भविष्य पुराण

भूमिदानकी महिमा

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं-महाराज! अब मैं सभी पापोंको दूर करनेवाले भूमिदानकी विधि बतला रहा हूँ। जो अग्निहोत्री दरिद्र-कुटुम्बी तथा वैदिक ब्राह्मणको दक्षिणासहित भूमिका दान करता है, वह बहुत समयतक ऐश्वर्यका भोग कर अन्तमें दिव्य विमानमें बैठकर विष्णुलोकको जाता है। जबतक उसके द्वारा प्रदत्त भूमिपर अंकुर उपजते रहते हैं, तबतक भूमिदाता विष्णुलोकमें पूजित होता है। भूमिदानके अतिरिक्त और कोई भी दान विशिष्ट नहीं माना गया है। पुरुषर्षभ! अन्य दान कालक्रमसे क्षीण हो जाते हैं, परंतु भूमिदानका पुण्य क्षीण नहीं होता। जो व्यक्ति सस्यसम्पन्न भूमिका दान करता है, वह जबतक भगवान सूर्य रहेंगे, तबतक सूर्यलोकमें पूजित होता रहेगा। धन धान्य, सुवर्ण, रल, आभूषण आदि सब दान करने का फल भूमिदान करनेवाला प्राप्त कर लेता है। जिसने भूमिदान किया, उसने मानो समुद्र, नदी, पर्वत, सम-विषम स्थल, गन्ध, रस, क्षीरयुक्त ओषधि, पुष्प, फल, कमल, उत्पल आदि सब कुछ दान कर दिया। दक्षिणासे युक्त अग्निष्टोम आदि यज्ञ करनेसे जो पुण्य प्राप्त होता है, वह पुण्य भूमिदान करनेसे प्राप्त हो जाता है। ब्राह्मणको भूमिदान देकर पुनः उससे वापस नहीं लेना चाहिये। सस्यसम्पन भूमिका दान करनेवाले व्यक्तिके पितर प्रलयपर्थत संतुष्ट रहते हैं। अपनी आजीविकाके निमित्त जो पाप पुरुषसे होता हैवे सारे पाप गोचर्म-मात्र* भूमिके दान करनेसे दूर हो जाते हैं। एक हजार स्वर्णमुद्राके दानसे जो फल बतलाया गया है, वही फल गोचर्म-प्रमाणमें भूमिका दान देनेसे प्राप्त हो जाता है। नरोत्तम! हजारों कपिला गौओंके दान करनेके समान पुण्य गोचर्म मात्र भूमि देनेसे प्राप्त होता है । सगर आदि अनेक राजाओंने भूमिका उपयोग किया है, परंतु अपने-अपने आधिपत्यमें जिसने भी भूमिका दान किया, सभीको उसका फल प्रास हुआ। यमदूत, मृत्युदण्ड, असिपत्रवन, वरुणके घोर पाश और रौरवादि अनेक नरक तथा उनकी दारुण यातनाएँ भूमिदान करनेवालेके समीप नहीं आती चित्रगुप्त, मृत्यु, काल, यम आदि सब भूमिदाताको पूजा करते हैं। राजन्! भगवान् रुद्र, प्रजापति, इन्द्रादि देवता और असुरगण भूमिका दान करनेवालेकी पूजा करते हैं, स्वयं मैं भी उसकी अतीव प्रसन्नतासे पूजा करता हूँ। जिस भांति माता अपनी संतानका और गौ जैसे अपने वत्सका दूध आदिके द्वारा पालन करती है, उसी प्रकार रसमयी भूमि भी भूमि देनेवालेकी रक्षा और पालन-पोषण करती है। जिस प्रकार जलके सेचनसे खोज अंकुरित होते हैं, उसी प्रकार भूमिदानसे सत्र मनोरथ अंकुरित होकर सफल सिद्ध होते हैं जिस प्रकार सूर्यके उदय होते ही उनके प्रकाशसे अन्धकार दूर हो जाता है, उसी प्रकार भूमिके दानने सभी प्रकारके पाप दूर हो जाते हैं।

*मध्यमस्य मनुषस्य व्यासेन परिसंख्यया।

त्रिंशद्दण्डांश्व गोचर्म दत्वा स्वर्गे महीपते

(उत्तरपर्व १६४२१)

भूमिको दान देकर वापस लेनेवालेको यमदूत वारुणपाशोंसे बाँधकर पूय तथा शोणितसे भरे कुण्डोंमें डालते हैं। अपने द्वारा दी गयी अथवा दूसरे व्यक्तिके द्वारा दी गयी भूमिका जो व्यक्ति अपहरण करता है, वह प्रलयपर्यन्त नरकाग्निमें जलता रहता है। दानमें प्राप्त भूमिके हरण हो जानेपर दुःखित व्यक्तिके रोने-कलपनेसे जितने अश्रुबिन्दु गिरते हैं, उतने हजार वर्षतक भूमिका हरण करनेवाला नरकमें कष्ट भोगता है। ब्राह्मणको भूमिदान देकर जो व्यक्ति पुनः उस भूमिका हरण करता है, उसे उल्टा लटका कर कुम्भीपाक नरकमें पकाया जाता है। दिव्य हजार वर्षके बाद वह व्यक्ति कुम्भीपाकसे निकलकर इस भूमिपर जन्म लेता है और सात जन्मतक अनेक प्रकारके कष्टोंको भोगता रहता है। इसलिये भूमिका हरण नहीं करना चाहिये। (अध्याय १६४)