सूतजी कहते हैं-ब्राह्मणो! अब मैं विविध प्रकारके अपशकुनों, उत्पातों एवं उनके फलोंका वर्णन कर रहा हूँ। आपलोग सावधान होकर सुनें। जिस व्यक्तिकी लग्न-कुण्डली अथवा गोचरमें पाप-ग्रहोंका योग हो तो उसकी शान्ति करानी चाहिये। दिव्य, अन्तरिक्ष और भौम-ये तीन प्रकारके उत्पात होते हैं। ग्रह, नक्षत्र आदिसे जो अनिष्टको आशंका होती है वह दिव्य उत्पात कहलाता है । उल्कापात, दिशाओंका दाह (मण्डलोंका उदय, सूर्य-चन्द्रके इर्द-गिर्द पड़नेवाले घेरेका दिखायी देना), आकाशमें गन्धर्वनगरका दर्शन, खण्डवृष्टि, अनावृष्टि या अतिवृष्टि आदि अन्तरिक्षजन्य उत्पात हैं। जलाशयों, वृक्षों, पर्वतों तथा पृथ्वीसे प्रकट होनेवाले भूकम्प आदि उत्पात भौम उत्पात कहलाते हैं। अन्तरिक्ष एवं दिव्य उत्पातीका प्रभाव एक सप्ताहतक रहता है। इसकी शान्तिके लिये तत्काल उपाय करना चाहिये अन्यथा वे बहुत कालतक प्रभावी रहते हैं। देवताओंका हँसना, रुधिर-नाच होना, अकस्मात् बिजली एवं वजका गिरना, हिंसा और निर्दयताका बढ़ना, सर्पोका आरोहण करना-ये सब दैव दुनिमित्त हैं। मेघसे उत्पन्न वृष्टि केवल शिलातलपर ही गिरे तो एक ससाहके अंदर उत्पन्न प्राणी नष्ट हो जाते हैं। एक राशिपर शनि, मंगल और सूर्य-ये पापग्रह स्थित हो जाये और पृथ्वी अकस्मात् धुएँसे ढकी दीखे तो भारी जनसंहारको सम्भावना होती है। यदि बृहस्पति अपनी राशिका अतिचार करे और शनि वहाँ स्थित न हो तो राज्य न होने की सम्भावना रहती है। यदि सूर्य कुछ समयतकन दिखायी दे और दिशाओंमें दाह होने लगे, धूमकेतु दिखायी दे और बार-बार भूकम्प होता हो तथा राजाके जन्म-दिनमें इन्द्रधनुष दिखायी पड़े तो वह उसके लिये भारी दुर्निमित्त है। भयंकर आँधी-तूफान आ जाय, ग्रहोंका आपसमें युद्ध दिखलायी दे, तीन महीनेमें ही दूसरा ग्रहण लग जाय अथवा उल्कापात हो, आकाश और भूमिपर मेढ़क दौड़ने लगें, हल्दीके समान पीली वृष्टि हो, पत्थरोंमें सिंह और बिल्लीकी आकृति दिखलायी पड़े तो राष्ट्रमें दुर्भिक्ष और राजाका विनाश होता है। चैत्रमें अथवा कुम्भके सूर्यमें (फाल्गुन मासमें) नदीका वेग अकस्मात् बहुत बढ़ जाय तो राष्ट्र में विप्लव होता है। ये सब सूर्यजन्य अद्भुत उत्पात हैं। हवन आदिद्वारा इनकी शान्ति करानी चाहिये। 'आ कृष्णणेन0' (यजु० ३३१४३) इस सूर्यमन्त्रद्वारा हवन कराना चाहिये । धान्यादिका निस्सार हो जाना, गौओंका निस्तेज हो जाना, कुओंका जल सहसा सूख जाना-ये सब भी सूर्यजनित उत्पात हैं, इनकी शान्तिके लिये कमल-पुष्योंसे एक सहस्र आहुतियाँ देनी चाहिये। विकृत पक्षी, पाण्डुवर्ण कपोत, श्वेत उल्लू, काला कौआ और कराकुल पक्षी यदि घरमें गिरें तो उस घरमें महान् उत्पात मच जाता है । गलेकी मालाएँ आपसमें टकराने लगे, सद्या उत्पन्न बालकको दाँत हो, देवताओंकी मूर्तियाँ हँसती हों, मूर्तियोंमें पसीना दीख पड़े और घड़े में अथवा घरमें सर्प और मण्डूकका प्रसव हो जाय तो उस घरकी गृहिणी छः मासके अंदर नाम हो जाती है। घरपर या वृक्षपर बिजली कड़कड़ाकर गिरने और आराको चालाएँ दिखायी देनेपर महान जमाव होता है। इन सबकी
इन उत्पादोंका तथा इनकी शान्तियों का विस्तृत विधान अथर्वण शालिकल्य एवं भयर्वपरिशिष्टादिमें दिया गया है। मत्स्यपुराणके २२८ से २३४ तक के अध्यायों में भी यह विषय विचित है
२-एक राशिका भोगकाल समाप्त हुए विना तीव्रगति से भागे चत्न जाना। यह स्थिति केवल मंगलसे लेकर शनितक ग्रहाँको होती हैं।
शान्तिके लिये रविवारके दिन भगवान् सूर्यकी प्रसन्नता-हेतु उनकी पूजा करे । तिल एवं पायसकी दस हजार आहुतियाँ प्रदान करे। गो-दान करे और ब्राह्मणोंको दक्षिणा दे। इससे शीघ्र शान्ति होती है। अचानक ध्वज, चामर, छत्र तथा सिंहासनसे विभूषित रथपर राजाका दिखलायी देना तथा स्त्री- पुरुषोंकी लड़ाई-ये भी महान् उत्पात हैं। पृथ्वीका काँपना, पहाड़ोंका टकराना, कोयल और उल्लूका रोना आदि सुनायी पड़े तो राजा, मन्त्री, राजपुत्र, हाथी आदि विनष्ट होते हैं।
ताड़ एवं सुपारीके वृक्ष एक साथ उत्पन्न हो जायँ तो उस घरमें रहनेवालोंपर विपत्तिकी सम्भावना होती है। दूसरे वृक्षोंमें अन्य वृक्षोंके फूल-फल लगे हुए दीखें तो ये सोमग्रहजन्य उत्पात है इसकी शान्तिके लिये सोमवारके दिन सोमके निमित्त दधि, मधु, घृत तथा पलाश आदिसे 'इर्म देवा' (यजुः ९। ४०) इस मन्त्रसे एक हजार आहुतियाँ दे और चरसे भी हवन करे।
उड़द और जौकी ढेरियाँ सहसा लुप्त हो जायें, दही, दूध, घी और पक्वानोंमें रुधिर दिखलायो पड़े, एकाएक घरमें आग-जैसा लगना दिखायो दे, बिना बादलके ही बिजली चमकने लगे, घरके सभी पशु तथा मनुष्य रुग्ण-से दिखायी पड़ें तो मङ्गल ग्रहसे उत्पन्न उत्पात समझने चाहिये। इनसे राजा, अमात्य तथा घरके स्वामियोंका विनाश होता है। ऐसे भयंकर उपद्रवोंको देखकर मङ्गलको शान्तिके लिये दही, मधु, घीसे युक्त खैर और गूलरको समिधासे 'अग्निर्मूर्धा' (यजु ३ । १२) इस सबसे दस हजार आहुतियाँ देनी चाहिये। तीन वाहायोको भोजन कराकर दक्षिणाय लाल वस्तुएँ देनी चाहिये तथा सोने या ताबको महलको प्रतिमा बनाकर दानमें देनी चाहिये। इससे हानि होती है। गौएँ यदि घरमें पूँछ उठाकर स्वयं दौड़ने लगें और कुत्ते तथा सूअर घरपर चढ़ने लगें तो उस घरकी स्त्रियोंको भीषण क्लेशकी आशंका होती है। गृहस्वामीका पूर्णत: मिथ्यावादी होना तथा राजाका वाद-विवादमें फैसना, घरमें गौओंका चिल्लाना, पृथ्वीका हिलना, घरमें मेढक तथा साँपका जन्म लेना- ये सभी उत्पात बुधग्रहजन्य हैं। इसमें राज्य तथा घरके नष्ट होनेकी सम्भावना होती है। इन उत्पातोंकी शान्तिके लिये बुधवारके दिन बुधग्रहके उद्देश्यसे दही, मधु, घी तथा अपामार्गकी समिधा एवं चरसे 'उबुध्यस्व.' (यजु १५ । ५४) इस मन्त्रद्वारा दस हजार आहुतियाँ देनी चाहिये। बुधकी सुवर्णकी प्रतिमा तथा पयस्विनी गाय ब्राह्मणको दानमें देनी चाहिये।
पशुओंका असमयमें समागम और उनसे यमल संततियोंकी उत्पत्ति, जौ, व्रीहि आदिका सहसा लुप्त हो जाना, गृहस्तम्भका सहसा टूटना, आँगनमें बिल्ली तथा मेढकका नखोंसे जमीन कुरेदना और इनका घरपर चढ़ना, ये सभी दोष जहाँ दिखायी दें, वहाँ छ: महीनेके भीतर ही घरका विनाश होता है-कोई प्राणी मर जाता है या कुटुम्नमें कलह होता है तथा अनेक व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं। बिल्व वृक्षपर गृध्र और गृधीका एक साथ दिखलायी देना राजाके लिये विधमकारक तथा प्रासादके लिये हानिकारक होता है। इस दोषसे अमात्यवर्ग राजाके विपरीत हो जाता है। ये सभी अत्तरतिजनित दोष हैं। इनकी शान्तिके लिये वृहस्पति के निमिता शान्ति होम करना चाहिये तथा पयस्पतिके गाय एव स्वर्णकी बृहस्पतिकी प्रतिमाका दान करना चाहिये।
राक्षसद्वारा घड़ेका जल पीनेका आभास होना सिंह शर्करा तेल चाँदी ताण्डवनृत्य, उड़द-
भात, धान्य आदिका आभास होना; घरमें ताँबा, काँसा, लोहा, सीसा तथा पीवल आदिका रखा दिखायी देनेका आभास होना; ऐसे उत्पातपर धनके नाश होनेकी सम्भावना रहती है और अनेक व्याधियाँ होती हैं, राजा भयंकर उपद्रव तथा बन्धनमें पड़ जाता है। गौ, अश्व तथा सेवकोंका विनाश होता है। दन्तपंक्तिको छोड़कर दाँतोंके ऊपर दाँतोंका निकलना, शलाकाके समान दाँत निकलना-ये भी दोषकारक हैं। बर्तनोंमें, घड़ोंमें यदि बादलके गरजनेकी आवाज सुनायी दे तो गृहस्वामीपर विपत्तिकी सम्भावना होती है-ये शुक्रग्रहजनित दोष हैं। इनकी शान्तिके लिये शुक्रवारके दिन दही, मधु, घृतयुक्त शमीपत्रसे हवन करे तथा दो सफेद वस्त्र, पयस्विनी श्वेत गौ और सुवर्णकी शुक्रकी प्रतिमाका दान करना चाहिये।
मन्दिरकी जमीन यदि रक्त वर्णकी अथवा पुष्पित दिखलायी दे तो वहाँ भी उत्पातकी सम्भावना होती है। आकाशमें जलती हुई आग दिखायी दे तो स्त्री-पुरुषों की हानि और राष्ट्र में विप्लवकी सम्भावना होती है। सभी ओषधियाँ और सस्य रसविहीन हो जायें; हाथी, घोड़े, मतवाले होकर हिंसक हो जायें; राजाके लिये नगर तथा गाँवमें सभी शत्रु हो जायें; गौ, महिष आदि पशु अनायास उत्पात मचाने लगें; घरके दरवाजेमें गोह और शंखिनी प्रवेश करे तो अशुभ समझना चाहिये। इससे राज-पीड़ा और धन-हानि होती है। ये सभी उत्पात शनिग्रह्मजनित समझने चाहिये। इनकी शान्तिके लिये विविध सरयों तथा समिधाओंसे शनिवार के दिन 'शं नो देवी' (यजु.३६।१२) इस मन्त्रसे दस हजार आहुतियाँ देनी चाहिये और चस्से भी हवन करना चाहिये। नीली सवत्सा पयस्विनी गाय दो वस्त्र, सोना, चाँदी, शनिको प्रतिमा आदि दक्षिणामें ब्राह्मणको देनी चाहिये।
बादलके गरजे बिना लाल-पीली शिलावृष्टिका दिखलायी देना, बिना हवाके वृक्षका हिलना- डुलना दिखलायी देना, इन्द्रध्वज तथा इन्द्रधनुषका गिरना, दिनमें सियारोंका तथा रात्रिमें उलूकका रोना, एक बैलका दूसरे बैलके ककुद्पर मुँह रखकर {भाना, ऐसे दोष होनेपर देशमें पापकी वृद्धि होती है तथा राजा राज्य एवं धर्मसे च्युत हो जाता है। गौ और ब्राह्मणमें परस्पर द्वन्द्व मच जाता है, वाहन नष्ट हो जाते हैं। यदि आकाशमें ध्वजको छाया दिखलायी पड़े तो राष्ट्र में महान् विप्लब होता है। यदि जलमें जलती हुई आग दिखलायी दे और सिर अथवा शरीरपर बिजली गिर जाय तो उसका जीवन दुर्लभ हो जाता है। दरवाजोंके किनारे पर अथवा स्तम्भपर अग्नि अथवा धूम दिखलायी दे तो मृत्युका भय होता है। आकाशमें वद्राघात, अग्निकी ज्वालाके मध्य धुआँ, नगरके मध्य किसी अनहोनी घटनाका दिखलायी देना, शव ले जाते समय उस शवका उठकर बैठ जाना; स्थापित लिङ्गका गमन करना; भूकम्प, आँधी-तूफान, उल्कापात होना; बिना समय वृक्षोंमें फल-फूल लगना-ये सभी उत्पात राहुजन्य हैं। इनकी शान्ति के लिये दही, मधु, घी, दूब, अक्षत आदिसे 'कया नश्चित्र' (यजुः २७।३९) इस मन्त्रद्वारा रविवारके दिन दस हजार आहुतियाँ राहुके लिये दे, चरुसे भी हवन करे। पयस्विनी कपिला गौ, अतसी, तिल, शंख और युग्मवस्त्र ब्राहाणको दान में दे। वारुणहोम भी करें। इससे सारे दोष-पाप नष्ट हो जाते हैं।
यदि जम्बूक, गृध, कौए आदि भीषण ध्वनि करते हों तथा भयंकर नृत्य करते हो तो मृत्युको आशंका होती है, जलती हुई आगके समान धूमकेतुका दिखलायी पड़ना, जमीनका खिसकना मालूम होना-ऐसी स्थितिमें राजा पीड़ित होता है, राज्यमें अकाल पड़ता है तथा अनेक प्रकारके अनिष्ट होते हैं। इनकी शान्तिके लिये स्वर्णछत्रयुक्त सात घोड़ोंसे युक्त सूर्यमण्डप बनाकर ब्राह्मणको दान करे। बिल्वपत्र भी दे, ऐन्द्र मन्त्रसे हवन करे। यदि अकस्मात् शाल, ताल, अक्ष, खदिर, कमल आदि घरके अंदर ही उत्पत्र हों तो ये सभी केतुग्रहजन्य दोष हैं। इनकी शान्तिके लिये 'त्र्यम्बकं.' (यजुः ३।६०) इस मन्त्रसे दही, मधु, घृतसे दस हजार आहुतियाँ दे तथा चरु भी प्रदान करे । नीली सवत्सा पयस्विनी गाय, वस्त्र, केतुकी प्रतिमा आदि ब्राह्मणको दान करे।
दक्षिण दिशामें अपनी छाया अपने पैरके एकदम समीप आ जाय और छायामें दो या पाँच सिर दिखलायी दें अथवा छिन्न-भिन्न रूपमें सिर दिखलायी दे तो देखनेवालेकी सप्ताहके भीतर ही मृत्युकी आशंका होती है। कौआ, बिल्ली, तोता तथा कपोतका मैथुन दिखलायी दे तो ये दुनिमित्त राहुजन्य उत्पात है। इनकी शान्तिके लिये शनिवारके दिन शनिके निमित्त दस हजार आहुतियाँ देनी चाहिये। अर्क-पुष्पसे शनिकी पूजा करे तथा चरुसे सौ बार आहुति दे। वाम और दक्षिणके क्रमसे यदि बाहु, पैर तथा आँखमें स्पन्दन हो तो इससे मृत्युका भय होता है। यह सोमग्रहजनित दुर्निमित्त है। पुस्तक, यज्ञोपवीत, चरु तथा इन्द्र- ध्वजमें आग लग जाय तो यह सूर्यजन्य दुर्निमित्त है। इसकी शान्तिके लिये सूर्यके निमित्त त्रिमधुयुक्त कनेरके पुष्पोंसे आहुतियाँ देनी चाहिये। जिन ग्रहोंका दुनिमित्त दिखलायी दे, उसकी शान्तिके लिये ग्रहों तथा उसके अघिदेवता और प्रत्यधिदेवताके निमित्त भी विधिपूर्वक पूजन-हवन-स्तवन, दान आदि करना चाहिये। विधिके अनुसार क्रिया न करनेसे दोष होता है। अतः ये सभी शान्त्यादि-कर्म शास्त्रोक्त विधानके अनुसार ही करने चाहिये। इससे शान्ति प्राप्त होती हैं और सर्वविध कल्याण-मङ्गल होता है। (अध्याय २०)
।।मध्यमपर्व, तृतीय भाग सम्पूर्ण
।।भविष्यपुराणान्तर्गत मध्यमपर्व सम्पूर्ण ।।