युधिष्ठिरने पूछा- भगवन्! इस मृत्युलोकमें जिस व्रतके द्वारा स्त्रियोंका गृहस्थाश्रम सुचारुरूपसे चले और उन्हें पतिकी भी प्रीति प्राप्त हो, उसे बताइये।
भगवान् श्रीकृष्णाने कहा-एक समय अनेक लताओंसे आच्छन, विविध पुष्पोंसे सुशोभित, मुनि और किन्नरोंसे सेक्ति तथा गान और नृत्यसे परिपूर्ण रमणीय कैलास-शिखरपर मुनियों और देवताओंसे आवृत माँ पार्वती और भगवान् शिव बैठे हुए थे। उस समय भगवान् शंकरने पार्वतीसे पूछा-'सुन्दरि! तुमने कौन-सा ऐसा उत्तम व्रत किया था, जिससे आज तुम मेरी वामाङ्गोके रूपमें अत्यन्त प्रिय बन गयो हो?'
पार्वतीजी बोलीं-नाथ! मैंने बाल्यकालमें राभानत किया था, उसीके फलस्वरूप आप मुझे पतिरूपमें प्राप्त हुए हैं एवं मैं सभी स्त्रियों को स्वामिनी तथा आपकी अर्धाङ्गिनी भी बन गयी हूँ।
भगवान् शंकरने पूछा-भद्रे! सभीको सौख्य प्रदान करनेवाला वह रम्भाव्रत कैसे किया जाता है ? पिताके यहाँ इसे तुमने किस प्रकार अनुष्ठित किया था? उसे बताओ।
पार्वतीजी बोली-देव! एक समय में बाल्यकालमें अपने पिताके घर सखियोंके साथ बैठी थी, उस समय मेरे पिता हिमवान् तथा माता गेनाने मुझसे कहा-'पुत्रि! तुम सुन्दर तथा सौभाग्यवर्धक राधाव्रतका अनुष्ठान करो, उसके आरम्भ करते ही तुम्हें सौभाग्य, ऐश्वर्य तथा महादेवी- पदकी प्राप्ति हो जायगी। पुत्रि! ज्येष्ठ मासवे शुक्ल पक्षकी तृतीयाको खान कर इस व्रतका नियम ग्रहण करो और अपने चारों ओर पज्ञाग्नि प्रज्वलित करो अर्थात् गार्हपत्याग्नि, दक्षिणागि, ने आहवनीय तथा सभ्याग्नि और पाँचवें तेज स्वरूप सूर्यानिका सेवन करो। इसके बीच में पूर्वकी दिशाकी ओर मुखकर बैठ जाओ और मृगचर्म, जटा,
*इसमें वनस्पतिको देवता मानकर उसकी पूजाको विशेष महत्व प्रदान किया गया है। विशेषकर अथर्ववेद तथा उसके सूत्रोमें ऐसे कई प्रकरण आये हैं। औषधियाँ देवता ही हैं, जिनसे रोग दुःख पाप-शमनके साथ-साथ धर्माथीकी सिद्धि भी होती है।
वल्कल आदि धारण कर चार भुजाओंवाली एवं सभी अलंकारोंसे सुशोभित तथा कमलके ऊपर विराजमान भगवती महासतीका ध्यान करो। पुत्रि। महालक्ष्मी, महाकाली, महामाया, महामति, गङ्गा, यमुना, सिन्धु, शतद्गु, नर्मदा, मही, सरस्वती तथा वैतरणीके रूपमें वे ही महासती सर्वत्र व्याप्त हैं। अतः तुम उन्हींकी आराधना करो।'
प्रभो ! मैंने माताके द्वारा बतलायी गयी विधिसे श्रद्धा-भक्तिपूर्वक रम्भा (गौरी)-व्रतका अनुष्ठान किया और उसी ब्रतके प्रभावसे मैंने आपको प्राप्त कर लिया।
भगवान् श्रीकृष्ण पुनः बोले-कौन्तेय ! लोपामुद्राने भी इस रम्भाव्रतके आचरणसे महामुनि अगस्त्यको प्राप्त किया और वे संसारमें पूजित हुईं। जो कोई स्त्री-पुरुष इस रम्भाव्रतको करेगा, उसके कुलकी वृद्धि होगी। उसे उत्तम संतति तथा सम्पत्ति प्राप्त होगी। स्त्रियोंको अखाड सौभाग्यकी तथा सम्पूर्ण कामनाओंको सिद्ध करनेवाले श्रेष्ठ गार्हस्थ्य-सुखकी प्राप्ति होगी और जीवनके अन्तमें उन्हें इच्छानुसार विष्णु एवं शिवलोककी प्राप्ति होगी। इस व्रतका संक्षिप्त विधान इस प्रकार है-
व्रतीको एक सुन्दर मण्डप बनाकर उसे गन्ध- पुष्पादिसे सुवासित तथा अलंकृत करना चाहिये। तदनन्तर मण्डपमें महादेवो रुद्राणीको यथाशक्ति स्वर्गादिसे निर्मित प्रतिमा स्थापित करनी चाहिये और गन्ध, पुष्प, धूप, दीप तथा अनेक प्रकारके नैवेद्योंसे उनकी पूजा करनी चाहिये। देवौके सम्मुख सौभाग्याएक-जीरा, कडुहुंड, अपूप, फूल, पवित्र निष्णाव (सेम), नगक, चीनी तथा गुड़ निवेदित करना चाहिये। पद्मासन लगाकर सूर्यास्ततक देवीके सम्मुख बैठा रहे। अनन्तर रुद्राणीको प्रणाम कर यह गन्त्र कहे-
वेदेषु सर्वशास्त्रेषु दिवि भूमौ धरातले।
दृष्टः श्रुतश्च बहुशो न शक्त्या रहितः शिवः॥
त्वंशक्तिस्त्वंस्वधास्वाहात्वंसावित्रीसरस्वती।
पतिं देहि गृहं देहि वसु देहि नमोऽस्तु ते ।।
(उत्तरपर्व १८।२३-२४)
'सम्पूर्ण वेदादि शास्त्रोंमें, स्वर्गमें तथा पृथ्वी आदिमें कहीं भी यह कभी नहीं सुना गया है और न ऐसा देखा ही गया है कि शिव शक्तिसे रहित हैं। हे पार्वती ! आप ही शक्ति हैं, आप ही स्वधा, स्वाहा, सावित्री और सरस्वती हैं। आप मुझे पति, श्रेष्ठ गृह तथा धन प्रदान करें, आपको नमस्कार है।'
इस प्रकार पुन: पुन: उन्हें प्रणाम करके देवीसे क्षमा-प्रार्थना करे। अनन्तर सपत्नीक यशस्वी ब्राह्मणकी सभी उपकरणोंसे पूजा करके दान देना चाहिये। सुवासिनी स्त्रियोंको नैवेद्य आदि प्रदान करना चाहिये। इस विधानसे सभी कार्य सम्पन्न कर पाप-नाशके लिये क्षमा प्रार्थना करे। अगले दिन चतुर्थीको ब्राह्मण-दम्पतियोंको मधुर रसोंसे समन्वित भोजन कराकर व्रत पूर्ण करना चाहिये।
पार्थ ! भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षको तृतीया तथा चतुर्थी तिथिको प्रतिवर्ष गोष्यद नामक व्रत करना चाहिये। स्त्री अथवा पुरुष प्रथम स्नानसे निवृत्त होकर अक्षत और पुष्पमाला, धूप, चन्दन, पिष्टक (पीठी) आदिसे गौकी पूजा करे। उनके शृंग आदि सभी अङ्गोंको अलंकृत करे। उन्हें भोजन कराकर तृप्त कर दे। स्वयं तेल और लवण आदि क्षार वस्तुओंसे रहित जो अनिके द्वारा सिद्ध न किया गया हो उसका भोजन करे। वनकी ओर जाती तथा लौटती गौओको उनकी तुपिके लिये ग्रास दे और उन्हें निम्न मन्त्रसे अयं प्रदान करे-
माता रुद्राणां दुहिता वसूनां स्वसादित्यानाममृत्तस्य नाभिः ।
अनुवाच चिकित्षे जनाय मा गामनागादिति बधि।
तदनन्तर निम्न मन्त्रसे गौकी प्रार्थना करे-
गावो मे अग्रतः सन्तु गावो मे सन्तु पक्षतः।
गावो मे हृदये सन्तु गवां मध्ये वसाम्यहम्॥
(उत्तरपर्व १९।७)
पञ्चमीको क्रोधरहित होकर गायके दूध, दही, चावलका पीठा, फल तथा शाकका भोजन करे। रात्रि में संयत होकर विश्राम करे। प्रात:काल यथाशक्ति स्वर्णादिसे निर्मित गोष्पद (गायका खुर) तथा गुड़से निर्मित गोवर्धन पर्वतकी पूजा कर ब्राह्मणको 'गोविन्दः प्रीयताम्' ऐसा कहकर दान करे। अनन्तर अच्युतको प्रणाम करे। इस व्रतको भक्तिपूर्वक करनेवाला व्रती सौभाम्य, लावण्य, धन, धान्य, यश, उत्तम संतान आदि सभी पदार्थोंको प्राप्त करता है। उसका घर, गौ और बछड़ोंसे परिपूर्ण रहता है। मृत्युके बाद वह दिव्य स्वरूप धारणकर दिव्यालंकारोंसे विभूषित हो विमानमें बैठकर स्वर्गलोक जाता है एवं स्वर्गमें दिव्य सौ वर्षोंतक निवासकर फिर विष्णुलोकमें जाता है। इस गोष्पद त्रिरात्रव्रतका कर्ता गौ तथा गोविन्दकी पूजा करनेवाला और गोरस आदिका भोजन करते हुए जीवन-यापन करनेवाला उत्तम गोलोकको प्राप्त करता है। (अध्याय १८-१९)