सूतजी बोले-ऋषियो! अब मैं एक साधु वणिक्की कथा कहता हूँ। एक बार भगवान् सत्यनारायणका भक्त मणिपूरक नगरका स्वामी महायशस्वी राजा चन्द्रचूड अपनी प्रजाओंके साथ व्रतपूर्वक सत्यनारायणभगवान्का पूजन कर रहा था, उसी समय रत्नपुर (रत्नसारपुर)-निवासी महाधनी साधु वणिक् अपनी नौकाको धनसे परिपूर्ण कर नदी-तटसे यात्रा करता हुआ वहाँ आ पहुँचा। वहाँ उसने अनेक ग्रामवासियोंसहित मणि-मुक्तासे निर्मित तथा श्रेष्ठ वितानादिसे विभूषित पूजन- मण्डपको देखा, गीत-वाद्य आदिकी ध्वनि तथा वेदध्वनि भी वहाँ उसे सुनायी पड़ी। उस रम्य स्थानको देखकर साधु वणिक्ने अपने नाविकको आदेश दिया कि यहींपर नौका रोक दो। मैं यहाँके आयोजनको देखना चाहता हूँ। इसपर नाविकने वैसा ही किया। नावसे उतरकर उस वणिक्ने लोगोंसे जानकारी प्राप्त की और वह सत्यनारायण- भगवान्को कथा-मण्डपमें गया तथा वहाँ उसने उन सभीसे पूछा- 'महाशय ! आपलोग यह कौन-सा पुण्यकार्य कर रहे हैं?' इसपर उन लोगोंने कहा-'हमलोग अपने माननीय राजाके साथ भगवान् सत्यनारायणकी पूजा-कथाका आयोजन कर रहे हैं। इसी व्रतके अनुष्ठानसे इन्हें निष्कण्टक राज्य प्राप्त हुआ है। भगवान् सत्यनारायणकी पूजासे धनकी कामनावाला द्रव्य-लाभ, पुत्रकी कामनावाला उत्तम पुत्र, ज्ञानकी कामनावाला ज्ञान-दृष्टि प्राप्त
सुदाम्परतण्डुलकणा जाध्या मालुम्पदुर्लभाः ।
सम्पदोऽदासी प्रीत्या भक्तिमात्रपपेक्ष्यते ॥
गोपो गृधो वणि व्यापो हनुमान् सविभीषणः ।
येऽन्ये पापात्मका दैत्या पत्रकायाधबादयः ।
नारायणान्तिकं प्राप्य मोदतेऽद्यापि यदशाः।
(प्रतिसर्गपर्व २।२०।१५-१९)
करता है और भयातुर मनुष्य सर्वथा निभय हा जाता है। इनकी पूजासे मनुष्य अपनी सभी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है।'
यह सुनकर उसने गलेमें वस्त्रको कई बार लपेटकर भगवान् सत्यनारायणको दण्डवत् प्रणाम कर सभासदोंको भी सादर प्रणाम किया और कहा-'भगवन् ! मैं संततिहीन हूँ, अत: मेरा सारा ऐश्वर्य तथा सारा उद्यम सभी व्यर्थ है, हे कृपासागर! यदि आपकी कृपासे पुत्र या कन्या मैं प्राप्त करूँगा तो स्वर्णमयी पताका बनाकर आपकी पूजा करूंगा।' इसपर सभासदोंने कहा-'आपकी कामना पूर्ण हो।' तदनन्तर उसने भगवान् सत्यनारायण एवं सभासदोंको पुनः प्रणामकर प्रसाद ग्रहण किया और हृदयसे भगवान्का चिन्तन करता हुआ वह साधु वणिक् सबके साथ अपने घर गया। घर आनेपर माङ्गलिक द्रव्योंसे स्त्रियोंने उसका यथोचित स्वागत किया। साधु वणिक् अतिशय आश्चर्यके साथ मङ्गलमय अन्तःपुरमें गया। उसकी पतिव्रता पत्नी लीलावतीने भी उसकी स्त्रियोचित सेवा की। भगवान् सत्यनारायणकी कृपासे समय आनेपर बन्धु-बान्धवोंको आनन्दित करनेवाली तथा कमलके समान नेत्रोंवाली उसे एक कन्या उत्पन्न हुई। इससे साधु वणिक् अतिशय आनन्दित हुआ और उस समय उसने पर्याप्त धनका दान किया। वेदज्ञ ब्राह्मणोंको बुलाकर उसने कन्याके जातकर्म आदि मङ्गलकृत्य सम्पन्न किये। उस बालिकाको जन्मकुण्डली बनवाकर उसका नाम कलावती रखा। कलानिधि चन्द्रमाकी कलाके समान वह कलावती नित्य बढ़ने लगी। आठ वर्षकी बालिका प्रौड़ा था रजस्वला कहलाती है। समयानुसार कलावती भी बढ़ते-बढ़ते विवाहके योग्य हो गयी। उसका पिता कलावतीको विवाह-योग्य जानकर उसके सम्बन्धकी चिन्ता करने लगा।
काञ्चनपुर नगरमें एक शंखपति नामका वणिक रहता था। वह कुलीन, रूपवान्, सम्पत्तिशाली, शील और उदारता आदि गुणों से सम्पन्न था। अपनी पुत्रीके योग्य ठस वरको देखकर साधु वणिक्ने शंखपतिका वरण कर लिया और शुभ लयमें अनेक माङ्गलिक उपचारोंके साथ अनिके सानिध्य में वेद वाद्य आदि ध्वनियोंके साथ यथाविधि कन्या उसे प्रदान कर दी, साथ ही मणि, मोती, मूंगा, वस्त्राभूषण आदि भी उस साधु वणिक्ने मङ्गलके लिये अपनी पुत्री एवं जामालाको प्रदान किये । साधु वणिक अपने दामादको अपने घरमें रखकर उसे पुत्रके समान मानता था और वह भी पिताके सम्मान साधु वणिका आदर करता था। इस प्रकार बहुत समय बीत गया । साधु जणिक्ने भगवान् सत्यनारायणकी पूजा करनेका पहले यह संकल्प लिया था कि 'संतान प्रास होनेपर मैं भगवान् सत्यनारायणकी पूजा करूंगा' पर वह इस बातको भूल ही गया। उसने पूजा नहीं की।
कुछ दिनों के बाद वह अपने जामाताके साथ व्यापारके निमित्त सुदूर नर्मदाके दक्षिण तटपर गया और वहाँ व्यापारनिरत होकर बहुत दिनोंतक ठहरा रहा। पर वहाँ भी उसने सत्यदेवकी किसी प्रकार भी उपासना नहीं की और परिणामस्वरूप भगवान् के प्रकोपका भाजन बनकर वह अनेक संकटोंसे ग्रस्त हो गया। एक समय कुछ चोरोंने एक निस्तब्ध रात्रिमें वहाँक राजमहलसे बहुत- सा द्रव्य तथा मोतीकी मालाको चरा लिया।
*अष्टवर्षा भवेद्गौरी नववर्षा च रोहिणी ।
दशवर्ष भवेत् कन्या तत: प्रौढा रजस्वला।
(प्रतिसर्गपर्व २०२८।२१-२२)
राजाने चोरीकी बात जात होनेपर अपने राजपुरुषोंको बुलाकर बहुत फटकारा और कहा कि 'यदि तुमलोगोंने चोरोंका पता लगाकर सारा धन यहाँ दो दिनोंमें उपस्थित नहीं किया तो तुम्हारी असावधानीके लिये तुम्हें मृत्यु-दण्ड दिया जायगा।' इसपर राजपुरुषोंने सर्वत्र व्यापक छान-बीन की, परंतु बहुत प्रयत्न करनेपर भी वे उन चोरोंका पता नहीं लगा सके। फिर वे सभी एकत्रित होकर विचार करने लगे-'अहो! बड़े कष्टकी बात है, चोर तो मिला नहीं, धन भी नहीं मिला, अब राजा हमलोगोंको परिवारके साथ मार डालेगा। मरनेपर भी हमें प्रेत-योनि प्राप्त होगी। इसलिये अब तो यही श्रेयस्कर है कि 'हमलोग पवित्र नर्मदा नदीमें डूबकर मर जायें। क्योंकि नर्मदाके प्रभावसे हमें शिवलोककी प्राप्ति होगी।' वे सभी राजपुरुष आपसमें ऐसा निश्चयकर नर्मदा नदीके तट पर गये। वहाँ उन्होंने उस साधु वणिक्को देखा और उसके कण्ठमें मोतीकी माला भी देखी। उन्होंने उस साधु वणिक्को ही चोर समझ लिया और वे सभी प्रसन्न होकर उन दोनों (साधु वणिक् और उसके जामाता)-को धनसहित पकड़कर राजाके पास ले आये। भगवान् सत्यनारायण भी पूजा करनेमें असत्यका आश्रय लेनेके कारण वणिक्के प्रतिकूल हो गये थे। इसी कारण राजाने भी विचार किये बिना ही अपने सेवकोंको आदेश दिया कि इनकी सारी सम्पत्ति जब्त कर खजाने में जमा कर दो और इन्हें हथकड़ी लगाकर जेलमें डाल दो। सेवकनि राजाज्ञाका पालन किया। वणिक्की बातोंपर किसीने कुछ भी ध्यान नहीं दिया। अपने जामाताके साथ वह वणिक् अत्यन्त दुःखित हुआ और विलाप करने लगा-'हा पुत्र ! मेरा धन अब कहाँ चला गया, मेरी पुत्री और पत्नी कहाँ हैं? विधाताको प्रतिकूलता तो देखो। हम दुःख सागरमें निमग्न हो गये। अब इस संकटसे हमें कौन पार करेगा? मैंने धर्म एवं भगवान्के विरुद्ध आचरण किया। यह उन्हीं कौका प्रभाव है।' इस प्रकार विलाप करते वे ससुर और जामाता कई दिनोंतक जेलमें भीषण संतापका अनुभव करते रहे। (अध्याय २८)
[सत्यनारायणव्रत-कथाका पञ्चम अध्याय]