सुमन्तु मुनि बोले-राजन्! भगवान् सूर्यकी भक्ति, पूजा और उनके लिये दान करना तथा हवन करना सबके वशकी बात नहीं है तथा उनकी भक्ति और ज्ञान एवं उसका अभ्यास करना भी अत्यन्त दुर्लभ है। फिर भी उनके पूजन-स्मरणसे इसे प्राप्त किया जा सकता है। सूर्य- मन्दिरमें सूर्यको प्रदक्षिणा करनेसे वे सदा प्रसन्न रहते हैं । सूर्यचक्र बनाकर पूजन एवं सूर्यनारायणका स्तोत्र-पाठ करनेवाला व्यक्ति इच्छित फल एवं पुण्य तथा विषयोंका परित्याग कर भगवान् सूर्यमें अपने मनको लगा देनेवाला मनुष्य निर्भीक होकर उनकी निश्चल भक्ति प्राप्त कर लेता है।
राजा शतानीकने पूछा- द्विजश्रेष्ठ! मुझे भगवान् सूर्यकी पूजन विधि सुननेकी बड़ी ही अभिलाषा है। मैं आपके ही मुखसे सुनना चाहता हूँ। कृपाकर कहिये कि सूर्यको प्रतिमा स्थापित करनेसे कौन सा पुण्य और फल प्राप्त होता है तथा सम्मार्जन करने और गन्ध आदिके लेपनसे किस पुण्यको प्राप्ति होती है। आरती, नृत्य, मङ्गल गीत आदि कृत्योंके करनेसे कौन-सा पुण्य प्राप्त होता है। अर्घ्यदान, जल एवं पज्ञामृत आदिसे स्लान, कुश, रक्त पुष्प, सुवर्ण, रस, गन्ध, चन्दन, कपूर आदिके द्वारा पूजन, गन्धादि-विलेपन, पुराण-प्रवण एवं वाचन, अव्यङ्ग-दान और व्योमरूपमें भगवान् सूर्य तथा अरुणकी पूजा करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह बतलानेकी कृपा करें।
सुमन्तु मुनि बोले-राजन् ! प्रथम आप भगवान् सूर्यके महनीय तेजके विषयमें सुनें । कल्पके प्रारम्भमें ब्रह्मादि देवगण अहंकारके वशीभूत हो गये। तमरूपी मोहने उन्हें अपने बशमें कर लिया। उसी समय उनके अहंकारको दूर करनेके लिये एक महनीय तेज प्रकट हुआ, जिससे यह सम्पूर्ण विश्व व्यास हो गया। अन्धकार-नाशक तथा सौ योजन विस्तारयुक्त वह तेज:पुञ्ज आकाश भ्रमण कर रहा था। उसका प्रकाश पृथ्वीपर कमलकी कर्णिकाकी भाँति दिखलायी दे रहा था। यह देख ब्रह्मादि देवगण परस्पर इस प्रकार विचार करने लगे हमलोगोंका तथा संसारका कल्याण करने के लिये ही यह तेज प्रादुर्भूत हुआ है। यह तेज कहाँसे प्रादुर्भूत हुआ, इस विषय में वे कुछ न जान सके और इस तेजने सभी देवगणोंको आचर्यचकित कर दिया। तेजाधिपति उन्हें दिखायी भी नहीं पड़े। ब्रह्मादि देवताओंने उनसे पूछा- देव। आप कौन हैं, कहाँ हैं, यह तेजकी कैसी शक्ति है? हम सभी लोग आपका दर्शन करना चाहते हैं। उनकी प्रार्थनासे प्रसन्न हो भगवान् सूर्यनारायण अपने विराट रूपमें प्रकट हो गये।
उस महनीय तेज:स्वरूप भगवान् भास्करकी देवगण पृथक्-पृथक् वन्दना करने लगे।
ब्रह्माजीकी स्तुतिका भाव इस प्रकार है- हे देवदेवेश! आप सहनों किरणोंसे प्रकाशमान हैं। कोणवल्लभ! आप संसारके लिये दीपक हैं, आपको नमस्कार है। अन्तरिक्षमें स्थित होकर सम्पूर्ण विश्वको प्रकाशित करनेवाले भगवान् भास्कर, विष्णु, कालचक्र, अमित तेजस्वी, सोम, काल, इन्द्र, वसु, अग्नि, खग, लोकनाथ तथा एकचक्रवाले रथसे युक्त-ऐसे नामोंवाले आपको नमस्कार है। आप अमित तेजस्वी एवं संसारके कल्याण तथा मङ्गलकारक हैं, आपका सुन्दर रूप अन्धकारको नष्ट करनेवाला है, आप तेजकी निधि है, आपको नमस्कार है। आप इमर्मादि चतुर्वर्गस्वरूप हैं तथा अमित तेजस्वी हैं, क्रोध- लोभसे रहित हैं, संसारकी स्थिति में कारण हैं, आप शुभ एवं मङ्गलस्वरूप हैं तथा शुभ एवं मङ्गलके प्रदाता हैं, आप परम शान्तस्वरूप हैं तथा ब्राह्मण एवं ब्रह्मरूप हैं, ऐसे हे परब्रह्म परमात्मा जगत्पते। आप मेरे ऊपर प्रसन्न होइये, आपको नमस्कार है।
ब्रह्माजीके बाद शिवजीने महातेजस्वी सूर्यनारायणको प्रणामकर उनकी स्तुति की-
विश्वकी स्थितिके कारण-स्वरूप भगवान् सूर्यदेव । आपकी जय हो। अजेय, हंस, दिवाकर, महाबाहु, भूधर, गोचर, भाव, खग, लोकप्रदीप, जगत्पति, भानु, काल, अनन्त, संवत्सरं तथा शुभानन ! आपकी जय हो। कश्यपके आनन्दवर्धन, अदितिपुत्र, सप्ताश्ववाहन, सप्तेश, अन्धकारको दूर करनेवाले, ग्रहों के स्वामी, कान्तीश, कालेश, शंकर, धर्मादि चतुर्वर्गके स्वामी! आपकी जय हो। वेदाङ्गरूप, ग्रहरूप, सत्यरूप, सुरूप, क्रोधादिके विनाशक, कल्माषपक्षिरूप तथा यतिरूप ! आपकी जय हो। प्रभो! आप विश्वरूप, विश्वकर्मा, ओंकार, वषट्कार, स्वाहाकार तथा स्वधारूप हैं और आप ही अश्वमेधरूप, अग्नि एवं अर्यमारूप हैं, संसाररूपी सागरसे मोक्ष दिलानेवाले हे जगत्पते । मैं संसार-सागरमें डूब रहा हूँ, मुझे अपने हाथका अवलम्बन दीजिये, आपकी जय हो।
१-नमस्ते देवदेवेश सहस्रकिरणोज्वल ।
लोकदीप नमस्तेऽस्तु नमस्ते कोणवल्लभ ।
भास्कराय नमो नित्यं खखोल्काय नमो नमः ।
विष्णवे कासचक्राय सोमायामिततेजसे ॥
नमस्ते पसकालाय इन्द्राय वसुरेतसे ।
खगाय लोकनाधाय एकचक्ररथाय च॥
जगद्धिताय देवाय शिवायामिततेजसे ।
तमोघ्राय सुरूपाय तेजसा निधये नमः॥
अर्धाय कामरूपाय धर्मायामिततेबसे ।
मोक्षाय मोक्षरूपाय सूर्याय च नमो नमः॥
क्रोधलोभविहीनाय लोकानां स्थितिहेतये ।
शुभाय शुभरूपाय शुभदाय शुभात्मने।
शान्ताय शान्तरूपाय शान्तयेऽस्मासु यै नमः ।
नमस्ते ब्रह्मरूपाय ब्राह्मणाय नमो नमः॥
ब्रह्मदेवाय अह्मरूपाय ब्रह्मणे परमात्मने ।
ब्रह्मणे च प्रसाद वै कुरु देव जगत्पते ॥
(ब्राह्मपर्व १५३/५०-५७)
२-जय भाव जयाजेय जय हंस दिवाकर ।
जय शम्भो महाबाहो खग गोचर भूधर ॥
जय लोकप्रदीपाय जय भानो जगत्पते ।
जय कालजयानन्त संवत्सर शुभानन॥
जय देवादितेः पुत्र कश्यपानन्दवर्धन ।
तमोप्न सोश जय सम्ववाहन।।
ग्रहेश जय कान्तोश जय कालेश शङ्कर ।
अर्थकामेश धर्मेश जय मोक्षेश शर्मद॥
जय बेदाङ्गरूपाय ग्रहरूपाय वै नमः ।
सत्याय सत्यरूपाय सुरूपाय शुभाय च ॥
क्रोधलोभविनाशाय कामनाशाय वै जय ।
कल्माषपक्षिरूपाय यतिरूपाय शम्भवे ॥
विश्वाय विश्वरूपाय विश्वकर्माय वै जय ।
जोंकार वषट्कार स्वाहाकार स्वधामय ॥
जयाचमेधरूपाय चाग्निरूपार्यमाय च ।
संसारार्णवपीतायः मोक्षद्वारपदाप च॥
संसारार्णवमग्नस्य मम देव जगत्पते ।
हस्तावलम्बनो देव भय त्वं गोपतेऽद्भुत ॥
(ग्रामपर्व १५३।६०-६८)
भक्तिपूर्वक प्रणाम कर उनकी स्तुति की, भाव इस प्रकार है-
भूतभावन देवदेवेश। आप दिवाकर, रवि, भानु, मार्तण्ड, भास्कर, भग, इन्द्र, विष्णु, हरि, हंस, अर्क-इन रूपोंमें प्रसिद्ध है, आपको नमस्कार है। लोकगुरो! आप विभु, त्रिनेत्रधारी, त्र्यक्षरात्मक, त्र्यङ्गात्मक, त्रिमूर्ति, त्रिगति हैं, आप छ: मुख, चौबीस पाद तथा बारह हाथवाले हैं, आप समस्त लोकों तथा प्राणियोंके अधिपति हैं, देवताओं तथा वर्गों के भी आप ही अधिपति हैं, आपको नमस्कार है। जगत्स्वामिन् ! आप ही ब्रह्मा, रुद्र, प्रजापति, सोम, आदित्य, ओंकार, बृहस्पति, बुध, शुक्र, अग्नि, भग, वरुण, कश्यपात्मज हैं। आपसे ही यह सम्पूर्ण चराचर जगत् व्याप्त है, देवता, असुर तथा मानव आदि सभी आपसे ही तत्पन्न हैं, अनघ ! कल्पके आरम्भमें संसारकी उत्पत्ति, पालन एवं संहारके लिये ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव उत्पन्न हुए हैं, आपको नमस्कार है। प्रभो! आप हौ वेदरूप, दिवसस्वरूप, यज्ञ एवं ज्ञानरूप हैं। किरणोज्वल! शूतेश! गोपते ! संसारमें निमग्न हुए हमपर आप प्रसन्न होइये, आप वेदान्त एवं यज्ञ-कलात्मक रूप हैं, आपकी जय हो, आपको नित्य नमस्कार है । ब्रह्मादि देवताओंको स्तुतिसे भगवान् सूर्य बहुत ही प्रसन्न हुए और उन्होंने ब्रह्मा, विष्णु
तथा महादेवको अपनी अखण्ड भक्ति तथा अपना अनुग्रह प्राप्त करनेका वर प्रदान करते हुए कहा- हे विष्णो! आप देव, दानव, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व आदि सभीपर विजय प्राप्त कर अजेय रहेंगे। सम्पूर्ण संसारका पालन करते हुए आपकी मेरे ऊपर अचल भक्ति बनी रहेगी। ब्रह्मा भी इस जगत् की सृष्टि करने में समर्थ होंगे और मेरे प्रसादसे शंकर भी इस संसारका संहार कर सकेंगे, इसमें कोई संदेह नहीं है। मेरी पूजाके फलस्वरूप आपलोग ज्ञानियोंमें उत्कृष्ट स्थान प्राप्त कर लेंगे।
भगवान् सूर्यके इन वचनोंको सुनकर महादेवजी बोले-भगवन् ! हमलोग आपकी आराधना किस प्रकार करें, उसे आप बतायें। हमें आपकी परम पूजनीय मूर्ति तो दिखायी नहीं दे रही है, केवल प्रकाशको आकृति और मात्र तेज ही दिखायी पड़ रहा है, यह तेज आकारविहीन होने के कारण हृदय में स्थान नहीं पा रहा है। जबतक मन किसी विषय-वस्तुमें नहीं लगता, तबतक किसी भी व्यक्तिकी भक्ति या इच्छा उस विषय वस्तुको प्राप्त करनेकी नहीं होती। जबतक भक्ति उत्पन्न नहीं होगी, तबतक पूजन आदि करने में कोई भी समर्थ नहीं होगा। इसलिये आप साकाररूपमें प्रकट हों, जिससे कि हमलोग उससाकाररूपका पूजन-अर्चन कर सिद्धिको प्राप्त करने में समर्थ हो जायें।
*नमामि देवदेवेशं भूतभावनमव्ययम् ।
दिवाकर रवि भानुं मार्तण्डं भास्करं भगम् ॥
इन्द्रं विष्णुं हरि हंसमकं लोकगुरुं विभुम् ।
त्रिनेत्रं यक्षरं व्यङ्गं त्रिमूर्षि प्रिगति शुभम् ।।
पण्मुखाय नमो नित्यं त्रिनेत्राय नमो नमः ।
चतुर्विशतिपादाय नमो द्वादशपाणये॥
नमस्ते भूतपतये लोकानां पतये नमः ।
देवानां पतये नित्यं वर्णानां पतये नमः॥
त्वं ब्रह्मा त्वं जगन्नाथो रुद्रस्त्वं च प्रजापतिः ।
त्वं सोमस्त्वं तधादित्यस्रथमोकारक एव हि ॥
बृहस्पतिर्युधस्त्वं हि त्वं शुक्रस्त्वं विभावसुः ।
यमरत्वं वरुणरत्वं हि नमस्तं कश्पपात्मज ॥
त्वया ततमिदं सर्व जगरस्थावरजङ्गमम् ।
त्वत्त एय समुत्पत्रं सदेवासुरमानुपम् ।।
ब्रह्मा चाहं च रुद्रः समुत्पन्नो जगत्पते ।
कल्यादौ तु पुरा देव स्थितये जगतोऽनघ ।
नमस्तै वेदरूपाय अहोरूपाय वै नमः ।
नमस्ते ज्ञानरूपाय यज्ञाय च नमो नमः॥
प्रसीदास्मासु देवेश भूतेश किरणोचल।
संसारार्णवमानानां प्रसाद कुरु गोपते ।
वेदान्ताय नमो नित्यं नमो यज्ञकलाय च ॥
(ब्राह्मपर्व १५३/७१)
भगवान् सूर्यने कहा-महादेवजी। आपने बड़ी अच्छी बात पूछी है-आप दत्तचित्त होकर सुनें। इस जगत्में मेरी चार प्रकारकी मूर्तियाँ हैं जो सम्पूर्ण संसारको व्यवस्थित करती हुई सृजन, पालन, पोषण तथा संहार आदिमें प्रत्येक समय संलग्न रहती हैं। मेरी प्रथम मूर्ति राजसी मूर्ति है, जो ब्राह्मी शक्तिके नामसे प्रसिद्ध है, वह कल्पके आदिमें संसारकी सृष्टि करती है। द्वितीय सात्त्विकी मूर्ति विष्णुस्वरूपिणी है, जो संसारका पालन और दुष्टोंका विनाश करती है। तृतीय मूर्ति तामसी है, जो भगवान् शंकरके नामसे विख्यात है, वह हाथमें त्रिशूल धारण किये कल्पके अन्तमें विश्व-सृष्टिका संहार करती है। मेरी चतुर्थ मूर्ति सत्त्वादि गुणोंसे अतीत तथा उत्तम है, वह स्थित रहते हुए भी दिखायी नहीं पड़ती। उस अदृश्य शक्तिके द्वारा यह समस्त संसार विस्तारको प्राप्त हुआ है। औंकार हो मेरा स्वरूप है। यह सकल तथा निष्कल और साकार एवं निराकार दोनों रूपोंमें है। यह सम्पूर्ण संसारमें व्याप्त रहते हुए भी सांसारिक कर्म-फलोंसे लिप्त नहीं रहती, जलमें पापनकी भाँति अलिप्त रहती है। यह प्रकाश आपलोगोंके अज्ञानको दूर करने तथा संसारमें प्रकाश करनेके लिये उत्पन्न हुआ है। आपलोग मेरे इस अस्पष्ट (निलिस) रूपकी आराधना करें।
कल्पके अन्तमें मेरे आकाशरूपमें सभी देवताओंका लय हो जाता है। उस समय केवल आकाशरूप ही रहता है। पुनः मुझसे ही ब्रहादि देवगण तथा चराचर उत्पन्न होते हैं। हे त्रिलोचन। मैं सम्पूर्ण जगत्में व्याश हूँ। इसलिये मेरे व्योमरूपकी आराधना आपसहित ब्रह्मा, विष्णु भी करें। त्रिलोचन! आप गन्धमादनपर दिव्य सहन वर्षांतक तपस्या करके परम शुभ षडा-सिद्धिको प्रास करें। जनार्दन। आप मेरे व्योमरूप को श्रद्धा और भक्तिपूर्वक आराधना कलापग्राममें निवास कर करें। जगत्पति ब्रह्मा भी अन्तरिक्षमें जाकर लोकपावन पुष्करतीर्थमें मेरी आराधना करें। इस प्रकार आराधना करनेके पश्चात् कदम्बके समान गोलाकार, रश्मिमालासे युक्त मेरो मूर्तिका आपलोग दर्शन करेंगे।
इस प्रकार सूर्यनारायणके वचनको सुनकर भगवान् विष्णुने उन्हें प्रणाम कर कहा-देव! हम सभी लोग उत्तम सिद्धि प्राप्त करनेके लिये आपके परम तेजस्वी व्योमरूपका पूजन-अर्चन कर किस विधिसे आराधना करें। परमपूजित ! कृपया आप उस विधिको बतलाकर मुझसहित ब्रह्मा और शिवपर दया कीजिये, जिससे हमलोगोंको परम सिद्धि प्राप्त होने में कोई विघ्न-बाधा न पहुँच सके।
भगवान् सूर्य बोले- देवताओंमें श्रेष्ठ वासुदेव ! आप शान्तचित्त होकर सुनिये । आपका प्रश्न उचित ही है। मेरे अनुपम व्योमरूपको आपलोग आराधना करें। मेरी पूजा मध्याह्नकालमें भक्तिपूर्वक सदैव करनेसे इच्छित भक्तिकी प्राप्ति हो जाती है। भगवान् सूर्यक इस वाक्यको सुनकर ब्रह्मादि देवताओंने प्रणामकर कहा-'देव। आप धन्य हैं, हमलोगोंको आपने अपने तेजसे प्रकाशित किया है, हमलोग कृतकृत्य हो गये। आपके दर्शनमात्रसे ही सभी लोगोंको ज्ञान प्राप्त हुआ है तथा तम, मोह, तन्द्रा आदि सभी क्षणमात्रमें ही दूर हो गये हैं। हमलोग
१-अन्य पुराणों तथा सांख्य, वेदान्त आदि दर्शनों के अनुसार आकाशका मनस्तत्त्वमें, मनका अहंतन्यमें और अहंध महत्त्याये महत्तत्वका अव्यक तत्त्वमें और अव्यक्तका सत् तत्त्वमें लय होता है, जो संकल्प विकल्पमें शून्य होता है और पुन: पृष्टिक समय सत्- उत्त्वमें कल्याके रथ अव्यक्त, महत, मन, अहंकारके बाद आकाकी उत्पत्ति होती है।
२-योगवासिटमें सबको व्योमके ही अन्तर्गत स्थित मानकर हद्-व्योम उपासना (दहर-उपासना) का निर्देश है और ब्रह्मसूत्रके 'आकाशस्तल्लिङ्गाह' इस सूत्रमें आकाश शब्दका अर्थ परमात्मा माना गया है।
आपके ही तेजके प्रभावसे उत्पत्ति, पालन और संहार करते हैं। अब आप व्योमके पूजन-विधिको बतानेकी कृपा करें।'
भगवान् आदित्यने कहा-आपलोग सत्य ही कह रहे हैं, जो मैं हूँ वही आपलोग भी हैं अर्थात् आपलोगोंके स्वरूपमें मैं ही स्थित हूँ। अहंकारी, विमूढ, असत्य, कलहसे युक्त लोगों के कल्याणके लिये तथा आपलोगोंके अन्धकार अर्थात् तम-मोहादिकी निवृत्तिके लिये मैंने तेजोमय स्वरूप प्रकट किया, इसलिये अहंकार, मान, दर्प आदिका परित्याग कर श्रद्धा-भक्तिपूर्वक निरन्तर आपलोग मेरी आराधना करें। इससे मेरे सकल-निष्कल उत्तम स्वरूपका दर्शन प्राप्त होगा और मेरे दर्शनसे सभी सिद्धियाँ प्राप्त हो जायेंगी। इतना कहकर सहस्रकिरण भगवान् सूर्य देवताओंके देखते-देखते अन्तर्धान हो गये। भगवान् भास्करके तेजस्वी रूपका दर्शन कर ब्रह्मा, विष्णु और शिव सभी आश्चर्यचकित होकर परस्पर कहने लगे-'ये तो अदिति-पुत्र सूर्यनारायण हैं। ये महातेजस्वी लोकोंको प्रकाशित करनेवाले सूर्यनारायण हैं, इन्होंने हम सभी लोगोंको महान् अन्धकाररूपी तमसे-निवृत्त किया है। हम अपने-अपने स्थानपर चलकर इनकी पूजा करें, जिससे इनके प्रसादसे हमें सिद्धि प्राप्त हो सके।
उस व्योमरूपकी श्रद्धा-भक्तिपूर्वक पूजन करनेके लिये ब्रह्माजी पुष्करक्षेत्रमें, भगवान् विष्णु शालग्राममें और वृषध्वज शंकर गन्धमादन पर्वतपर चले गये। वहाँ मान, दर्प तथा अहंकारका परित्याग कर ब्रह्माजी चार कोणसे युक्त व्योमको, भगवान् विष्णु चक्र में अङ्कित व्योमकी और शिव अग्निरूपी तेजसे अभिभूत व्योमवृत्तकी सदा भक्तिपूर्वक पूजा करने लगे। ब्रह्मादि देवता गमा, माला नृत्य, गीत आदिरी दिव्य सहल वर्षातक सूर्यनारायणको पूजा कर उनकी अचल भक्ति और प्रसवता-
प्राप्तिके लिये उत्तम तपस्यामें तत्पर हो गये।
सुमन्तु मुनि बोले-महाराज! देवताओंके पूजनसे प्रसन्न हो वे एक रूपसे ब्रह्माके पास, एक रूपसे शंकरके पास तथा एक रूपसे विष्णुके पास गये एवं अपने चतुर्थ रूपसे रथारूढ हो आकाशमें स्थित रहे । भगवान् सूर्यने अपने योगबलसे पृथक्-पृथक् उन्हें दर्शन दिया। दिव्य रथपर आरूढ सूर्यदेवने अपने अद्भुत योगबलसे देखा कि चतुर्मुख ब्रह्माजी कमलमुख-व्योमकी पूजामें अत्यन्त श्रद्धा- भक्तिसे नतमस्तक हैं। यह देखकर ब्रह्माजीसे भगवान् सूर्यदेवने कहा-'सुर श्रेष्ठ ! देखो, मैं वर देनेके लिये उपस्थित हूँ।' यह सुनकर ब्रह्माजी हर्षसे प्रफुल्लित हो उठे और हाथ जोड़कर उनके कमलमुखको देखकर अति विनम्रभावसे प्रणाम कर प्रार्थना करने लगे-
'देवेश। आप प्रसन्न हैं तो मेरे ऊपर कृपा कीजिये। देव ! आपके अतिरिक्त मेरे लिये अन्य कोई गति नहीं है।'
भगवान् सूर्य बोले-जैसा आप कह रहे हैं, उसमें विचार करनेकी कोई बात नहीं है। आप कारणरूपसे मेरे प्रथम पुत्रके रूपमें उत्पन्न हों। अब आप वर माँगिये, मैं वर देनेके लिये ही आया हूँ।
ब्रह्माजीने कहा- भगवन् ! यदि आप मेरे ऊपर प्रसन्न हैं तो मुझे उत्तम वर दें, जिससे मैं सृष्टि कर सकूँ।
भगवान् आदित्यने कहा-जगत्पति चतुर्मुख ब्रह्मन्! आपको मेरे प्रसादसे सिद्धि प्राप्त हो जायगी और आप इस जगत्के सृष्टिकर्ता होंगे। ब्रह्माजीने कहा-जगन्नाथ। मेरा निवास किस स्थानपर होगा।
भगवान सूर्य बोले-जिस स्थानपर मेरा महद् व्योम-पृष्ठ शृंगसे युक्त उत्तम रूप रहेगा, वहीं
कदम्ब-रूपमें आप नित्य स्थित रहेंगे। पूर्व दिशामें इन्द्र, अग्निकोणमें शाण्डिलीसुत अग्नि, दक्षिण में यम, नैर्ऋत्यकोणमें निति, पश्चिममें वरुण और वायव्यकोणमें वायु तथा उत्तर दिशामें कुबेरका निवास रहेगा। ईशानकोणमें शंकर और आपका तथा मध्यमें विष्णुका निवास रहेगा।
ब्रह्माजीने कहा-देव! आज मैं कृतकृत्य हो गया, कुछ भी मुझे चाहिये, वह सब प्राप्त हो गया।
सुमन्तु मुनि बोले-राजन् ! इस प्रकार भगवान् आदित्य ब्रह्माजीको वर प्रदानकर उनके साथ गन्धमादन पर्वतपर गये, वहाँ उन्होंने देखा-भूत-भावन शिव तीव्र तपस्यामें संलग्न हैं। वे तेजसे युक्त व्योमका पूजन कर रहे हैं। इस प्रकार शिवद्वारा पूजन-अर्चनको देखकर भगवान् भास्कर प्रसन्न हो गये।
सूर्यभगवान्ने कहा- भीम ! मैं तुमसे अति प्रसन्न हूँ। वत्स! वर माँगो ! मैं वर देनेके लिये उपस्थित हूँ। इसपर महादेवजीने साष्टाङ्ग प्रणाम कर स्तुति की और कहा–'देव! आप मुझपर कृपा करें। आप जगत्पति हैं। संसारका उद्धार करनेवाले हैं। मैं आपके अंशसे आपके पुत्रके रूपमें उत्पन्न हुआ हूँ, आप वही करें जो एक पिता अपने पुत्रके लिये करता है। यह वचन सुनकर भगवान् सूर्य बोले 'शंकर ! जो तुम कह रहे हो, उसमें कोई भी संदेह नहीं है। मेरे ललाटसे तुम पुत्र रूपमें उत्पन्न हुए हो। जो तुम्हारे मनमें हो वह वर माँगो।'
महादेवजीने कहा- भगवन् ! यदि आप मेरे ऊपर संतुष्ट हैं तो मुझे अपनी अचल भक्ति प्रदान करें, जिससे यक्ष, गन्धर्व, देव, दानव आदिपर मैं विजय प्राप्त कर सकूँ और युगके अन्तमें प्रजाका संहार कर सकूँ। देव। मुझे उत्तम स्थान
प्रदान करें। भगवान् सूर्यने 'ऐसा ही होगा' कहकर कहा कि इसी प्रकार तुम मेरे परम व्योमरूपकी पूजा प्रतिदिन करते रहो और यही परम तेजस्वी व्योम तुम्हारा शस्त्र-त्रिशूल होगा।
सुमन्तु मुनि बोले-महाराज ! तदनन्तर भगवान् सूर्य भगवान् विष्णुको वर देने शालग्राम (मुक्तिनाथ- क्षेत्र) गये। वहाँ उन्होंने देखा कि वे कृष्णाजिन धारणकर शान्तचित्त हो परम उत्कृष्ट तप कर रहे हैं और हृदयमें भगवान् सूर्यका ध्यान कर रहे हैं. भगवान् भास्करने अति प्रसन्न होकर कहा- 'विष्णो! मैं आ गया हूँ, मुझे देखो।' भगवान् विष्णुने उन्हें सिर झुकाकर प्रणाम किया और कहा-'जगत्राथ! आप मेरी रक्षा करें। मेरे ऊपर दया करें। मैं आपका द्वितीय पुत्र हूँ। पिता अपने पुत्रपर जैसी कृपादृष्टि रखता है, उसी प्रकार आप भी मेरे ऊपर दया-दृष्टि बनाये रखें।'
भगवान् सूर्य बोले- महाबाहो! मैं तुम्हारी श्रद्धा-भक्तिसे संतुष्ट हो गया हूँ। जो कुछ भी इच्छा हो, माँग लो। मैं वर प्रदान करनेके लिये ही आया हूँ।
विष्णुभगवान्ने कहा- भगवन्! मैं आज कृतकृत्य हो गया। मेरे समान कोई भी धन्य नहीं है, क्योंकि आप संतुष्ट होकर मुझे स्वयं वर देने आ गये। आप अपनी अचल भक्ति और शत्रुको पराजित करनेकी शक्ति मुझे प्रदान करें तथा जैसे मैं संसारका पालन कर सकूँ ऐसा वर प्रदान करें। मुझे इस प्रकारका स्थान दें जिससे कि मैं सभी लोकोंमें यशस्वी, बल, वीर्य, यश और सुखसे सम्पन्न हो सकूँ।
भगवान सूर्य बोले-'तथास्तु' महाबाहो। तुम ब्रह्माके छोटे और शिवके बड़े भाता हो, तुम्हें सभी देवता नमस्कार करेंगे। तुम मेरे परम भक्त और परम प्रिय हो, इसलिये तुम्हारी मुझमें अचल
भक्ति रहेगी। जिस व्योमरूपका तुमने अर्चन किया है, यह व्योम ही तुम्हारे लिये चक्ररूपमें अस्त्र- शस्त्रका कार्य करेगा। यह सभी आयुोंमें उत्तम एवं दुष्टोंका विनाशक है। समस्त लोक इसे नमस्कार करते हैं।
सुमन्तु मुनि बोले-राजन् ! इस प्रकार भगवान् भास्कर भगवान् विष्णुको वर प्रदानकर अपने लोकको चले गये और ब्रह्मा, विष्णु तथा शंकरने भगवान् सूर्यनारायणकी पूजा कर सृष्टि, पालन और संहार करनेकी शक्ति प्रास की। यह आख्यान अति पवित्र, पुण्य और सभी प्रकारके पापोका नाशक है। यह तीन देवोंका उपाख्यान है और तीन देवता इस लोकमें पूजित हैं। यह तीन स्तोत्रोंसे युक्त तथा धर्म, अर्थ और कामका साधन है। यह धर्म, स्वर्ग, आरोग्य, धन-धान्यको प्रदान करनेवाला है। जो व्यक्ति इस आख्यानको प्रतिदिन सुनता है अथवा जो इन तीन स्तोत्रोंका पाठ करता है, वह आग्नेय विमानपर आरूढ होकर भगवान् सूर्यके परमपदको प्राप्त कर लेता है। पुत्रहीन पुत्र, निर्धन धन, विद्यार्थी विद्या प्राप्तकर तेजमें सूर्यके समान, प्रभामें उनके किरणोंके समान हो जाता है और अनन्तकालतक सुख भोगकर ज्ञानियों में उत्तम स्थानको प्राप्त करता है। (अध्याय १५२-१५६)