भविष्य पुराण

तुलापुरुषदानकी विधि

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं- महाराज ! पूर्वकालमें स्वायम्भुव मनुके पुत्र प्रियव्रत नामके एक बड़े प्रतापी और धर्मात्मा राजा हो गये हैं। उन्होंने तीस हजार वर्षतक धर्मपूर्वक राज्य किया और पृथ्वीको सात द्वीपोंमें बाँटकर उनमें अपने सातों पुत्रोंको प्रतिष्ठित कर दिया। तदनन्तर वे विषयोंसे विरत होकर तप करने के लिये वनमें चले गये। राजा प्रियव्रतको तपोवनमें आया जानकर बड़े-बड़े महात्मा, तपस्वी और मुनिगण राजाका दर्शन करनेकी इच्छासे उनके पास आये। राजाने भी पाद्य, अर्घ्य और आचमन आदिसे उनका पूजन किया तथा मधुर वाणीसे फुशल-क्षेम पूछकर बैठनेके लिये आसन दिया। उसी समय सूर्यके समान देदीप्यमान ब्रह्माजीके पुत्र पुलस्त्यमुनिने वहाँ पदार्पण किया । पुलस्त्यजीको आये देखकर राजासहित सभी मुनि उठ खड़े हुए और उन्होंने अतीव सत्कारपूर्वक आसन देकर पाद्यादिसे पूजन किया। तदनन्तर सभी लोग सुखपूर्वक आसनपर बैठ गये। फिर शास्त्र-चर्चा होने लगी।

इसी प्रसंगमें मुनियोंने संसारके कल्याणकी कामनासे पुलस्त्यमुनिसे पूछा-'मुनिसत्तम! पुरुष और स्त्रियोंको किस दान, व्रत, नियम आदिसे सदति प्राप्त होती है। आप उनका वर्णन करें। आपके मुखसे मधुर वचन सुननेकी अभिलाषा हमलोगोंसहित राजा प्रियव्रतको भी है।'

1-शास्त्रं शस्त्रकलाशिल्प यो यदिचोदुपार्जितुम् ।

तस्योपकारकरणे पार्थ कार्य सदा मनः॥

(उत्तरपर्व १७४ । २०)

२-प्राचीन भारतके विद्यादान और प्रचारमें भगवान् शिव-विष्णु की भक्ति, सदाचार और परोपकार आदि प्राण थे। यह इस अध्यायसे तथा दानसागर, दानकल्पतरु आदि निव-य-ग्रन्थोंसे भी स्पष्ट है। इससे भगवत्यादि का प्राणी कृतार्थ हो जाते थे। पर आजकै शिकलय प्रायः ठीक इसके विपरीत है। उनमें धर्म, सदाचारका कोई स्थान नहीं है। पार्मिक शिक्षा विद्यालयोंसे महिष्कृत हो गयी है और जब शासन ही धर्मनिरपेक्ष है तो कहना हो क्या?

३-यह प्रकरण मत्स्यपुराणके २७४वें अध्यायमें प्रायः इसी प्रकार प्राप्त होता है। इसौके साथ-साथ वहाँ योडश महादानका वर्णन हुआ है।

पुलस्त्यमुनिने कहा-मुनीश्वरो ! मैं सभी दानोंमें  उत्तम, सुगुप्त और सर्वपापहारी तुलादानकी विधि बता रहा हूँ। जिसके करनेसे स्त्री अथवा पुरुष ब्रह्महत्या, गोहत्या, पितृहत्या, गुरुपत्नीगमन, कूटसाक्ष्य (झूठी गवाही) आदि अनेक पापोंसे छूटकर विशुद्ध-शरीर हो जाता है। यदि मनुष्यको ब्रह्मलोक- प्राप्तिकी इच्छा है तो वह कृच्छ्र-चान्द्रायण आदि व्रत तथा तुलापुरुषदान करे। मुनियो ! कृच्छ्र-चान्द्रायण आदि व्रत वनवासी ब्राह्मणों, भिक्षुओं और विधवा नारियोंके लिये कहे गये हैं, ये व्रत शरीरको कष्ट देनेसे ही सिद्ध होते हैं। राजा, धनवान्, गृहस्थ इस कृच्छ्रसाध्य धर्मको नहीं सम्पादित कर सकते। धन मानो मनुष्योंका बाहर रहनेवाला प्राण ही है। इसलिये धनवान् व्यक्तियोंको इन्हें धर्ममें लगाकर सार्थक बनाना चाहिये। संसारमें सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला, सभी द्रव्यों में श्रेष्ठ स्वर्ण है, यह देवताओंके प्रधान अग्निदेवका ही पुत्र है। विद्वान् व्यक्तिको चाहिये कि उस स्वर्णसे अपनेको तौल ले फिर उसके दानसे सभी पाप दूर हो जाते हैं और दिव्य शरीरकी प्राप्ति होती है। महाराज! इस प्रकार पुलस्त्यमुनिने ऋषियों और राजा प्रियव्रतसे तुलादानके माहात्म्यको बतलाया। वही विधि ऋषियोंने मुझसे कही और मैं आपसे कह रहा हूँ, आप सावधान होकर सुनें।

व्यतीपात, अयनसंक्रान्ति, विषुवयोग, ग्रहण, ग्रहपीडा होनेपर, दुःस्वप्न देखनेपर, कार्तिकी अथवा माघी पूर्णिमा आदि पर्वके दिनों में या जब पर्याप्त धन उपलब्ध हो, उस समय तुलापुरुषदान करना चाहिये। मनुष्यको निरन्तर यही विचार करना चाहिये कि जीवन अनित्य है, सम्पत्ति अत्यन्त चाल है, मृत्युने केशोंको पकड़ रखा है, शरीरका कब अन्त हो जाय, यह निश्चित नहीं अतः सदा धर्माचरण ही करना चाहिये। इसलिये जब भी श्रद्धा हो, उसी समय दान आदि करना चाहिये, वही दान देनेका उचित समय है। अखासे ही फल होता है। तीर्थ, देवालय, गोष्ठ अथवा अपने घरमें दान करना चाहिये। अपने घरके अथवा देवालयके प्राङ्गणमें सोलह हाथ लम्बे-चौड़े पताका आदिसे सुसज्जित एक सुन्दर मण्डपकी रचनाकर उसके बीचमें सात हाथ लम्बी-चौड़ी और एक हाथ ऊँची चौरस वेदी बनाये। फिर उसके मध्यमें विधिपूर्वक दिव्य तुलाको स्थापित करे। दो स्तम्भोंको जो चार हाथ ऊँचे हों, दो हाथ गहरा गड्ढा खोदकर उसमें सुदृढ़ कर दे। चन्दन, खदिर, बिल्व, शाल, इंगुदी, तिंदुक, देवदारु और श्रीपर्ण-इन आठ वृक्षों मेंसे किसी भी वृक्षके लकड़ीका स्तम्भ बनाना चाहिये अथवा किसी मजबूत काष्ठवाले याज्ञिक वृक्षकी लकड़ीका स्तम्भ बनाना चाहिये। स्तम्भके ऊपर उसी काष्ठका चार हाथ लम्बा एक तिरछा काष्ठ रखकर उसमें छानबे अङ्गुल लम्बी लौह शृङ्खला लगानी चाहिये। उसमें लोहेके दो पलड़े भी बनाने चाहिये। मध्यमें तुलापुरुषको प्रतिमा बनाकर उसकी पूजा करे। इस प्रकारकी तुलाको रत्न, वस्त्र, आभूषण, चन्दन तथा पुष्पमाला आदिसे अलंकृत करे।

तीन मेखला और योनिसे युक्त हस्तप्रमाणवाले चार कुण्ड बनाकर ईशानकोणमें एक हाथ लम्बी-चौड़ी वेदी बनाये। उसके ऊपर ग्रह और दियालोका पूजन करे। गन्ध, पुष्प, धूप, दीप

१-यदेतद् इविणं नाम प्राणाचैते बहिवराः ।

तस्माद् बहिरैः प्रातात्या योन्यः सदा युधैः ।

(उत्तरपर्व १७५ ६१९-२०)

२-यदा वा जायते वितं तदा देवमिदं भवेत् ।

अनिल्यं जीवितं यस्माह सुझातीव चञ्चलम् ॥

कैरोषु च गृहीत: स-मृत्युना धर्ममाचरेत् ।

(उत्तरपर्व १७०५।२७-२८)

अक्षत, चन्दन, फल और वस्त्रादिसे ब्रह्मा, विष्णु तथा शंकरका पूजन करे। क्षीर-वृक्षके पत्तोंसे तोरण बनाये और मण्डपके चारों द्वारोंपर पुष्पमाला तथा पल्लव आदिसे सुशोभित कलशोंको सप्तधान्यके ऊपर स्थापित करे। ऋग्वेद जाननेवाले दो ब्राह्मणों को पूर्व कुण्डपर, यजुर्वेदके ज्ञाता दो ब्राह्मणोंको दक्षिण कुण्डपर, सामवेदके जाननेवाले दो ब्राह्मणों को पश्चिम कुण्डपर और अथर्ववेदी दो ब्राह्मणों को उत्तर दिशाके कुण्डुपर हवनके लिये नियुक्त करे। इनके अतिरिक्त एक नर्वे धर्मोपदेशक ब्राह्मणका भी वरण करे। कुछ ऋषियोंका मत है कि सोलह ऋत्विक् हवनके लिये नियुक्त करने चाहिये। वरणके समय प्रत्येक ऋत्विक्को दो ताम्रपात्र और एक आसन दे। तिल, घी, समिधा, विष्टर, पुष्प, कुश, सुक् तथा स्रुव आदि सभी हवनको सामग्रियोंको एकत्रित कर लोकपालोंके रंगको पताका उनको दिशामें लगानी चाहिये और बीचमें महाध्वज खड़ा करना चाहिये तथा पाँच रंगोंवाला वितान भी बाँधना चाहिये।

इस प्रकार सभी सामग्रियोंको सम्पादित कर सभी शिल्पकार्यों में निपुण शिल्पकार (बई) ब्राह्मणों के साथ बनाये गये उस मण्डपको यजमानको दिखलाये। यज्ञकी रक्षाके लिये यजमान स्नानकर श्वेत वस्त्र पहनकर इन्द्रादि दिक्पालोंका आवाहन करे तथा उन्हें बलि प्रदान करे और प्रार्थना करे। उस समय अनेक प्रकारके शह-तूर्य आदि वाद्य बजते रहें और मङ्गल-वेदध्वनि होती रहे। आवाहन आदिके मन्त्रोंका भावार्थ इस प्रकार है-

इन्द्रदेव ! आप देवताओंके स्वामी और बज धारण करनेवाले हैं. सभी अमर, सिद्ध और साध्य आपको स्तुति करते हैं तथा अप्सराओंके सना आपपर पंखा झलते हैं। आप या पधारिये और हमारे पक्षको रक्षा कीजिये। इन्द्रदेवताको नमस्कार है। ऐसा कहकर इन्द्रका आवाहन करना चाहिये। अग्निदेव! आप सभी देवताओंके हव्यवाहक हैं, मुनिवरगण सब ओरसे आपकी सेवा करते हैं, आप अपने तेजस्वी लोकगणोंके साथ यहाँ आयें और मेरे यज्ञकी रक्षा करें, आपको प्रणाम है। ऐसा कहकर अग्निदेवका आवाहन करना चाहिये। सूर्यपुत्र धर्मराज! आप सभी देवताओंद्वारा पूजित, दिव्य शरीरधारी और शुभ एवं अशुभ तथा आनन्द एवं यज्ञके अधीश्वर हैं, हमारे कल्याणके लिये हमारे यज्ञकी रक्षा कीजिये। आपको नमस्कार है। ऐसा कहकर यमका आवाहन करना चाहिये। निर्ऋतिदेव! आप लोकोंके अधीश्वर तथा राक्षससमूहके नायक हैं। पिशाचनाथ! आप वैतालों और पिशाचोंके विशाल समूहके साथ यहाँ आइये और मेरे यज्ञकी रक्षा कीजिये। आपको प्रणाम है। ऐसा कहकर निर्ऋतिका आवाहन करना चाहिये। वरुणदेव ! विद्याधर और इन्द्र आदि देवता आपका गुण-गान करते हैं, आप समस्त जलचरों, समुद्रों, बादलों एवं अप्सराओंके साथ यहाँ आइये तथा हमारी रक्षा कीजिये। आपको नमस्कार है। ऐसा कहकर वरुणका आवाहन करना चाहिये। वायुदेव! आप कालाग्निके सहायक और प्राणोंके अधीश्वर हैं, आप मृगपर आरूढ़ हो सिद्ध-समूहोंके साथ मेरी रक्षा करनेके लिये यज्ञमें पधारिये तथा मेरी पूजा स्वीकार कीजिये। आपको नमस्कार है। ऐसा कहकर वायुका आवाहन करना चाहिये। सोमदेव! आप नक्षत्रगणों, सभी ओषधियों तथा पितरोंके साथ यहाँ आइये और मेरे यज्ञकी रक्षा कीजिये। भगवन् ! आप मेरी पूजा स्वीकार कीजिये, आपको प्रणाम है। ऐसा कहकर सोमका आवाहन करना चाहिये। सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी विश्वेश्वर ! विश्वमूर्ति । ईशानदेव! आप त्रिशूल, कपाल, खट्वाङ्ग धारण करनेवाले अपने गणों के साथ हमारे यज्ञमें सिद्धि प्रदान करनेके लिये उपस्थित होइये और लोकेश ! मेरी पूजा ग्रहण कीजिये। भगवन्! आपको अभिवादन है। ऐसा कहकर ईशानका आवाहन करना चाहिये। अनन्तदेव ! आप पाताल एवं पृथ्वीको धारण करनेवालोंमें श्रेष्ठ हैं तथा नागपत्रियाँ और किंनर आपका गुणगान करते हैं। आप यक्षों, नागेन्द्रों और देवगणों के साथ यहाँ आइये तथा हमारे यज्ञकी रक्षा कीजिये। ऐसा कहकर अनन्तका आवाहन करना चाहिये। विश्वाधिपते! आप समस्त जगत्के विधाता हैं। मुनीन्द्र! आप पितर, देवता एवं लोकपालोंके साथ यहाँ पधारिये। पितामह ब्रह्मन्! आप कल्याण करनेके लिये हमारे यज्ञमें प्रविष्ट होइये। भगवन्! आपको प्रणाम है। ऐसा कहकर ब्रह्माका आवाहन करना चाहिये। त्रिलोकीमें जितने स्थावर-जंगम प्राणी हैं, वे सभी ब्रह्मा, विष्णु और शिवके साथ मेरी रक्षा करें। देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, सर्प, ऋषिगण, मनु, गौएँ, देवमाताएँ—ये सभी हर्षपूर्वक मेरे यज्ञको रक्षा करें।'

इस प्रकार देवताओंका आवाहन कर ऋत्विजोंको सुवर्णका आभूषण, कुण्डल, जंजीर, कङ्कण, पवित्र अंगूठी, वस्त्र तथा शय्याका दान करना चाहिये। गुरुको ये आभूषण और वस्त्र दूना देना चाहिये। सर्वप्रथम आधार और आज्यभागसे हवन करे। जिन ग्रहों, लोकपालों तथा देवताओंको प्रतिक्षा की जाय, सबके तत्तद् मन्त्रोंसे हवन करना चाहिये। तत्पश्चात् माङ्गलिक शब्दों का उच्चारण करते हुए वेदज्ञोंद्वारा अभिषिक्त यजमान श्वेत वस्त्र धारणकर अनलिमें पुष्प ले उस तुलाको तीन बार प्रदक्षिणा कर उसे इस प्रकार अभिमान्चित करे

नमस्ते सर्वदेवानां शक्तिस्त्वं सत्यमास्थिता ।।

साक्षिभूता जगद्धावि निमिता विश्वयोनिना।

एकता सर्वसत्यानि तथावृत्तशतानि च।

धर्माधर्मकृतां मध्ये स्थापितासि जगद्धिते।

त्वं तुले सर्वभूतानां प्रमाणमिह कीर्तिता॥

मां तोलयन्ती संसारादुद्धरस्व नमोऽस्तु ते।

योऽसौ तत्त्वाधिपो देवः पुरुषः पञ्चविंशकः ॥

स एकोऽधिष्ठितो देवि त्वयि तस्मानमो नमः ।

नमो नमस्ते गोविन्द तुलापुरुषसंज्ञक ।।

त्वं हरे तारयस्वास्मानस्मात् संसारसागरात् ।

(उत्तरपर्व १७५ । ७१-७६)

'तुले! तुम सभी देवताओंकी शक्तिस्वरूपा हो, तुम्हें नमस्कार है। हे जगद्धात्रि! तुम सत्यकी आत्रयभूता, साक्षिस्वरूपा और विश्वयोनि ब्रह्माद्वारा निर्मित की गयी हो, जगत्की कल्याणकारिणी! तुम्हारी एक तुलापर सभी सत्य हैं, दूसरीपर सौ असत्य हैं। धर्मात्मा और पापियोंके बीच तुम्हारी स्थापना हुई है। तुम भूतलपर सभी जीवोंके लिये प्रमाणरूप बतलायी गयी हो। मुझे तोलती हुई तुम इस संसारसे मेरा उद्धार कर दो, तुम्हें नमस्कार है। देवि! जो ये तत्त्वोंके अधीभर पचीसवें पुरुष भगवान् हैं, वे एकमात्र तुम्हीमें अधिष्ठित हैं, इसलिये तुम्हें बारम्बार प्रणाम है। तुलापुरुषरूप गोविन्द! आपकों बारम्बार अभिवादन है। हरे! आप इस संसाररूपी सागरसे हमारा उद्धार करें।'

इस प्रकार बुद्धिमान् पुरुष पुण्यकालमें अधिवासन कर भक्तिपूर्वक प्रणाम कर तुलापर आरोहण करे। उस समय वह खड्ग, दाल, कवच एवं सभी आभरणोंसे अलंकृत रहे। वह सुवर्णनिर्मित सूर्यसहित धर्मराजको बँधी हुई मुट्ठीवाले दोनों हाथोंसे पकड़कर विष्णुके मुखकी ओर देखता हुआ स्थित रहे।

तदनन्तर ब्राह्मणोंको चाहिये कि वे तुलाकी दूसरी और यजमानकी तोलसे कुछ अधिक अत्यन्त निर्मल स्वर्ण रखें। पुष्टिकामी श्रेष्ठ मनुष्य जबतक स्वर्ण की तुला भूमिपर स्पर्श न कर ले, तबतक स्वर्ण रखे। फिर क्षणमात्र चुप रहकर इस प्रकार निवेदन करे-

नमस्ते सर्वभूतानां साक्षिभूते सनातने।

पितामहेन देवि त्वं निर्मिता परमेष्ठिना॥

रखया धृतं जगत्सर्व सहस्थावरजंगमम्।

सर्वभूतात्मभूतस्थे नमस्ते विश्वधारिणि॥

(उत्तरपर्व १७५। ८१-८२)

'सभी जीवोंकी साक्षिभूता सनातनी देवि! तुम पितामह ब्रह्माद्वारा निर्मित हुई हो, तुम्हें नमस्कार है। तुले! तुम समस्त स्थावर-जंगमरूप जगत् को धारण करनेवाली हो, सभी. जीवोंको आत्मभूत करनेवाली विश्वधारिणि! तुम्हें नमस्कार है।' तत्पश्चात् तुलासे उतरकर स्वर्णका आधा भाग पहले गुरुको देना चाहिये एवं बचे हुए आधे भागको हाथमें जल लेकर संकल्पपूर्वक ऋत्विजोंको दे देना चाहिये। पुनः उनकी आज्ञा लेकर अन्य ब्राह्मणोंको भी दान दे। विशेषतया दीनों एवं अनाथोंको भी ब्राह्मणों के साथ दान देना चाहिये। बुद्धिमान् पुरुष, उस तोले गये स्वर्णको अधिक देरतक अपने घरमें न रखे। क्योंकि यदि वह घरमें रह जाता है तो मनुष्योंको भय देनेवाला, शोक और व्याधिको बढ़ानेवाला होता है, उसे शीघ्र ही दूसरेको दे देनेसे मनुष्य श्रेयका भागी हो जाता है।

इसी विधिसे चाँदी और कपूरसे भी तुलादान किया जाता है। सौभाग्यकी इच्छा रखनेवाली स्त्रीको कृष्ण पक्षकी तृतीयाको कुंकुम, लवण और गुड़का तुलादान करना चाहिये। इसमें मन्त्र और हवनकी अपेक्षा नहीं रहती। इस विधिसे जो स्त्री अथवा पुरुष तुलादान करते हैं, वे श्रेष्ठ सुन्दर विमानमें बैठकर सूर्यलोकको जाते हैं। वहाँ एक कल्पतक निवासकर वह विष्णुलोक, शिवलोक, विश्वेदेवलोक, इन्द्रलोक, धर्मराजलोक, वरुणलोक, कुबेरलोक आदिमें अनेकों कल्पोंतक निवासकर पुनः मनुष्यलोकमें जन्म लेकर धर्मात्मा, दानी और शत्रुओंका क्षय करनेवाला राजाका पद प्राप्त करता है। जो व्यक्ति इस महादानके माहात्म्यको भक्तिपूर्वक सुनता है, वह भी त्रिविध पापोंसे मुक्त हो जाता है। ब्रह्मा, विष्णु, शिवसे कोई उत्तम पूजनीय देवता नहीं है, अश्वमेधके समान कोई यज्ञ नहीं, गङ्गाके समान कोई पवित्र नदी नहीं और तुलादानके समान कोई अन्य दान नहीं है। (अध्याय १७५)