भविष्य पुराण

उपदेश करनेके लिये युधिष्ठिरकी प्रार्थना

कल्याणानि ददातु वो गणपतिर्यस्मित्रतुष्टे सति

क्षोदीयस्यपि कर्मणि प्रभवितुं ब्रह्मापि जिरायते।

भेजे यच्चरणारविन्दमसकृत्सौभाग्यभाग्योदय-

स्तेनैषा जगति प्रसिद्धिमगमद्देवेन्द्रलक्ष्मीरपि॥

शश्चत्पुण्यहिरण्यगर्भरसनासिंहासनाध्यासिनी

सेयं वागधिदेवता वितरतु श्रेयांसि भूयांसि वः।

यत्पादामलकोमलाइलिनखज्योत्स्त्राभिरुद्वेल्लित:

शब्दब्रह्मसुधाम्बुधिर्बुधमनस्युच्छृङ्खलं खेलति ॥

(उत्तरपर्व १ । १-२)

'जिनकी प्रसन्नताके बिना ब्रह्मा भी एक क्षुद्र कार्यका सम्पादन नहीं कर सकते और जिनके चरणोंके एक बार आश्रय लेनेसे देवेन्द्रका भाग्य चमक उठा तथा उन्हें अखण्ड राजलक्षमीकी प्राति हो गयो, वे भगवान् गणपतिदैव आपलोगोंका कल्याण करें । जो ब्रह्माके जिह्वाग्न-भागपर निरन्तर सिंहासनासीन रहती हैं और जिनके चरणनखकी चन्द्रिकासे प्रकाशित होकर शब्दब्रह्मका समुद्र विद्वानोंके हृदयपर नृत्य करता है, वे भगवती सरस्वती आप सबका अनन्त कल्याण करें।'

भगवान् शंकरका ध्यान कर भगवान् (विष्णु) कृष्णकी स्तुति कर और ब्राजीको नमस्कार कर तथा सूर्यदेव एवं अनिदेवको प्रणाम कर इस ग्रन्थका वाचन करना चाहिये*।

एक बार धर्मके पुत्र धर्मवेत्ता महाराज युधिधिरको देखने के लिये व्यास पाण्डेय माण्डव्य, शाण्डिल्य गीता, शातातप, पराशर भरद्वाज, शौनक, पुलस्त्य, पुलह तथा देवाष नारद आदि बेस काषण पधारे। उन महान् तपस्वी एवं वेदवेदाङ्गपारंगत ऋषियोंको देखकर भक्तिमान् राजा युधिष्ठिरने अपने भाइयोंके साथ प्रसन्नचित्त हो सिंहासनसे उठकर भगवान् श्रीकृष्ण तथा पुरोहित धौम्यको आगे कर उनका अभिवादन किया और आचमन एवं पाद्यादिसे उनकी पूजा कर आसन प्रदान किया। उन तपस्वियोंक बैठनेपर विनयसे अवनत हो महाराज युधिष्ठिरने श्रीवेदव्यासजीसे कहा-

भगवन्! आपके प्रसादसे मैंने यह महान् राज्य प्राप्त किया तथा दुर्योधनादिको परास्त किया। किंतु जैसे रोगीको सुख प्राप्त होनेपर भी वह सुख उसके लिये सुखकर नहीं होता, पैसे ही अपने बन्धु-बान्धवों को मारकर यह राज्य-सुख मुझे प्रिय नहीं लग रहा है । जो आनन्द वनमें निवास करते हुए कन्द मूल तथा फलोंके भक्षणसे प्राप्त होता है, वह सुख शत्रुओंको जीतकर सम्पूर्ण पृथ्वीका राज्य प्राप्त करनेपर भी नहीं होता। जो भीष्मपितामह हमारे गुरु, बन्धु, रक्षक, कल्याण और कवचस्वरूप थे, उन्हें भी मुझ-जैसे पापीने राज्यके लोभसे मार डाला। मैंने बहुत विवेकशून्य कार्य किया है। मेरा मन पाप-पङ्कमें लित हो गया है। भगवन् ! आप कृपाकर अपने ज्ञानरूपी जलसे मेरे अज्ञान तथा पाच पदको धोकर सर्वथा निर्मल बना दीजिये और अपने  प्रज्ञारूपी दीपको मेरा धर्मरूपी मार्ग प्रशस्त कीजिये।धर्म के संरक्षक ये मुनिगण कृपाकर यहाँ आये हुए हैं। गङ्गापुत्र महाराज भीष्मपितामहस मैंने

*शिवं ध्यात्वा हरिं स्तुत्वा प्रणम्य परमेष्ठिनम्।

चित्राभानुं च भानुं च नत्वा ग्रन्थमुदीरयेत्।।

अर्थशास्त्र, धर्मशास्त्र और मोक्षशास्त्रका विस्तारसे श्रवण किया है। उन शान्तनुपुत्र भीष्मके स्वर्गलोक चले जानेपर अब श्रीकृष्ण और आप ही मैत्री एवं बन्धुताके कारण मेरे मार्गदर्शक हैं।'

व्यासजी बोले-राजन्! आपको करने योग्य सभी बातें मैंने, पितामह भीष्मने, महर्षि मार्कण्डेय, धौम्य और महामुनि लोमशने बता दी हैं। आप धर्मज्ञ, गुणी, मेधावी तथा धीमान् पुरुषोंके समान हैं, धर्म और अधर्मक निश्चयमें कोई भी बात आपको अज्ञात नहीं है। हषीकेश भगवान् श्रीकृष्णके यहाँ उपस्थित रहते हुए धर्मका उपदेश करनेका साहस कौन कर सकता है? क्योंकि ये ही संसारकी सृष्टि, स्थिति तथा पालन करते हैं एवं प्रत्यक्षदर्शी हैं। अत: ये ही आपको उपदेश करेंगे। इतना कहकर तथा पाण्डवोंकी पूजा ग्रहण कर बादरायण व्यासजी तपोवन चले गये। (अध्याय १)