महाराज युधिष्ठिरने पूछा- भगवन् ! मैंने आपसे प्रतिपदा आदि तिथियोंके दानको क्रमशः विस्तारसे सुना, सभी रहस्यों तथा मन्त्रोंके साथ व्रत एवं दान आदिके प्रारम्भ और उद्यापन-विधियोको सुना। यज्ञ-यागादि दानधर्मों, स्नानविधि, उत्सवों तथा इष्टापूर्तकोंके विषयमें भी सुना। फिर भी मधुसूदन ! मेरा मन सशंकित हो रहा है, क्योंकि व्रतोंके प्रसंगमें आपने विविध देवताओंका वर्णन किया है। देवकीपुत्र !आपने देवताओंका नानात्व प्रदर्शन किया तथा तिथिके क्रमसे अलग अलग मन्त्र आदिको भी बतलाया है। परंतु ध्यान- योगपरायण व्यासादि मुनियोंने केवल अव्यय, सर्वगत, निर्विकार एक परमात्माका ही वर्णन
किया है, इसमें क्या रहस्य है? प्रभो! आपने अनेक विषय बतलाये, पर वर्णाश्रमके आचार और धर्मों का निरूपण नहीं किया। ये सभी महर्षिगण आपकी वाणी सुननेके लिये उत्सुक हैं। इस विषयको आप बतलायें ।
भगवान् श्रीकृष्णने कहा-राजन्! व्रतों और दानोंका तो मैंने सारांशरूपसे वर्णन किया है। विशेष वर्णन तो भगवती सरस्वती ही कर सकती हैं। सभी वर्णाश्रमोंका सामान्य धर्म यही है कि सभी प्राणी विघ्नरहित हों और सभी कल्याणके भागी बनें । यहाँपर जो मैंने देवताओंके उद्देश्यसे व्रतोंका आपसे वर्णन किया है, उसमें भी मूलतः एक परमात्मदेवका ही वर्णन हुआ है। जो ब्रह्मा हैं वही हरि, वही महेश्वर, वही सूर्य, वही अग्नि, वही कार्तिकेय और वही विनायक है, गौरी, लक्ष्मी और सावित्री ये भी एक ही शक्तिके भिन्न-भिन्न रूप हैं, मूलतः एक ही तत्त्व है। किसी देवता या देवीको उद्देश्यकर जो मनुष्य व्रत करता है, उसे वहाँपर देवी-देवताका भेद नहीं जानना चाहिये, क्योंकि यह सम्पूर्ण जगत् शिव-शक्तिमय है। जैसे अग्नि, वायु एवं जलके भेदसे वसुधाके अनेक भेद प्रतीत होते हैं, किंतु पारमार्थिक दृष्टि से विचार करनेपर भेदका भान नहीं होता है।
पार्थ ! वेदधर्मके अनुसार जो कोई भी जिस किसी भी देवताका आश्रयण कर जिस किसी भी दान अथवा व्रतको करता है, उन सबके मूल में वस्तुतः एक ही परमात्माकी उपासना होती है। मैंने जो व्रत-दानकी विधियाँ कही हैं, वे सदाचारीको ही फलप्रद होती हैं, आचारहीनको नहीं। आचारहीन व्यक्तिको छ: अङ्गोंके साथ अधीत वेद भी पवित्र नहीं कर सकते। जैसे पक्षी पंख निकलनेके बाद अपने घोंसलेको छोड़ देता है, वैसे ही ये वेद आचारहीनको मृत्युके समय परित्याग कर देते हैं। जैसे कपालमें रखा जल, कुत्तेके चर्मपात्र (मशक)- में रखा दूध स्थानदोषसे अशुद्ध हो जाता है, इसी प्रकार आचारहीन व्यक्ति भी अशुद्धही है। इसलिये वृत्त (आचार)-को यलपूर्वक रक्षा करनी चाहिये, क्योंकि धनं तो आता-जाता रहता है। जो धनसे हीन है, वह दीन नहीं, किंतु जो आचारसे गिरा हुआ है वह गिरा ही रहता है, वह मरे हुएके समान है। राजन्! इस प्रकार आचार ही धर्म और कुलका मूल है। आचारसे च्युत व्यक्ति न कुलीन होता है और न धार्मिक होता है। दुरात्मा व्यक्तिके बहुत बड़े कुलसे क्या लाभ? क्या सुगन्धित पुष्पमें कीड़े नहीं रहते? इसी प्रकार उत्तम कुलमें भी दुराचारी उत्पन्न हो जाते हैं। हीन जातिमें उत्पन्न व्यक्ति भी यदि शौचाचारसम्पन्न है और सभी धर्मोको जानता है तो वह सज्जनोंमें कुलीन और श्रेष्ठ है। कुलको कुल नहीं कहा जाता, बल्कि सदाचार ही कुल है। राजन्! जो व्यक्ति सदाचार-सम्पन्न है, वह इस लोक और परलोक दोनोंमें आनन्द प्राप्त करता है।
राजन्! आचारसे धर्म उत्पन्न है और संत ही सदाचारके मूल हैं। उनका आचार ही सदाचार है। इसलिये जो अपना कल्याण चाहता है, उसे सदाचारका पालन करना चाहिये। सदाचारके पालनसे दोष- पाप नष्ट हो जाते हैं। संसार जिसे न ठीकसे देखता है और न जिसका कभी परिचय पाता है, वह यदि सदाचारी और धर्मात्मा (पुण्यश्लोक राम, नल, युधिष्टिर आदिकी तरह) है तो तीनों कालमें उसे श्रेष्ठ मानकर सभी आदरकी दृष्टि से स्मरण करते रहते हैं और सभी उसका प्रिय करते हैं। जो नास्तिक, ईश्वरीय आस्थाचे रहित तथा गुरुओं एवं शास्त्रोंकी आज्ञाका उल्लङ्घन करते हैं, अधर्मज्ञ एवं दुराचारी हैं, वे मानो मृतक-तुल्य हैं, पर यदि
१-आचारहीनं न पुनन्ति वेदा यद्यप्यधीता: सह षभिरङ्गः ।
इन्दास्येनं मृत्युकाले त्यजन्ति नीडं शकुन्ता इव जातपक्षाः ।।
(उत्तरपर्व २०५।१७)
यह श्लोक परिष्ट, गौतम आदि धर्मसूत्रों और प्राय: अनेक पुराणों एवं धर्मशास्त्रोंमें भी इसी प्रकार प्राप्त होता है।
२-कपालस्थं यथा तोर्य पदृतौ वा यथा पयः ।
दुई स्यात् ल्यानदोषेण वृत्तहीने स्थाशुभम् ।।
वृत्तं यजेन संरक्षेद् विनामेति प्रयाति च
अहोनो विततो हीनो वृत्ततस्तु हतो हतः ।।
एबमाचारधर्मस्य मूलं राजन् कुलस्य च ।
आचारादि च्युतो जन्तुर्न कुलीनो न धार्मिकः ॥
किं कुलेनोपदिष्टेन विपुलेन दुरात्मनाम् ।
कृमयः किं जायन्ते कुसुमेषु सुगन्धियु ।
होनजातिप्रसूतोऽपि शौचाचारसमन्वितः ।
सर्वधर्मार्थकुशालः स कुलीनः सतां वरः ।।
न कुलं कुलमित्याहुरचारः कुलमुच्यते ।
आचारकुशालो राजनिह चामुत्र नन्दते ॥
(उत्तरपर्व २०५।१८-२३)
कोई व्यक्ति सम्पूर्ण लक्षणोंसे हीन होते हुए भी सदाचार-सम्पन्न, श्रद्धालु और अनिन्दक है तो वह अपनी सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है।
मानवको चाहिये कि ब्राह्म-वेलामें जग जाय और धर्म तथा अर्थक विषयमें विचार करे। कभी भी ब्राह्मण, अग्नि, गौ तथा सूर्यके सम्मुख मल-मूत्रका उत्सर्जन नहीं करना चाहिये। दिनमें उत्तराभिमुख और रात्रिमें दक्षिणाभिमुख होकर मल-मूत्रका विसर्जन करना चाहिये। प्रात:काल नित्य-क्रियासे निवृत्त हो आचमनके अनन्तर समाहित होकर प्रात:- संध्या करनी चाहिये। इसी प्रकार वाणीपर नियन्त्रण कर मौन होकर सार्य-संध्या करे। भगवान् सूर्यको उगते हुए तथा अस्त होते हुए नहीं देखना चाहिये। ऋषियोंने दीर्घकालीन तपस्या आदिसे दीर्घायुको प्राप्त किया। धार्मिक राजाको चाहिये कि जो द्विज प्रातः तथा सायं-संध्या नहीं करता, उसे शूद्र-कर्ममें नियोजित कर दे। मूत्र-पुरीषमें यदि वेग हो जाय या कोई बाधा उपस्थित हो जाय तो उस समय विधि एवं नियमकी अपेक्षा न करे। पृथ्वीको तृणोंसे तथा सिरको वस्त्रसे आच्छादितकर मल त्याग करना चाहिये। ग्राम, आश्रम, तीर्थ, क्षेत्र, मार्ग, जुते खेत, गोष्ठ और गौओंके मार्ग आदि स्थानोंमें मूत्रादिका परित्याग नहीं करना चाहिये। जलके अंदरकी, आश्रम आदिकी, वल्मौककी, चूहोंके बिलकी तथा शौचसे बची-इन पाँच प्रकारको मिट्टियोंका शौच आदिमें प्रयोग न करे। देवताओं आदिकी पूजा, गुरुओंका अभिवादन तथा भोजन आदि क्रियाएँ आचमन करनेके अनन्तर करनी चाहिये। फेनरहित, सुगन्धित निर्मल जलसे पूर्व या उत्तराभिमुख हो आचमन करना चाहिये। विद्वानोंको धर्म-अर्थ तथा कामके कायोको करना चाहिये।धर्म-अर्थ तथा काम इस त्रिवर्गक सम्पादनसे गृहस्थको ऐहिक और पारलौकिक सिद्धि प्राप्त होती है। बुद्धिमान् व्यक्तिको अपने न्यायोपार्जित
द्रव्यके एक भागसे परलोक-सम्बन्धी पुण्यकाँका सम्पादन करना चाहिये। एक भागका संचय करे और आधे अर्थात् दो भागका भोजन, व्यवहार तथा नित्य-नैमित्तिक कार्योंमें व्यय करे।अत: न्यायपूर्वक धनके उपार्जनके लिये प्रयत्न करना चाहिये, क्योंकि धनके माध्यमसे ही धर्म-काम आदि पुरुषार्थ सिद्ध होते हैं। पूर्वाह्नकालमें ही केशप्रसाधन, आदर्शदर्शन, दन्तधावन तथा देवताओंका पूजन आदि कर लेना चाहिये। मल-मूत्रादि क्रियाएँ घरसे दूर करनी चाहिये तथा घरका जूठन आदि भी दूर फेंकना चाहिये। मिट्टीके ढलेको तोड़नेवाला, तिनकोंको टुकड़े-टुकड़े करनेवाला, नख काटकर खानेवाला, नित्य उच्छिष्ट भोजन करनेवाला तथा वस्तुओंमें मिलावट करनेवाला इस संसारमें अधिक दिनोंतक नहीं जीता। दूसरेकी स्त्रीको नग्न नहीं देखना चाहिये, अपने पुरीष (मल)-को भी न देखे । रजस्वला स्त्रीको न देखे, न उसका स्पर्श करे और न उससे वार्तालाप करे। जलमें मूत्र-पुरीषका उत्सर्ग तथा मैथुन नहीं करना चाहिये । केश, राख, कपाल, मल-मूत्र, भूसी, अंगार, अस्थिपंजर तथा रस्सी आदिपर न बैठे। विद्वानोंको चाहिये कि ब्राहाणोंको प्रणाम करें तथा उन्हें बैठनेके लिये आसन प्रदान करें, जाते समय कुछ दूरतक उन्हें पहुँचाने जायें। टूटे फूटे आसनपर न बैठे और फूटे हुए काँसेके पात्रोंका उपयोग न करे। बालोंको खोलकर भोजन न करे । नग्न होकर स्नान और शयन न करे। जूठे स्थानपर न बैठे। जूठे हाथसे सिरका स्पर्श करे, क्योंकि सभी प्राण सिरमें स्थित रहते हैं। सिरके बालोंको न खींचे और न सिरपर प्रहार करे। पुत्र और शिष्यको कोड़े-से नहीं मारना चाहिये। अपने सिरको दोनों हाथोंसे एक साथ नहीं खुजलाना चाहिये। बिना कारण सिरसे स्नान नहीं करना चाहिये। ग्रहणके बिना रात्रि-स्नान नहीं करना चाहिये। भोजनके अनन्तर तथा अथाह जलमें डुबकी लगाकर स्नान नहीं करना चाहिये।स्नान करनेके बाद तेल नहीं लगाना चाहिये। तिलपिष्ट नहीं खाना चाहिये, क्योंकि इससे आयु क्षीण होती है।
अपने गुरुजनों तथा श्रेष्ठजनोंसे बुरी बात न बोले। यदि वे क्रुद्ध दिखायी दें तो उन्हें प्रसन्न करना चाहिये। दूसरेकी निन्दाजनक बात नहीं सुननी चाहिये और न स्वयं करनी चाहिये। प्रशस्त ओषधियोंका ही सेवन करना चाहिये। रत्त्रोंको धारण करना चाहिये। अपने केशोंको स्निग्ध और निर्मल रखना चाहिये। सुन्दर शिष्ट वेष धारण करना चाहिये। सफेद, प्रिय लगनेवाले फूलोंको धारण करना चाहिये। दूसरेके किञ्चिन्मात्र धनको न लेना चाहिये और न कभी अप्रिय बोलना चाहिये । सत्य और प्रिय वाणी बोलनी चाहिये। दूसरेके दोषोंको नहीं कहना चाहिये। किसीसे वैर बाँधना नहीं यानमें न चढ़े। नदीके किनारेकी छाया आदिका आश्रय नहीं लेना चाहिये। विद्वेषी, पतित, उन्मत्त, बहुत्तोंसे वैर करनेवाले, वर्णसंकर, वन्ध्या, वन्ध्याके पति, नीच, असत्य भाषण करनेवाले, अत्यन्त खर्चीले स्वभाववाले, दूसरेको व्यर्थ निन्दा करनेवाले तथा शठसे विद्वान् व्यक्तिको मैत्री नहीं करनी चाहिये। मार्ग में एकाकी गमन न करे। अतिशय वेगसम्पन्न जलमें स्नान न करे। जलते हुए घरमें प्रवेश न करे । वृक्षके ऊपरतक न चढ़े। शवके प्रति हुंकार न करे । दाँतोंको परस्पर रगड़ना नहीं चाहिये। नासिका फुलाना नहीं चाहिये। मुखको अधिक खोलकर नहीं बोलना चाहिये। ऊँचे स्वरमें हँसना नहीं चाहिये और शब्द करते हुए अपान वायुका परित्याग नहीं करना चाहिये। नखसे नख नहीं बजाना चाहिये, न छेदन करना चाहिये और न पृथ्वीपर लिखना ही चाहिये। दाढ़ी-मूंछके बालोंका भक्षण नहीं करना चाहिये, पैरसे पैरका आक्रमण नहीं करना चाहिये। गुरुके सम्मुख उच्च आसनपर नहीं बैठना चाहिये।सदा सदाचारतत्पर रहना चाहिये। कामाचारी नहीं होना चाहिये। दोनों लोकोंमें शुभ चाहनेवाला व्यक्ति कामाचारपूर्वक जीवनयापन न करनेसे स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित्त होता है। रात्रि चतुष्पद (चौराहा),श्मशान, ग्रामकेसमीपवर्ती पीपल आदिके वृक्ष, उपवन तथा दुष्ट स्त्रीके सानिध्यका परित्याग करे। ग्रीष्म और वर्षा-ऋतुमें छत्र धारण किये रहे। रात्रि और वनमें मौन रहे । केश, अस्थि, कण्टकयुक्त अपवित्र बलिस्थान, भस्म, भूसी तथा स्नानसे भीगी हुई पृथ्वीका दूरसे ही परित्याग करे।
ब्राह्मण, राजा, स्त्री, ज्ञानवान्, गर्भिणी स्त्री, बोझसे दवा हुआ व्यक्ति, श्रेष्ठ व्यक्ति, मूक, अन्धा, बधिर, मतवाला तथा उन्मत्त व्यक्तिको दूरसे ही मार्ग दे देना चाहिये। अन्योंके द्वारा धारण किये गये जूते, वस्त्र तथा माला नहीं धारण करना चाहिये। दूसरेकी स्त्रीके उपसेवनसे बढ़कर लोकमें अनायुष्यका अन्य कोई भी कार्य नहीं है । स्त्रियोंसे ईर्ष्या नहीं करनी चाहिये और स्त्रिोंकी रक्षा करना कर्तव्य समझना चाहिये। ईर्ष्या करनेसे आयुका हास होता है, अत: ईर्ष्याका सर्वथा परित्याग कर देना चाहिये। मूर्ख, उन्मत्त, व्यसनी, विरूप, अहंकारी, होनाङ्ग, अधिकाङ्ग अथवा विद्यासे हीन व्यक्तिका तिरस्कार नहीं करना चाहिये। रात्रिमें दही और सत्तूका भक्षण नहीं करना चाहिये। महाराज! आधी रातमें भोजन नहीं करना चाहिये। घुटनोंको ऊपर कर अधिक देरतक नहीं बैठना चाहिये। दूसरेके रहस्यकी बातको जाननेकी उत्सुकता तथा अभिलाषा नहीं रखनी चाहिये। पैरके ऊपर पैर रखकर नहीं बैठना चाहिये। अतिशय रक्त, चितकबरा तथा कृष्ण वस्त्रको अधिक समयतक नहीं धारण करना चाहिये और वस्त्र या अलंकारका विपर्यय भी नहीं करना
*न हीदृशमनायुप्यं लोके किञ्चन विद्यते। यादृर्श पुरुषस्येह परदारोपसेवनम्
(उत्तापर्व २०५11)
चाहिये। दीर्घायुकी इच्छा है तो स्त्रीको दुर्बल नहीं समझाना चाहिये। दूसरेको पीड़ा नहीं देनी चाहिये और परोक्षवादी नहीं होना चाहिये। असहनशील एवं अनम्र भी न हो। अग्निसे दान अथवा परशुसे काटा गया वन अङ्कुरित हो सकता है, किंतु उद्वेलित और अप्रिय वाणी बोलनेपर फिर प्रेमका संचार नहीं हो सकता। मनुष्यको चाहिये कि नास्तिक न मने, वेदों और देवताओंकी निन्दा न करे, किसीके साथ वैर न करे और न कायर ही बने । ब्राह्मणको कुत्सित वाक्य न कहे। नक्षत्रों को नहीं दिखाना चाहिये। प्राज्ञ व्यक्तिको न्यायके अनुसार कार्य करनेवाले बलवान् शत्रुजयो राजाके यहाँ सुखपूर्वक निवास करना चाहिये। जहाँपर स्त्रियाँ मात्सर्यरहित हों, वहाँपर रहना सुखप्रद होता है। जिस राष्ट्र में किसान कृषि-कार्यमें लगे हों, अतिशय बोलनेवाले न हों और जहाँ सभी ओषधियाँ प्राप्त हों, विद्वान् व्यक्तिको वहीं रहना चाहिये। जहाँपर लोग दूसरेको पराभूत करनेवाले और वैरकी गाँठ रखनेवाले हों, जनशून्य अथवा अधिक लोग बसते हों तथा जहाँ उत्सव आदि न होते हों-इन स्थानोंपर निवास न करे। राजन्! जहाँ ऋणदाता, वैद्य, श्रोत्रिय तथा जलपूर्ण नदी-ये चारों न हों वहाँ निवास नहीं करना चाहिये। मलिन दर्पण नहीं देखना चाहिये। महाराज! दीर्घ राज्यकी इच्छा रखनेवाले व्यक्तिको स्वर्णकारके घरका अन्न नहीं खाना चाहिये, उसपर विश्वास नहीं करना चाहिये और न उसे मित्र ही बनाना चाहिये। फूटा-टूटा बर्तन, टूटी खाट, कुत्ता तथा मुर्गा-ये चार और कोटेदार वृक्ष इन्हें अपने दरवाजेपर न रखे। फूटा पात्र घरमें होनेसे कलह होता है, टूटी खाट रहनेसे भी अच्छा नहीं होता, धान और कुक्कुटवाले घरमें पितर भोजन नहीं करते और केटकयुक्त वृक्षोंके नीचे पिशाचोंका निवास रहता है। गृहस्थ व्यक्तिको चाहिये कि सुवासिनी, गर्भवती, वृद्धा स्त्री, बालकों तथा आतुर व्यक्तिको भोजन पहले कराये। घरके स्वामीको अन्तमें भोजन करना चाहिये। असंस्कृत अनका भोजन नहीं करना चाहिये। जो गौका वाहन आदिके रूपमें प्रयोग कर उससे धनार्जन करता है और फिर उस धनका उपयोग करता है, घरके बाहर उपस्थित व्यक्तिको बिना दिये हुए खाता है, वह मानो पापका ही भक्षण करता है। बलिवैश्वदेव कर्म करनेके बाद ही विधिपूर्वक भोजन करना चाहिये। एक वस्त्र पहनकर भोजन न करे। पूर्वाभिमुख अथवा उत्तराभिमुख होकर प्रसन्नतापूर्वक भोजन करना चाहिये । असंस्कृत तथा कुत्सित अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिये। शिष्ट व्यक्ति तथा भूखेको भोजन करानेके बाद पवित्र पात्रोंमें क्रोधरहित (शान्त, प्रसन्नचित्त) होकर भोजन करना चाहिये। तख्नेपर रखे पात्रमें, अनुचित स्थानमें, असमयमें, अतिशय संकीर्ण स्थानमें भोजन नहीं करना चाहिये। भोजनसे पूर्व अग्राशन देकर तन्मय होकर भोजन करना चाहिये। पहले मधुर पदार्थोंको, अनन्तर लवण पदार्थ और इसके बाद कटु एवं तीक्ष्ण पदार्थोका भोजन करे। पहले कोमल पदार्थो, बीचमें गरिष्ठ व्यञ्जनों तथा अन्तमें द्रवयुक्त व्यञ्जनोंका भोजन करनेसे मनुष्य रोगमुक्त रहते हैं। दिनमें भूजेमें, रात्रिमें दही-सत्तूमें तथा कोविदार (कचनार)- में अलक्ष्मी-दरिद्राका सदा ही निवास रहता है। वाणीका संयम कर मौन होकर अन्नकी निन्दा किये बिना प्रशस्त अन्न खाना चाहिये। पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख हो भोजन करनेके बाद भलीभाँति आचमनकर पुनः हाथका प्रक्षालन करके सावधानीसे आचमन करे और इसके बाद अपने अभीष्ट देवताका स्मरण करना चाहिये। अनन्तर इन श्लोकोंका पाठ करते हुए अपने हाथसे उदरको धीरे-धरि सहलाये-
प्राणापानसमानानामुदानव्यानयोस्तथा।
अनं पुष्टिकरं चास्तु ममाद्याव्याहत सुखम्॥
अगस्तिरग्निवंशवानलम भुक्तं प्रपात्र जरयत्वशेषम्।
सुखं च मे तत्परिणामसम्भयं यच्छत्वोर्ग खलु वासुदेवः ॥
(उचरपर्य २०५ । ११५-११६)
'प्राण, अपान, समान, ठदान तथा च्यान-इन पञ्चप्राणोंको पुष्टि प्रदान करनेवाला मेरे द्वारा खाया गया अन्न मेरे लिये सुखप्रद हो। अगस्त्य, अग्नि, वडवानल मेरे द्वारा भुक्त हुए अत्र और पेय पदार्थोंको भलीभाँति पचायें तथा मुझे सुखकी प्राप्ति हो और वासुदेव मुझे रोगहीन बनायें।'
इसके बाद आलस्यरहित होकर अनायास होनेवाले कोको करे। भारत! संध्याके समय यदि कोई पथिक आ जाय तो उसकी पाद्य, आसन आदिके द्वारा स्वागत करे । अनन्तर अन्न-प्रदान एवं शयनके द्वारा उसकी सेवा करे। दिनमें आये अतिथिके विमुख हो जानेपर जो पाप लगता है, उसका आठ गुना पाप सायंकालमें आये अतिथिके लौट जानेपर होता है। पूर्व और दक्षिणमें सिर कर शयन करना प्रशस्त माना गया है और इसके विपरीत सोनेसे रोग उत्पन्न होता है। ऋतुकालमें ही स्त्री-सहवास प्रशस्त माना गया है। चतुर्दशी, अष्टमी, अमावास्या एवं पर्वके समयमें तैलाभ्यङ्ग तथा स्त्री-सम्पर्क न करे । क्षौर-कर्म, स्त्री-सहवास तथा श्मशानगमनके अनन्तर सवस्त्र स्नान करना चाहिये। गुरु, पतिव्रता, यज्ञकर्ता एवं तपस्वीकी मनोविनोदमें भी निन्दा नहीं करनी चाहिये। विद्वान् व्यक्तिको एक हौ साथ अग्नि और जलको धारण नहीं करना चाहिये। गुरु और देवताकी ओर पैर नहीं फैलाना चाहिये। जलको अञ्जलिसे नहीं पीना चाहिये और अधिक वायु तथा धूपका भी सेवन नहीं करना चाहिये। दास-नौकर आदिको क्रुद्ध होकर अपशब्द न कहे। राभी बन्धुओंके प्रति मात्सर्यरहित होकर रहना चाहिये। डरे हुए व्यक्तिको आवासन देना चाहिये, साधुवत् रहना चाहिये। ये बातें व्यक्तिको स्वर्गरूपी फल प्रदान करती है। पृथ्वीपर देखाते हुए चलना चाहिये। बचे हुए जीवनमें जो अपनी आत्माको वशीभूत कर जीवन-यापन करता है, उसके धर्म, अर्थ तथा कामकी थोड़ी भी हानि नहीं होती। आक्रोश, विवाद और पिशुनता छोड़ देनी चाहिये।
सोनेके समय दूसरा वस्त्र, पूजाके समयमें दूसरा और सभामें दूसरा वस्त्र पहनना चाहिये अर्थात् अलग-अलग वस्त्र धारण करना चाहिये। पतितोंके साथ बातचीत न करे अन्यथा वह भी पतित हो जाता है । वृद्ध, ज्ञाति-बन्धु तथा मित्रके दरिद्ध हो जानेपर उसको अपने साथ रखना चाहिये। इनके रहनेसे घरकी वृद्धि होती है। कबूतर, शुक तथा मैनाको घरमें रखना अच्छा होता है। ये तथा तिलपान करनेवाले पापरहित होते हैं। चन्दन, वीणा, दर्पण, घी, शहद, जल तथा अग्नि इन्हें घरमें निरन्तर रखना चाहिये। राजाको चाहिये कि धनुर्वेदादि शास्त्रोंके ज्ञानमें तथा नीतिशास्त्रके ज्ञानार्जनमें सदा तत्पर रहे एवं उसे शब्दशास्त्र (व्याकरण), यज्ञशास्त्र (कर्मकाण्ड), गान्धर्वशास्त्र (संगीत), कलाशास्त्र और इतिहास-पुराण आदिका भी ज्ञान रखना चाहिये।
राजन् ! मैंने ये सब सदाचारके लक्षण बतलाये। अन्य जाननेयोग्य बातोंको वृद्धोंसे जानना चाहिये। सदाचार ही सभी ऐश्वर्योंका जनक है। इसके पालनसे आयुकी वृद्धि होती है। यह सभी दोषोंको दूर कर देता है। सभी आगों में सदाचारको ही प्रथम स्थान प्राप्त है। सदाचारसे ज्ञानको वृद्धि होती है। आचार परम धर्म है। आचारसे ऐश्वर्य, यश, आयु, स्वर्ग और परम मङ्गल प्राप्त होता है। महाराज ! सभी वर्गों के कल्याणकी दृष्टि से इन सबका मैंने वर्णन किया है। अत: धर्म, अर्थ, कामरूपी फलको देनेवाले सदाचारका सावधानीके साथ सदा पालन करना चाहिये। (अध्याय २०५)