भविष्य पुराण

प्रतिष्ठा-मुहूर्त एवं जलाश आदिकी प्रतिष्ठा-विधि

सूतजी कहते हैं - ब्राह्मणो! ऋषियोंने देवता आदिकी प्रतिमा में माघ, फाल्गुन आदि छः मास नियत किये हैं। जबतक भगवान् विष्णु शयन नहीं करते, तबतक प्रतिष्ठा आदि कार्य करने चाहिये। शुक्र, गुरु, बुध तथा सोम ये चार वार शुभ हैं। जिस लग्नमें शुभ ग्रह स्थित हों एवं शुभ ग्रहोंको दृष्टि पड़ती हो, उस लग्नमें प्रतिष्ठा करनी चाहिये। तिथियों में द्वितीया, तृतीया, पञ्चमी, सप्तमी, दशमी, त्रयोदशी तथा पूर्णिमा तिथियाँ उत्तम हैं। प्राण-प्रतिष्ठा एवं जलाशय आदि कार्य प्रशस्त शुभ मुहूर्तमें ही करने चाहिये। देवप्रतिष्ठा और बड़े यागोंमें सोलह हाथका एवं चार द्वारोंसे युक्त मण्डपका निर्माण करके उसके दिशा-विदिशाओंमें शुभ्र ध्वजाएँ फहरानी चाहिये। पाकड़, गूलर, पीपल तथा बरगदके तोरण चारों द्वारोंपर पूर्वादि क्रममें बनाये। मण्डपको मालाओं आदिरो अलेकृत करे। दिवपालोको पताकाएँ उनके वर्षों के अनुसार बनवानी चाहिये। मध्यमें नीलवर्णकी पताका लगानी चाहिये। ध्वज-दण्ड यदि दस हाथका हो तो पताका पाँच हाथकी बनवानी चाहिये। मण्डपके द्वारोंपर कदली स्तम्भ रखना चाहिये तथा मण्डपको सुसज्जित करना चाहिये। मण्डपके मध्यमें एवं कोणोंमें वेदियोंकी रचना करनी चाहिये । योनि और मेखलामण्डित कुण्डका तथा वेदीपर सर्वतोभद्र-चक्रका निर्माण करना चाहिये। कुण्डके ईशान-भागमें कलशकी स्थापना कर उसे भाला आदिसे अलंकृत करना चाहिये।

यजमान पश्चदेव एवं यज्ञेश्वर नारायणको नमस्कार कर प्रतिष्ठा आदि क्रियाका संकल्प करके ब्राहाणोंसे इस प्रकार अनुज्ञा प्राप्त करे -'मैं इस पुण्य देशमें शास्त्रोक-विधिसे जलाशय आदिकी प्रतिष्ठा करूंगा। आप सभी मुझे इसके लिये आज्ञा प्रदान करें।' ऐसा कहकर मातृ श्राद्ध एवं बुद्धि-बाद्ध सम्मान

१-गङ्गा धादित्यचन्द्र च धीमी रानिवासरौ ॥

सूर्यः सोमो यमः कालो महाभूतानि पञ्च च । एते शुभाशुभस्येह कर्मणो नव साक्षिणः ॥

(मध्यमपर्व २६ १८।४३-१४)

धर्म: शुभदाः सिताम्बधरः कार्योध्यदिशे वृषो हस्ताभ्यागाभयं वरं र सातं रूपं परं यो दधत् ।

सर्वप्राणिसुखावहः कृतधियां मोक्षकहेतुः सदा सोऽयं पातु जगन्ति चैव रस्ततं भूयात् हस्तां भूतये ॥ (मध्यमपर्व २॥ १८ ॥ ४६)

करे। भेरी आदिके मङ्गलमय वाघोंक साथ षोडशाक्षर 'हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।' आदि मन्त्र लिखे एवं इन्द्रादि दिक्पाल देवताओं तथा उनके आयुधों आदिका भी यथास्थान चित्रण करे। फिर आचार्य और ब्रह्माका वरण करे। वरणके अनन्तर आचार्य तथा ब्रह्मा यजमानसे प्रसन्न हो उसके सर्वविध कल्याणकी कामना करके 'स्वस्ति ऐसा कहे। अनन्तर सपत्नीक यजमानको सौषधियोंसे आपो हि ष्ठाः' (यजु० ११।५०) इस मन्त्रद्वारा ब्रह्मा, ऋत्विक् आदि स्नान करायें। यव, गोधूम, नीवार, तिल, साँवा, शालि, प्रियंगु और व्रीहि- ये आठ सौषधि कहे गये हैं। आचार्यादिद्वारा अनुज्ञात सपत्नीक यजमान शुक्ल वस्त्र तथा चन्दन आदि धारणकर पुरोहितको आगेकर मङ्गल-घोषके साथ पुत्र-पौत्रादिसहित पश्चिमद्वारसे यज्ञ-मण्डपमें प्रवेश करे। वहाँ वेदीकी प्रदक्षिणा कर नमस्कार करे। ब्राह्मणको आज्ञाके अनुसार यजमान निश्चित आसनपर बैठे। ब्राह्मणलोग स्वस्तिवाचन करें। अनन्तर यजमान पाँच देवोंका पूजन करे। फिर सरसों आदिसे विघ्रकर्ता भूतोंका अपसर्पण कराये। यजमान अपने बैठनेके आसनका पुष्प-चन्दनसे अर्चन करे। अनन्तर भूमिका हाथसे स्पर्शकर इस प्रकार कहे-'पृथ्वीमाता! तुमने लोकोंको धारण किया है और तुम्हें विष्णुने धारण किया है। तुम मुझे धारण करो और सेरे आसनको पवित्र करो।' फिर सूर्यको अर्घ्य देकर गुरुको हाथ जोड़कर प्रणाम करे। हदपकमलमें इष्ट देवताका ध्यान कर तीन प्राणायाम करे। ईशान दिशामें कलशके ऊपर विघ्नराज गणेशजीकी गन्ध, पुष्प, वस्त्र तथा विविध नैवेद्य आदिसे 'गणानां त्वा' (यजु" २३ । १९) मन्त्रसे पूजन करे। अनन्तर आ ब्रह्मन् ' (यजुः२२ । २२) इस मन्त्रसेनहाजीको 'तद्विष्णोः' (यजु ।५) इस मन्त्रसे भगवान् विष्णुकी पूजा करे। फिर वेदीके चारों ओर सभी देवताओंको स्व-स्व स्थानपर स्थापित कर उनका पूजन करे। इसके बाद 'राजाधिराजाय प्रसा- इस मन्त्रसे भूशुद्धि कर श्वेत पद्मासनपर विराजमान, शुद्धस्फटिक तथा शङ्ख, कुन्द एवं इन्दुके समान उज्वल वर्ण, किरीट-कुण्डलधारी, श्वेत कमल, श्वेत माला और श्वेत वस्त्रसे अलंकृत, श्वेत गन्धसे अनुलिप्त, हाथमें पाश, लिये हुए, सिद्ध गन्धों तथा देवताओंसे स्तूयमान, नागलोककी शोभारूप, मकर, ग्राह, कूर्म आदि नाना जलचरोंसे आवृत, जलशायी भगवान् वरुणदेवका ध्यान करे। ध्यानके अनन्तर पञ्चाङ्गन्यास करे। अर्घस्थापन कर मूलमन्त्रका जप करे तथा उस जलसे आसन, यज्ञ सामग्री आदिका प्रोक्षण करे। फिर भगवान् सूर्यको अध्ये दे।अनन्तर ईशानकोणमें भगवान गणेश, अग्निकोणमें गुरुपादुका तथा अन्य देवताओंका यथाक्रम पूजन करे। मण्डलके मध्यमें शक्ति, सागर, अनन्त, पृथ्वी, आधारशक्ति, कूर्म, सुमेरु तथा मन्दर और पञ्चतत्वोंका साङ्गोपाङ्ग पूजन करे। पूर्व दिशामें कलशके ऊपर श्वेत अक्षत और पुष्य लेकर भगवान् वरुणदेवका आवाहन करे । वरुणको आठ मुद्रा दिखाये। गायत्रीसे स्नान कराये तथा पाद्य, अर्ध्य, पुष्पाञ्जलि आदि उपचारोंसे वरुणका पूजन करे। ग्रहों, लोकपालों, दस दिवासालों तथा पीठपर ब्रह्मा, शिव, गणेश और पृथ्वीका गन्ध, चन्दन आदिसे पूजन करे। पीठके ईशानादि कोणों में कमला, अम्बिका, विश्वकर्मा, सरस्वती तथा पूर्वादि द्वारों में उनचास गरुदणों का पूजन करे। पीठके बाहर पिशाच, राक्षस, भूत, बेताल आदिकी पूजा करे। कलशपर सूर्यादि नवाहों का आवाहन एवं ध्यानकर पाडा, अर्घ्य, गन्ध, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य नथा बलि आदिद्वारा मन्त्रपूर्वक उनको पूजा करे और उनकी पताकाएँ उन्हें निवेदित करे।

*पृथ्यित त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धूता।।

त्वं च धारय मां नित्यं पवित्रमासनं कुरु।

विधिपूर्वक सभी देवताओंका पूजन कर शतरुद्रियका पाठ करना चाहिये। हवन करनेके समय वारुणसूक्त, रात्रिसूक्त, रौद्रसूक्त, पवमानसूक्त, पुरुषसूक, शाक्तसूक्त, अग्निसूक्त, सौरसूक्त, ज्येष्ठसाम, वामदेवसाम, रथन्तरसाम तथा रक्षोघ्न आदि सूक्तोंका पाठ करना चाहिये। अपने गृह्योक्त-विधिसे कुण्डोंमें अग्नि प्रदीप्त कर हवन करना चाहिये। जिस देवका यज्ञ होता है अथवा जिस देवताकी प्रतिष्ठा हो उसे प्रथम आहुतियाँ देनी चाहिये। अनन्तर तिल, आज्य, पायस, पत्र, पुष्प, अक्षत तथा समिधा आदिसे अन्य देवताओंके मन्त्रोंसे उन्हें आहुतियाँ देनी चाहिये।

पञ्चदिवसात्मक प्रतिष्ठायागमें प्रथम दिन देवताओंका आवाहन एवं स्थापन करना चाहिये। दूसरे दिन पूजन और हवन, तीसरे दिन बलि-प्रदान, चौथे दिन चतुर्थीकर्म और पाँचवें दिन नोराजन करना चाहिये । नित्यकर्म करने के अनन्तर ही नैमित्तिक कर्म करने चाहिये। इसीसे कर्मफलकी प्राति होती है।

दूसरे दिन प्रात:काल सर्वप्रथम प्रतिष्ठाप्य देवताका सर्वोषधिमिश्रित जलसे ब्राह्मणोंद्वारा वेदमन्त्रोंके पाठपूर्वक महास्नान तथा मन्त्राभिषेक कराये, तदनन्तर चन्दन आदिसे उसे अनुलिप्त करे। तत्पश्चात् आचार्य आदिकी पूजा कर उन्हें अलंकृत कर गोदान करे। फिर मङ्गल-घोषपूर्वक तालाबमें जल छोड़नेके लिये संकल्प करे। इसके बाद उस तालाबके जलमें नागयुक्त वरुण, मकर, कच्छप आदिकी अलंकृत प्रतिमाएं छोड़े। वरुणदेवकी विशेषरूपसे पूजा कर उन्हें  निवेदित करे। पुनः उसी तालाबके जाल, सप्तमृत्तिका मिश्रित जल, तीर्थजल, पञ्चामृत, कुशोदक तथा पुष्पाजल आदिरो वरुणदेवको स्नान कराकर गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि प्रदान करे। सभी देवताओंको बलि प्रदान करे। मङ्गलघोषके साथ नीराजन कर प्रदक्षिणा करे। एक वेदीपर भगवान् वरुण तथा पुष्करिणीदेवीकी यथाशक्ति स्वर्ण आदिकी प्रतिमा बनाकर भगवान् वरुणदेवके साथ देवी पुष्करिणीका विवाह कराकर उन्हें वरुणदेवके लिये निवेदित कर दे। एक काष्ठका यूप जो यजमानकी ऊँचाईके बराबर हो, उसे अलंकृत कर तडागके ईशान दिशामें मन्त्रपूर्वक गाड़कर स्थिर कर दे। प्रासादके ईशानकोणमें, प्रपाके दक्षिण भागमें तथा आवासके मध्यमें यूप गाड़ना चाहिये। इसके अनन्तर दिक्पालोंको बलि प्रदान करे। ब्राह्मणोंको भोजन एवं दक्षिणा प्रदान करे।

उस तड़ागके जलके मध्य में 'जलमातृभ्यो नमः' ऐसा कहकर जलमातृकाओंका पूजन करे और मातृकाओंसे प्रार्थना करे कि मातृका देवियो! तीनों लोकोंके चराचर प्राणियोंकी संतृप्तिके लिये यह जल मेरे द्वारा छोड़ा गया है, यह जल संसारके लिये आनन्ददायक हो। इस जलाशयकी आपलोग रक्षा करें। ऐसी ही मङ्गल-प्रार्थना भगवान् वरुणदेवसे भी करे। अनन्तर वरुणदेवको बिाब, पद्म तथा नागमुद्राएँ दिखाये। ब्राह्मणोंको उस जलाशयका जल भी दक्षिणाके रूपमें प्रदान को। अनन्तर तर्पण कर अग्निकी प्रार्थना करे। स्वयं भी उस जलका पान करे। पितरोंको अर्घ्य प्रदान करे। अनन्तर पुनः वरुणदेवकी प्रार्थना कर, जलाशयकी प्रदक्षिणा करे। फिर ब्राह्मणोंद्वारा वेद-ध्वनि के उच्चारणपूर्वक यजमान अपने घरमें प्रवेश करे और ब्राह्मणों, दीनों, अन्धों, कृपणों तथा कुमारिकाओंको भोजन कराकर संतुष्ट करे एवं भगवान सूर्वको अर्थ प्रदान करे। (अध्याय १९-२१)

।।मध्यमपर्व, द्वितीय भाग सम्पूर्ण।।