर मार्गशीर्षतक व्रतका नियम लेना चाहिये। पूर्वविधानसे उपवासपूर्वक उन्हीं नामोंसे क्रमश: भगवान्का पूजन करना चाहिये। प्रतिमास ब्राह्मणको भोजन कराकर दक्षिणा देनी चाहिये। तेल एवं क्षार पदार्थ नहीं ग्रहण करने चाहिये इस प्रकार एक वर्षतक इस नतके करनेसे सभी कामनाएं पूर्ण हो जाती हैं और अन्त में वह भगवानके अनुग्रहसे उनके लोक को प्राप्त कर लेता है।

भगवान् श्रीकृष्णने पुन: कहा- महाराज! इसी प्रकार गोविन्द द्वादशी नामका एक अन्य व्रत है, जिसके करनेसे सभी अभीष्ट सिद्ध हो जाते हैं। पौष मांसके शुक्ल पक्षकी द्वादशोको उपवास कर पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदिसे कमलनयन भगवान् गोविन्दका पूजनकर अन्तर्मनमें भी इसी नामका उच्चारण करते रहना चाहिये। इस दिन पाखण्डियोंसे बात नहीं करनी चाहिये। ब्राह्मणोंको यथाशक्ति दक्षिणा देनी चाहिये। व्रतीको गोमूत्र, गोमय, दधि अथवा गोदुग्धका प्राशन करना चाहिये। दूसरे दिन स्नानकर उसी विधिसे गोविन्दका पूजन कर ब्राह्मणको भोजन कराकर स्वयं भी भोजन करना चाहिये। इसके साथ ही इस दिन गौको तृप्तिपूर्वक भोजन कराना चाहिये। इसी प्रकार प्रतिमास व्रत करते हुए वर्ष समाप्त होनेघर भगवती लक्ष्मौके साथ सुवर्णको भगवान् गोविन्दकी प्रतिमा बनवाकर पुष्य, धूप, दीप, माला, नैवेद्य आदिसे उसका पूजनकर सवत्सा गाँसहित ब्राह्मणोंको देना चाहिये । प्रतिमास गौओंको पूजा तथा उन्हें ग्रासादिसे तृम करना चाहिये। पारणाके दिन विशेषरूपसे उनकी सेवा-भक्ति करनी चाहिये। इस व्रतको करनेसे वही फल प्राप्त होता है जो सुवर्णशृङ्गी सौ गोओंके साथ एक उत्तम वृधका दान देनेसे होता है। इस व्रतको सम्यक्-रूपसे करनेवाला सब सुख भोगकर अन्तमें गोलोकको प्राप्त होता है। (अध्याय ७७-७८)