भगवान् श्रीकृष्ण बोले-महाराज! अब आप उल्का-नवमी-व्रतके विषयमें सुनें। आश्विन मासके शुक्ल पक्षकी नवमीको नदी में स्नानकर पितृदेवीकी विधिपूर्वक अर्चना करे। अनन्तर गन्ध, पुष्प, धूप, नैवेद्य आदिसे भैरव-प्रिया चामुण्डादेवीकी पूजा करे, तदनन्तर इस मन्त्रसे हाथ जोड़कर स्तुति करे-
महिषनि महामाये चामुण्डे मुण्डमालिनि।
द्रव्यमारोग्यविजयौ देहि देवि नमोऽस्तु ते॥
(उत्तरपर्व ६२ । ५)
इसके बाद यथाशक्ति सात, पाँच या एक कुमारीको भोजन कराकर उन्हें नीला कझुक, आभूषण, वस्त्र एवं दक्षिणा आदि देकर संतुष्ट करे। श्रद्धासे भगवती प्रसन्न होती है। अनन्तर भूमिका अभ्युक्षण करे । तदनन्तर गोबरका चौका लगाकर आसनपर बैठ जाय । सामने पात्र रखकर, जो भी भोजन बना हो सारा परोस ले, फिर एक मुट्ठी तृण और सूखे पत्तोंको अग्रिसे प्रज्वलित कर जितने समयतक प्रकाश रहे उतने समयमें ही भोजन सम्पन्न कर ले। अग्निके शान्त होते ही भोजन करना बंद कर आचमन करे । चामुण्डाका हृदयमें ध्यानकर प्रसन्नतापूर्वक घरका कार्य करे। इस प्रकार प्रतिमास व्रतकर वर्षके समाप्त होनेपर कुमारी-पूजा करे तथा उन्हें वस्त्र, आभूषण, भोजन आदि देकर उनसे क्षमा-याचना करे। ब्राह्मणको सुवर्ण एवं गौका दान करे। हे पार्थ । इस प्रकार जो पुरुष उल्का-नवमीका व्रत करता है, उसे शत्रु, अग्नि, राजा, चोर, भूत, प्रेत, पिशाच आदिका भय नहीं होता एवं युद्ध आदिमें उसपर शस्त्रोंका प्रहार नहीं लगता, देवी चामुण्डा उसकी सर्वत्र रक्षा करती हैं। इस उत्का-नवमी-व्रतको करनेवाले पुरुष और स्त्री उल्काकी तरह तेजस्वी हो जाते हैं। (अध्याय ६२)