भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं-राजन्! अब मैं गोलोक प्रास करानेवाले अत्युत्तम रत्नधेनुदानको विधि बता रहा हूँ। किसी पुण्य दिनमें भूमिको पवित्र गोबरसे लीपकर उसमें धेनुको कल्पना करे। पृथ्वीपर कृधामृगचर्म बिछाकर उसपर एक द्रोण लवण रखकर उसके ऊपर विधिपूर्वक संकल्पसहित रत्नमयी धेनु स्थापित करे। बुद्धिमान् पुरुष उसके मुख में इवयासी पद्मरागमणि तथा चरणों में पुष्पराग स्थापित करे। उस गौके ललाटपर सोनेका तिलूक, उसकी दोनों आँखोंमें सौ गोती, दोनों भौहोंपर सौ मूंगा और दोनों कानों की जगह दो सीपे लगाये। उसके सींग सोनेके होने चाहिये।
'नेत्रयोः सूर्यशशिनौ रिवायां तु सरस्वती ।
दन्तेषु मरुतो देवाः कर्णयोश्च तथामिनी ।
मुजागी सदा चास्या देवी रुद्रपितामहाँ ।
गन्धर्वाप्सरसव ककुद्देश प्रतिष्ठिताः।
कुक्षौ समुद्राशत्वारो योनी त्रिपथगामिनी ॥
स्पयो रोमकूपेषु अपाने वसुधा स्थिता ।
अन्वेषु नागा विडेयाः पर्वताथास्थिषु स्थिताः।
धर्मकामार्थमोक्षास्तु पादेषु परिसंस्थिताः ।
हुंकारे च चतुर्वेदाः कण्ठे रुद्राः प्रतिष्ठिताः ।
पृष्टभागे स्थितो मेरुर्विष्णुः सर्वशरीरणः ।
एवं सर्वमयी देवी पावनी विश्वरूपिणी ॥
(उत्तरपर्य १५६।१६-२०)
सिरकी जगह सौ हीरोंको स्थापित करना चाहिये। कण्ठ और नेत्र-पलकोंमें सौ गोमेदक, पृष्ठभागमें सौ इन्द्रनील (नीलम), दोनों पार्श्वस्थानोंमें सौ वैदूर्य (बिल्लौर), उदरपर स्फटिक तथा कटिदेशपर सौ सौगन्धिक (माणिक-लाल) मणि रखना चाहिये। खुरोंको स्वर्णमय, पूँछको मुक्ता (मोतियों)- की लड़ियोंसे युक्तकर तथा दोनों नाकोंकी सूर्यकान्त एवं चन्द्रकान्त मणियोंसे रचनातर कर्पूर और चन्दनसे चर्चित करें। रोमोंको केसर और नाभिको चाँदीसे बनवाये। गुदामें सौ लाल मणियोंको लगाना चाहिये। अन्य रनोंको संधिभागोंपर लगाना चाहिये। जीभको शक्करसे, गोबरको गुड़से और गोमूत्रको घीसे बनाना चाहिये। दही-दूध प्रत्यक्ष ही रखे। पूँछके अग्रभागपर चमर तथा स्तनोंके पास ताँबेको दोहनी रखनी चाहिये।
इसी प्रकार गौके चतुर्थांशसे बछड़ा बनाना चाहिये। इसके बाद धेनुको आमन्त्रित करे। उस समय गुड़धेनुकी तरह आवाहन कर यह कहना चाहिये-'देवि! चूँकि रुद्र, इन्द्र, चन्द्रमा, ब्रह्मा, तथा विष्णु-ये सभी तुम्हें देवताओंका निवासस्थान मानते हैं तथा समस्त त्रिभुवन तुम्हारे ही शरीरमें व्याप्त है, अतः तुम भवसागरसे पीड़ित मेरा शीघ्र ही उद्धार करो।' इस प्रकार आमन्त्रित करनेके बाद गौकी पूजा तथा परिक्रमा कर भक्तिपूर्वक साष्टाङ्ग प्रणाम करके उस रत्नधेनुका दान ब्राह्मणको दक्षिणाके साथ करे, अन्तमें क्षमा-प्रार्थना करे। इस प्रकार सम्पूर्ण विधियोंको जाननेवाला जो पुरुष इस रत्नधेनुका दान करता है, वह शिवलोक (कैलास या सुमेरुस्थित दिव्य शिवधाम)-को प्राप्त करता है तथा पुनः बहुत समयके बाद इस पृथ्वीपर चक्रवर्ती राजा होता है और उसको सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। ( अध्याय १५७)