भविष्य पुराण

कमलषष्ठी (फलषष्ठी)-व्रत

भगवान् श्रीकृष्ण बोले-राजन्! अब मैं कमल- षष्ठी नामक व्रतको बतलाता हूँ, जिसमें उपवास करनेसे व्यक्ति पापमुक्त होकर स्वर्गको प्राप्त करता है। मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षकी पञ्चमीको नियतव्रत होकर षष्ठीको उपवास करे। कृष्ण सप्तमीको सुवर्णकमल, सुवर्णफल तथा शर्कराके साथ कलश ब्राह्मणको प्रदान करे। इसी विधिसे एक वर्षपर्यन्त दोनों पक्षोंमें प्रत्येक षष्ठीको उपवास करे। भानु, अर्क, रवि, ब्रह्मा, सूर्य, शुक्र, हरि, शिव, श्रीमान्, विभावसु, त्वष्टा तथा वरुण-इन बारह नामोंसे क्रमश: बारह महीनों में पूजन करे और 'भानुमें प्रीयताम्', 'अर्को मे प्रीयताम्' इस प्रकार प्रतिमास सप्तमीको दान और षष्ठी-पूजन आदिके समय उच्चारण करे। व्रतके अन्तमें ब्राह्मण-दम्पतिकी पूजाकर वस्त्र-आभूषण, शर्करापूर्ण कलश और सुवर्णकमल तथा स्वर्णफल ब्राह्मणको देकर निम्नलिखित मन्त्र पढ़कर व्रत पूर्ण करे-

यथा फलकरो मासस्त्वद्भक्तानां सदा रवे।

तथानन्तफलावाप्तिरस्तु जन्मनि जन्मनि ।।

(उत्तरपर्व ३९॥ ११)

'हे सूर्यदेव ! जिस प्रकार आपके भक्तोंके लिये यह मास-व्रत फलदायी होता है, उसी प्रकार मुझे भी जन्म-जन्ममें अनन्त फलौकी प्रासि होती रहे।'

इस अनन्त फल देनेवाली फलषष्ठी-व्रतको जो करता है, वह सुरापानादि सभी पापोंसे मुक्त हो सूर्यलोकमें सम्मानित होता है और अपने आगे-पीछेकी इक्कीस पीढ़ियोंका उद्धार करता है। जो इसका माहात्म्य श्रवण करता है, वह भी कल्याणका भागी होता है।* (अध्याय ३९)