भगवान् श्रीकृष्णने कहा-महाराज ! पूर्वकालमें भगवान् विष्णुने वामनरूप धारणकर दानवराज बलिको छलकर इन्द्रको राज्यका भार सौंप दिया और राजा बलिको पाताललोकमें स्थापित कर दिया। भगवान्ने बलिके यहाँ सदा रहना स्वीकार किया। कार्तिककी अमावास्याको रात्रिमें सारी पृथ्वीपर दैत्योंकी यथेष्ट चेष्टाएँ होती हैं।
युधिष्ठिरने पूछा- भगवन् ! कौमुदीतिथिको विधिको विशेषरूपसे बतानेकी कृपा करें। उस दिन किस वस्तुका दान किया जाता है। किस देवताको पूजा की जाती है तथा कौन-सी क्रीडा करनी चाहिये।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले- राजन्! कार्तिक मासके कृष्ण पक्षको चतुर्दशीको प्रभातके समय नरकके भयको दूर करने के लिये स्नान अवश्य करना चाहिये। उपामार्ग (चिचड़ा)-के पत्र सिरके ऊपर मन्त्र पढ़ते हुए घुमाये । इसके बाद धर्मराजके नामों-यम, धर्मराज, मृत्यु, वैवस्वत, अ-तक, काल तथा सर्वभूतक्षयका उच्चारण कर तर्पण करे। देवताओंकी पूजा करने के बाद नरकसे बचनेके उद्देश्यसे दीप जलाये। प्रदोषके समय शिव, विष्णु, ब्रह्मा आदिके मन्दिरोंमें, कोष्ठागार, चैत्य, सभामण्डप नदीतट, महल, तडाग, उद्यान, वापी, माग, हस्तिशाला तथा अश्वशाला आदि स्थानों में दीप प्रज्वलित करने चाहिये।
अमावास्याके दिन पात: काल मानकर देवता और पितरोंका भक्तिपूर्वक पूजन-तर्पण आदि करे तथा पार्वण-श्राद्ध करे। अनन्तर ब्राह्मणको दूध, दही, घृत और अनेक प्रकारके स्वादिष्ट भोजन कराकर दक्षिणा प्रदान करे और उन्हें संतुष्ट करे। अपराह्नकालमें राजाद्वारा अपने राज्यमें यह घोषित कराना चाहिये कि 'आज इस लोकमें बलिका शासन है। नगरके सभी लोगोंको अपनी सामर्यक अनुसार अपने घरको स्वच्छ-साफ-सुथरा करके नाना प्रकारके रंग-बिरंगे तोरण-पताकाओं, पुष्पमालाओं तथा बंदनवारोंसे सजाना चाहिये। नगरके सभी लोगों अर्थात् नर-नारी, बाल वृद्ध आदिको चाहिये कि सुन्दर उत्तम वस्त्र पहनकर कुंकुम, चन्दन आदिका लेप लगाकर ताम्बूलका भक्षण करते हुए आनन्दपूर्वक नृत्य-गीतादिकोंका आयोजन करें।' इस प्रकार अतीव उल्लाससे एवं प्रीतिपूर्वक इस दिन दीपोत्सव मनाना चाहिये। प्रदोषके समय दीपमाला प्रज्वलित कर अनेक प्रकारके दीप-वृक्ष खड़े करने चाहिये। उस समय राक्षस लोकमें विचरण करते हैं। उनके भयको दूर करने के लिये श्रेठ कन्याओंको दीप-वृक्षोंपर तण्डुल (धानका लावा) फेंकते हुए दीपकोंसे नीराजन्न करना चाहिये। दीपमालाओंके जलानेसे प्रदोष-वेला दोषरहित हो जाती है और राक्षसादिका भय दूर हो जाता है। इस प्रकार अति शोभासम्पत्र नगरको शोभा देखनेके उद्देश्यसे राजाको अपने मित्र, मन्त्री आदिके साथ
अर्धरात्रिके समय धीरे-धीरे पैदल ही चलना
*मन्त्र इस प्रकार है-
हर पापमपामार्ग भ्राम्यमाणं पुनः पुनः।
आपदं किल्विवं चापि ममापहर सर्वशः। अपामार्ग नमस्तेस्तु शरीरं मम शोधय।।
चाहिये। राजकर्मचारी भी हाथमें प्रज्वलित दीपक लिये रहें। पूरे नगरकी रमणीयता देखकर राजाको यह मानना चाहिये कि राजा बलि मेरे ऊपर आज प्रसन्न हो गये होंगे। फिर राजा अपने महलमें वापस आ जाय।
आधी रात बीत जानेपर जब सब लोग निद्रामें हों, उस समय घरकी स्त्रियोंको चाहिये कि वे सूप बजाते हुए घरभरमें घूमती हुई आँगनतक आयें और इस प्रकार वे दरिंद्रा-अलक्ष्मीका अपने घरसे निस्सारण करें। प्रात:काल होते ही राजाको चाहिये कि वस्त्र, आभूषण आदि देकर ब्राह्मणों, सत्पुरुषोंको संतुष्ट करे और भोजन, ताम्बूल देकर मधुर वचनोंसे पण्डितोंका सत्कार करे तथा सामन्त, सिपाही और सेवक आदिको आभूषण, धन आदि देकर संतुष्ट करे तथा अनेक प्रकारके मल्लक्रीडा आदिका आयोजन करे। राजाको मध्याह्नके अनन्तर नगरके पूर्व दिशामें ऊंचे स्तम्भ अथवा वृक्षोंपर कुश और काशकी बनी मार्गपाली? बाँधकर उसकी पूजा करे। फिर हवन करे। अपनी प्रजाको भोजन देकर संतुष्ट करे। उस समय राजाको मार्गपालीकी आरती करनी चाहिये, यह आरती विजय प्रदान करती है। उसके बाद गाय, बैल, हाथी, घोड़ा, राजा, राजपुत्र, ब्राह्मण, शूद्र आदि सभी लोगोंको उस मार्गपालोके नीचेसे निकलना चाहिये। मार्गपालीको बाँधनेवाला अपने दोनों कुलोंका उद्धार करता है। इसका लङ्घन करनेवाले वर्षभर सुखी और नीरोग रहते हैं फिर भूमिपर पाँच रंगोंसे मण्डल लिखकर उसके मध्यमें प्रसन्नमुख, द्विभुज, कुण्डल धारण करनेवाले कुष्माण्ड, आण तथा मुर आदि दानवोंके साथ
सर्वाभरणभूषित रानी विन्ध्याचलीसहित राजा बलिकी मूर्तिकी स्थापना करे और कमल, कुमुद, कहार, रक्त कमल आदि पुष्पों तथा गन्ध, दीप, नैवेद्य, अक्षत और दीपकों तथा अनेक उपहारोंसे राजा बलिको पूजा कर इस प्रकार प्रार्थना करे-
बलिराज नमस्तुभ्यं विरोचनसुत प्रभो।
भविष्येन्द्रसुराराते पूजेर्य प्रतिगृह्यताम्॥
(उत्तरपर्व १४०।५४)
इस प्रकार पूजन कर रात्रिको जागरणपूर्वक महोत्सव करना चाहिये। नगरके लोग अपने-अपने घरमें शय्यामें श्वेत तण्डुल बाँधकर राजा बलिको उसमें स्थापितकर फल-पुष्मादिसे पूजन करें और बलिके उद्देश्यसे दान करें, क्योंकि राजा बलिके लिये जो व्यक्ति दान देता है, उसका दिया हुआ दान अक्षय हो जाता है। भगवान् विष्णुने प्रसन्न होकर बलिसे पृथ्वीको प्राप्त किया और यह कार्तिकी अमावास्या तिथि राजा बलिको प्रदान की, उसी दिनसे यह कौमुदीका उत्सव प्रवृत्त हुआ है। यह तिथि सभी उपद्रव, सभी प्रकारके विघ्र, शोक आदिको दूर करनेवाली है। धन, पुष्टि, सुख आदि प्रदान करती है । 'कु' यह पृथ्वीका वाचक शब्द है और 'मुदी' का अर्थ होता है प्रसन्नता। इसलिये पृथ्वीपर सबको हर्ष देनेके कारण इसका नाम कौमुदी पड़ा। जो राजा वर्षभरमें एक दिन राजा बलिका उत्सव करता है, उसके राज्यमें रोग, शत्रु महामारी और दुर्भिक्षका भय नहीं होता। सुभिक्ष, आरोग्य और सम्पत्तिको वृद्धि होती है। इस कौमुदी तिथिको जो व्यक्ति जिस भावमें रहता है, उसे वर्षभर उसी भावकी प्राप्ति होती है। यदि व्यक्ति उस दिन रुदन कर
१-मार्गपाली दरवाजे के पास बन्द हुआ स्वागन्दार है, जो कुश, काश, तृण आदि और आप तथा अशोकके पत्ते अलंकृत कर बनायी जाती है।
२-विष्णुना चसुधा तसा प्रोजेन बलये पुनः उपकारपरो दत्तधासुराणा महोत्सवः ।।
ततः प्रभृति राजेन्द्र प्रवृत्ता कौमुदी पुनः ।
(उत्तरपर्व १४० १५९६०)
रहा हो तो रुदन, हर्षित है तो हर्ष, दु:खी है तो दुःख, सुखी है तो सुख, भोगसे भोग, स्वस्थतासे स्वस्थता तथा दीन रहनेसे दीनताकी प्राप्ति होती है। इसलिये इस तिथिको हष्ट और प्रसन्न रहना चाहिये। यह तिथि वैष्णवी भी है, दानवी भी है और पैत्रिकी भी है। दीपमालाके दिन जो व्यक्ति भक्तिसे राजा बलिका पूजन-अर्चन करता है, वह वर्षभर आनन्दपूर्वक सुखसे व्यतीत करता है और उसके सारे मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। (अध्याय १४०)