भगवान् रुद्रने कहा-ब्रहान् ! आपने भगवान् सूर्यनारायणके माहात्म्यका वर्णन किया, जिसके सुननेसे हमें बहुत आनन्द मिला, कृपाकर आप देव उनके माहात्म्यका और वर्णन करें।
ब्रह्माजी बोले-हे रुद्र ! इस सचराचर त्रैलोक्यके मूल भगवान् सूर्यनारायण ही हैं। देवता, असुर
मानव आदि सभी इन्हींसे उत्पन्न हैं। इन्द्र, चन्द्र, रुद्र, ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव आदि जितने भी देवता हैं, सबमें इन्हींका तेज व्याप्त है। अग्रिमें विधिपूर्वक दी हुई आहुति सूर्यभगवान्को ही प्राप्त होती है। भगवान् सूर्यसे ही वृष्टि होती है, वृष्टिसे अन्नादि उत्पन्न होते हैं और यही अन्न प्राणियोंका जीवन है। इन्हींसे जगत्की उत्पत्ति होती है और अन्तमें इन्हींमें सारी सृष्टि विलीन हो जाती है। ध्यान करनेवाले इन्हींका ध्यान करते हैं तथा ये मोक्षकी इच्छा रखनेवालोंके लिये मोक्षस्वरूप हैं। यदि सूर्यभगवान् न हो तो क्षण, मुहूर्त, दिन, रात्रि, पक्ष, मास, ऋतु, अपन, वर्ष तथा युग आदि काल-विभाग हो ही नहीं और काल-विभाग न होनेसे जगत् का कोई व्यवहार भी नहीं चल सकता। ऋतुओंका विभाग न हो तो फिर फल-फूल, खेती, ओषधियाँ आदि कैसे उत्पन्न हो सकती हैं? और इनकी उत्पत्तिके बिना प्राणियोंका जीवन भी कैसे रह सकता है? इससे यह स्पष्ट है कि इस (चराचरात्मक) विश्वके मूलभूत कारण भगवान् सूर्यनारायण ही हैं। सूर्यभगवान् वसन्त-ऋतु कपिलवर्ण, ग्रीष्ममें तप्त सुवर्णके समान, वर्षा श्वेत, शरद् ऋतु, पाण्डुवर्ण, हेमन्तमें ताम्रवण और शिशिर-ऋतुमें रक्तवर्णके होते हैं। इन वर्णोक- अलग-अलग फल है। रुद्र। उसे आप सुनें।
यदि सूर्यभगवान् (असमयमें) कृष्णवर्णके हो तो संसारमें भय होता है, ताम्रवर्णके हों तो सेनापतिक नाश होता है, पीतवर्णके हों तो राजकुमारक मृत्यु, श्वेतवर्णके हों तो राजपुरोहितका ध्वंस और चित्र अथवा धूम्रवर्णके होनेसे चोर और शस्त्रक भय होता है, परंतु ऐसा वर्ण होनेके अनन्तर यदि वृष्टि हो जाती है तो अनिष्ट फल नहीं होते।(अध्याय ५४)
Summary of chapter 35 of the Bhavishya Purāṇa is as follows:
Pāṇini, the grammarian of grammarians, is shown in his prior birth as the brāhmaṇa Pitṛśarman who was defeated in scholarly debate by Vararuci. Reborn as Pāṇini and driven by the memory of that defeat, he performed intense tapas at Kedāra Kṣetra. Bhagavān Śiva appeared before him and taught him the fourteen Māheśvara Sūtras — the phonemic root-sequence from which Pāṇini constructed his entire Aṣṭādhyāyī. The grammar of Sanskrit is thus revealed not as a human composition but as a divine transmission from Śiva himself.