भविष्य पुराण

अधिवासनकर्म एवं यज्ञकर्ममें उपयोज्य उत्तम ब्राह्मण तथा धर्मदेवताका स्वरुप

सूतजी कहते हैं-ब्राह्मणो! देव-प्रतिष्ठाके पहले दिन देवताओंका अधिवासन करना चाहिये और विधिके अनुसार अधिवासनके पदार्थ-धान्य आदिकी प्रतिष्ठा कर यूप आदिको भी स्थापित कर लेना चाहिये। कलशके ऊपर गणेशजीकी स्थापना कर दिक्पाल और ग्रहोंका पूजन करना चाहिये। तड़ाग तथा उद्यानको प्रतिष्ठामें प्रधानरूपसे ब्रह्माकी, शान्ति-यागमें तथा प्रपायागमें वरुणकी, शैव-प्रतिक्षामें शिवकी और सोम, सूर्य तथा विष्णु एवं अन्य देवताओंका भी पाद्य-अर्घ्य आदिसे अर्चन करना चाहिये। 'द्रुपदादिवः' (यजु २०।२०) इस मन्त्रसे पहले प्रतिमाको स्नान कराये। स्नानके अनन्तर मन्त्रोंद्वारा गन्ध, फूल, फल, दूर्वा, सिंदूर, चन्दन, सुगन्धित तैल, पुष्प, धूप, दीप, अक्षत, वस्त्र आदि उपचारोंसे पूजन करे। मण्डपके अंदर प्रधान देवताका आवाहन करे और उसीमें अधिवासन करे। सुरक्षा- कर्मियोंद्वारा उस स्थानकी सुरक्षा करवाये। तदनन्तर आचार्य, यजमान और ऋत्विक् मधुर पदार्थोका भोजन करें। बिना अधिवासन-कर्म सम्पन्न किये देव प्रतिष्ठाका कोई फल नहीं होता। नित्य, नैमित्तिक, अथवा काम्य कर्मोमें विधिके अनुसार कुण्ड- मण्डपकी रचना कर हवनकार्य करना चाहिये।

'ब्राह्मणो ! यज्ञकार्यमें अनुष्ठानके प्रमाणसे आठ होता, आठ द्वारपाल और आठ याजक ब्राह्मण होने चाहिये। ये सभी ब्राह्मण शुद्ध, पवित्र तथा उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न वेदमन्त्रों में पारङ्गत होने चाहिये। एक जप करनेवाले जापकका भी वरण करना चाहिये। ब्राहाणोंकी गन्ध, माल्य, वस्त्र तथा दक्षिणा आदिके द्वारा विधिके अनुसार पूजा करनी चाहिये । उत्तम सर्वलक्षणसम्पन्न तथा विद्वान् ब्राह्मण न मिलनेपर किये गये यज्ञका उत्तम फल प्राप्त नहीं होता। ब्राह्मण वरणके समय गोत्र और नामका निर्देश करे। तुलापुरुषके दानमें, स्वर्णपर्वतके दानमें, वृषोत्सर्ग एवं कन्यादानमें गोत्रके साथ प्रवरका भी उच्चारण करना चाहिये । मृत्त भार्यावाला, कृपण, शूद्रके घर में निवास करनेवाला, बौना, वृषलीपति, बन्धुद्वेषी, गुरुद्वेषी, स्त्रीद्वेषी, हीनाङ्ग, अधिकाङ्ग, भानदन्त, दाम्भिक, प्रतिग्राही, कुनखो, व्यभिचारी, कुष्ठी, निद्रालु, व्यसनी, अदीक्षित, महावणी, अपुत्र तथा केवल अपना ही भरण-पोषण करनेवाला- ये सब यज्ञके पात्र नहीं हैं। ब्राह्मणों के वरण एवं पूजनके मन्त्रों के भाव इस प्रकार हैं-आचार्यदेव! आप ब्रह्मकी मूर्ति है। इस संसारसे मेरी रक्षा करें। गुरो ! आपके प्रसादसे ही यह यज्ञ करनेका सुअवसर मुझे प्राप्त हुआ है। चिरकालतक मेरी कीर्ति बनी रहे। आप मुझपर प्रसन्न होवें, जिससे मैं बह कार्य सिद्ध कर सकूँ। आप सब भूतोंके आदि हैं, संसाररूपी समुद्रसे पार करानेवाले हैं। ज्ञानरूपी अमृतके आप आचार्य हैं। आप यजुर्वेदस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। ऋत्विग्गणो। आप षडङ्ग वेदोंके ज्ञाता है, आप हमारे लिये मोक्षप्रद हों। मण्डलमें प्रवेश करके ठन ब्राह्मणों को अपने अपने स्थानोंपर क्रमशः आदरसे बैठाये। वेदीके पश्चिम भागमें आचार्यको बैवाये, कुण्डके अय-भागमें ब्रह्माको बैलाये। होता, द्वारपाल आदिको भी यथास्थान आसन दे। यजमान उन आचार्य आदिको सम्बोधित कर प्रार्थना करे कि

आप सब नारायणस्वरूप हैं। मेरे यज्ञको सफल बनायें। यजुर्वेदके तत्त्वार्थको जाननेवाले ब्रह्मरूप आचार्य! आपको प्रणाम है। आप सम्पूर्ण यज्ञकर्मके साक्षीभूत हैं। ऋग्वेदार्थको जाननेवाले इन्द्ररूप ब्रह्मन्! आपको नमस्कार है। इस यज्ञकर्मकी सिद्धिके लिये ज्ञानरूपी मङ्गलमूर्ति भगवान् शिवको नमस्कार है। आप सभी दिशाओं-विदिशाओंसे इस यज्ञकी रक्षा करें। दिक्पालरूपी ब्राह्मणोंको नमस्कार है। व्रत, देवार्चन तथा यागादि कर्म संकल्पपूर्वक करने चाहिये। काम संकल्पमूलक और यज्ञ संकल्पसम्भूत हैं। संकल्पके बिना जो धर्माचरण करता है, वह कोई फल नहीं प्रास कर सकता। गङ्गा, सूर्य, चन्द्र, द्यौ, भूमि, रात्रि, दिन, सूर्य, सोम, यम, काल, पञ्च महाभूत-ये सब शुभाशुभ- कर्मके साक्षी है। अतएव विचारवान् मनुष्यको अशुभ कर्मोसे विरत हो धर्मका आचरण करना चाहिये। धर्मदेव शुभ शरीरवाले एवं श्वेत वस्त्र धारण करते हैं। वृषस्वरूप ये धर्मदेव अपने दोनों हाथों में वरद और अभय-मुद्रा धारण किये हैं। ये सभी प्राणियोंको सुख देते हैं और सज्जनोंके लिये एकमात्र मोक्षके कारण हैं। इस प्रकारके स्वरूपवाले भगवान् धर्मदेव सत्पुरुषोंके लिये कल्याणकारी हों तथा सदा सबकी रक्षा करें। (अध्याय १७ १८)