भविष्य पुराण

रम्भातृतीया-व्रतका माहात्म्य

भगवान् श्रीकृष्ण बोले-राजन् ! अब मैं सभी पापोंके नाशक, पुत्र एवं सौभाग्यप्रद सभी व्याधियोंके उपशामक पुण्य तथा सौख्य प्रदान करनेवाले रम्भातृतीया-व्रतका वर्णन करता हूँ। यह व्रत सपत्नियोंसे उत्पन्न क्लेशका शामक तथा ऐश्वर्यको प्रदान करनेवाला है। भगमन् शंकरने देवी पार्वतीकी प्रसन्नताके लिये इस व्रतकी जो विधि बतलायी थी, उसे ही मैं कहता हूँ।

श्रद्धालु स्त्री मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षको तृतीया तिथिको प्रात: उठकर दन्तधावन आदिसे निवृत्त हो भक्तिपूर्वक उपवासका नियम ग्रहण करे। वह सर्वप्रथम व्रत-ग्रहण करनेके लिये देवीसे इस प्रकार प्रार्थना करे-

देवि संवत्सरं यावत्तृतीयायामुपोषिता।

प्रतिमासं करिष्यामि पारणं चापरेऽहनि।

तदविघ्नेन में यातु प्रसादात् तव पार्वति॥

(उत्तरपर्व २४।५)

'देवि! मैं पूरे एक वर्षतक इस तृतीया व्रतका आचरण और दूसरे दिन पारणा करूँगी। आप ऐसी कृपा करें, जिससे इसमें कोई विघ्र न उत्पन्न हो।' इस प्रकार स्त्री या पुरुष व्रतका संकल्प करे और मनमें व्रतका निश्चय कर सावधानी बर्तत हुए नदी, तालाब अथवा घरमें नान करे। तदनन्तर देवी पार्वतीका पूजन कर रात्रि में कुशोदकका प्राशन करे। दूसरे दिन प्रात:काल विद्वान् शिवभक्त ब्राह्मणोंको भोजन कराये और दक्षिणाके रूपमें सुवर्ण एवं लवण प्रदान करे। यथाशक्ति गौरीश्वर भगवान् शिवको प्रयत्नपूर्वक भोग निवेदित करे।

राजन्! पौष मासको तृतीयामें इसी विधिसे उपवास एवं पूजनकर रात्रि में गोमूत्रका प्राशन कर प्रभातकालमें ब्राह्मणों को भोजन कराये और दक्षिणाके रूपमें उन्हें अपनी शक्ति के अनुसार सोना तथा जीरक दे। इससे वाजपेय तथा अतिरात्र यज्ञोंका फल प्राप्त होता है और वह कल्पपर्यन्त इन्द्रलोकमें निवासकर अन्त में शिवलोकको प्राप्त करता है। गाघ मासके शुक्लपक्षको तृतीयाको 'सुदेवी' नामसे भगवती पार्वतीका पूजन कर रात्रिमें गोमयका प्राशन कर अकेले ही सोये। प्रातः अपनी शक्तिके अनुसार केसर तथा सोना ब्राह्मणोंको दानमें दे। इससे व्रतीको चिरकालतक विष्णुलोकमें निवास करनेके पश्चात् भगवान् शंकरके सायुज्य (मोक्ष)- की प्राप्ति होती है।

फाल्गुन पक्षकी तृतीयाको 'गौरी' नामसे देवी पार्वतीका पूजन कर रात्रिमें गायका दूध पीये। प्रात: विद्वान् शिवभक्तों तथा सुवासिनी स्त्रियोंको भोजन कराकर सोनेके साथ कडुहुंड देकर बिदा करे। इससे वाजपेय तथा अतिरात्र यज्ञोंका फल प्राप्त होता है।

चैत्र मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयामें भक्तिपूर्वक भगवती पार्वतीका विशालाक्षी नामसे पूजन कर रात्रिमें दहीका प्राशन करे और प्रात: कुंकुमके साथ ब्राह्मणोंको सोना प्रदान करे। विशालाक्षीके प्रसादसे व्रतकीको महान् सौभाग्य प्रास होता है। वैशाख मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको भगवती पार्वतीका श्रीमुखी' नामसे पूजन करे। रात्रिमें घृतका प्राशन करे और एकाकी हो शयन करे। प्रात: शिवभक्त ब्राह्मणोंको यथारुचि भोजन कराकर ताम्बूल तथा लवण प्रदान कर प्रणामपूर्वक बिदा करे। इस विधिसे पूजन करनेपर सुन्दर पुडोंकी प्राप्ति होती है।

आषाढ़ मासके शुक्ल पक्षको तृतीयाको गौरी-पार्वतीकी 'माधवी' नामसे पूजा करे। तिलोदकका प्राशन करे। प्रातःकाल विप्रोको भोजन कराये और दक्षिांगामें गुड़ तथा सोना दे। इससे उसे शुभ लोककी प्राप्ति होती है।

श्रावण मासके शुक्ल पक्षको तृतीयाको देवी पार्वतीका श्रीदेवी' नामसे पूजन कर गायके सींगका स्पर्श करे और जल पीये। शिवभकोंको भोजन कराकर सोना और फल दक्षिणाके रूप दै। इससे व्रती सर्वलोकेश्वार होकर सभी कामनाओंको प्राप्त करता है।

भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको भगवती पार्वतीका 'हरताली' नामसे पूजन करे। महिधीका दूध पीये। इससे अतुल सौभाग्य प्रास होता है और इस लकमें वह सुख भेगका अन्त में शिवलोकको प्राप्त करता है।

आश्विन मासके शुक्ल पक्षको तृतीयाको देवी पार्वतीका 'गिरिपुत्री' नामसे पूजन कर तण्डुल- मिश्रित जलका प्राशन करे और दूसरे दिन प्रातः ब्राह्मणोंका पूजन कर चन्दनयुक्त सुवर्ण दक्षिणामें दे। इससे सभी यज्ञोंका फल प्रास होता है और वह गौरीलोकमें प्रशसित होता है।

कार्तिक मासके शुक्ल पक्षको तृतीयाको देवी पार्वतीका 'पद्मोद्भवा' नामसे पूजन करके पञ्चगव्यका प्राशन करे तथा रात्रि जागरण करे। प्रभातकालमें सपत्रीक सदाचारी ब्राह्मणोंको भोजन कराये और माल्य, वस्त्र तथा अलंकारोंसे उन शिवभक्त ब्राह्मणों का पूजन करे। कुमारियोंको भी भोजन कराये।

इस प्रकार वर्षभर व्रत करनेके पश्चात् उद्यापन करना चाहिये । यथाशक्ति सोनेकी उमा-महेश्वरकी प्रतिमा बनवाकर उन्हें एक सुन्दर, अलंकृत वितानयुक्त मण्डपमें स्थापित कर सुगन्धित द्रव्य, पत्र, पुष्प, फल, घृत पक्त नैवेद्य, दीपमाला, शर्करा, नारियल, दाडिम, बीजपूरक, जोरक, लवण, कुसुंभ, कुंकुम तथा मोदकयुक्त ताम्रपात्रसे देवदेवेशको विधिवत् पूजा कर अन्तमें क्षमा प्रार्थना एवं शंख आदि वाद्योंकी ध्वनि करनी चाहिये।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले-राजन्! इस विधिसे

* ज्येष्ठ मासके. शुक्ल पक्षकी तृतीयाको भगवती पार्वतीक़ा 'नारायणी' नामसे श्वेत पुष्पोंसे पूजन करे। रात्रिमें लवणका प्राशन करे। एकाको शयन करे। प्रात:काल शिवभक्त ब्राह्मण और सौभाग्यवती स्त्रियोंको यथाशक्ति भोजन कराये, ब्राह्मणको ताम्बूल दे और सुवर्णको दक्षिणा देकर प्रणाम-क्षमा-प्रार्थना करे। इससे व्रतकर्ताको शिवलोक प्राप्त होता है।

देवी पार्वतीका पूजन करनेपर जो फल प्राप्त होता है, उसका फल वर्णन करनेमें मैं भी समर्थ नहीं हूँ। वह पूर्वोक्त सभी फलोंको प्राप्त करता है, सभी देवताओं के द्वारा पूजित होता है तथा सौ करोड़ सभी कामनाओंका उपभोग करता हुआ अन्तमें शिव-सायुज्य प्राप्त करता है, इसमें कोई संदेह नहीं। यह  व्रत पहले राम्भाके द्वारा किया गया था, इसलिये यह रम्भाव्रत कहलाता है। (अध्याय २४)