भविष्य पुराण

सत्यनारायणव्रत-कथामें राजा चन्द्रचूडका आख्यान

सूतजी बोले-ऋषियो! प्राचीन कालमें केदारखण्डके मणिपूरक नामक नगरमें चन्द्रचूड नामक एक धार्मिक तथा प्रजावत्सल राजा रहते थे। वे अत्यन्त शान्तस्वभाव, मृदुभाषी, धीर-प्रकृति तथा भगवान् नारायणके भक्त थे। विन्ध्यदेशके म्लेच्छगण उनके शत्रु हो गये। उस राजाका उन म्लेच्छोंसे अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा भयानक युद्ध हुआ। उस युद्ध में राजा चन्द्रचूडकी विशाल चतुरङ्गिणी सेना अधिक नष्ट हुई, किंतु कूट-युद्धमें निपुण म्लेच्छोंकी सेनाकी क्षति बहुत कम हुई। युद्धमें दम्भी म्लेच्छोंसे परास्त होकर राजा चन्द्रचूड अपना राष्ट्र छोड़कर अकेले ही वनमें चले गये। तीर्थाटनके बहाने इधर-उधर घूमते हुए वे काशीपुरीमें पहुंचे। वहाँ उन्होंने देखा कि घर-घर सत्यनारायणकी पूजा हो रही है और यह काशी नगरी द्वारकाके समान ही भव्य एवं समृद्धिशाली हो गयी है।

वहाँको समृद्धि देखकर चन्द्रचूड विस्मित हो गये और उन्होंने सदानन्द (शतान्द) ब्राह्मणके द्वारा की गयो सत्यनारायण-पूजाकी प्रसिद्धि भी सुनी, जिसके अनुसरणसे सभी शील एवं धर्मसे समृद्ध हो गये थे। राजा चन्द्रचूड भगवान् सत्यनारायणकी करनेवाले ब्राह्मण सदानन्द (शतानन्द) के पास गये और उनके चरणोंपर गिरकर उनसे सत्यनारायण-पूजाको विधि पूछी तथा अपने राज्यभट होनेकी कथा भी बतलायी और कहा 'ब्रह्मन् ! लक्ष्मीपति भगवान् जनार्दन जिस व्रतसे प्रसन्न होते हैं, पापके नाश करनेवाले उस प्रतको बतलाकर आप मेरा उद्धार करें।'

सदानन्द ( शतानन्द) ने कहा- राजन् ! श्रोपति भगवान् को प्रसन्न करनेवाला सत्यनारायण नामक एक श्रेष्ठ व्रत है, जो समस्त दु:ख-शोकादिका शामक, धन-धान्यका प्रवर्धक, सौभाग्य और संततिका प्रदाता तथा सर्वत्र विजय-प्रदायक है। राजन् ! जिस किसी भी दिन प्रदोषकालमें इनके पूजन आदिका आयोजन करना चाहिये। कदलीदलके स्तम्भोंसे मण्डित, तोरणोंसे अलंकृत एक मण्डपकी रचनाकर उसमें पाँच कलशोंकी स्थापना करनी चाहिये और पाँच ध्वजाएँ भी लगानी चाहिये। व्रतीको चाहिये कि उस मण्डपके मध्यमें ब्राह्मणोंके द्वारा एक रमणीय वेदिकाकी रचना करवाये। उसके ऊपर स्वर्णसे मण्डित शिलारूप भगवान् नारायण (शालग्राम)- को स्थापित कर प्रेम भक्तिपूर्वक चन्दन, पुष्प आदि उपचारोंसे उनकी पूजा करे। भगवान्का ध्यान करते हुए भूमिपर शयनकर सात रात्रि व्यतीत करे।

यह सुनकर राजा चन्द्रचूडने काशीमें ही भगवान् सत्यनारायणकी शीघ्र ही पूजा की प्रसन्न होकर रात्रिमें भगवान्ने राजाको एक उत्तम तलवार प्रदान की। शत्रुओंको नष्ट करनेवाली तलवार प्राप्त कर राजा ब्राह्मणश्रेष्ठ सदानन्दको प्रणाम कर अपने नगरमें आ गये तथा छ; हजार म्लेच्छ दस्युओंको मारकर उनसे अपार धन प्राप्त किया और नर्मदाके मनोहर तटपर पुनः भगवान् श्रीहरिकी पूजा की। वे राजा प्रत्येक मासकी मूर्णिमाको प्रेम और भक्तिपूर्वक विधि-विधानसे भगवान् सत्यदेवकी पूजा करने लगे। उस व्रतके प्रभावसे वे लाखों ग्रामोंके अधिपति हो गये और साठ वर्मतक राज्य करते हुए अन्तमें उन्होंने विष्णुलोकको प्राप्त किया।(आध्याय 26)

[सत्यनारायत कथाका तृतीय अध्याय]