युधिष्ठिरने पूछा-भगवन् ! इस भूतलपर कौन ऐसा उपवास या व्रत है, जो मनुष्यके अभीष्ट वस्तुओंके वियोगसे उत्पन्न शोकसमूहसे उद्धार करनेमें समर्थ, धन-सम्पत्तिकी वृद्धि करनेवाला और संसार-भयका नाशक है।
भगवान् श्रीकृष्णने कहा-महाराज! आपने जिस व्रतके विषयमें प्रश्न किया है, वह समस्त जगत् को प्रिय तथा इतना महत्त्वशाली है कि देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। यद्यपि इन्द्र, असुर और मानव भी उसे नहीं जानते तथापि आप- जैसे भक्तिमानके प्रति मैं अवश्य उसका वर्णन करूँगा। उस पुण्यप्रद व्रतका नाम विशोकद्वादशी-व्रत है। विद्वान् व्रतीको आश्विन मास में दशमो तिधिके दिन अल्प आहार करके नियमपूर्वक इस व्रतका आरम्भ करना चाहिये। पुनः एकादशोके दिन व्रती उत्तराभिमुख अथवा पूर्वाभिमुख बैठकर दातून करे फिर (स्नान आदिसे निवृत्त होकर) निराहार रहकर भगवान् केशव और लक्ष्मीकी विधिपूर्वक भलीभौति पूजा करे और दूसरे दिन भोजन करूँगा'-ऐसा नियम लेकर रात्रिमें शयन करे। प्रात:काल उठकर सवाषधि और पञ्चगव्य मिले जलसे स्नान करे तथा श्वेत वस्त्र और श्वेत पुष्पोंकी माला धारण करके भगवान् विष्णुको कमल-पुष्पोंद्वारा पूजा करे। पूजन करनेके पश्चात् एक मण्डल बनाकर मिट्टीसे वेदीका निर्माण कराये। वह बेदी बीस गुल लम्बी- चौड़ी, चारों ओरसे चौकोर, उत्तरको ओर ढालू, चिकनी और सुन्दर हो। तत्पश्चात् बुद्धिमान् व्रती सूपमें नदीको बालुकासे लक्ष्मीकी मूर्ति अङ्कित करे और उस सूपको वेदी पर रखकर 'देव्यै नमः', 'शान्त्यै नमः', 'लक्षयै नमः', 'निय नमः', 'पुष्टय नमः', 'तुष्टयै नमः', 'दृष्टौ नमः', 'हृष्ट्यै नमः के उच्चारणपूर्वक लक्ष्मीकी अर्चना करे और यों प्रार्थना को 'विशोका (लक्ष्मीदेवी) मेरे दु:खोंका नाश करें, विशोका मेरे लिये वरदायिनी हों, विशोका
१-वाराहपुराणके ३र आध्यायसे ५०वें तक ठीक इसी प्रकार इन द्वादश द्वादशी-व्रतोंको कथा एवं व्रत विधिका विस्तारसे वर्णन हुआ है।
२-यह विषय मत्स्यपुराण ८२, पद्मपु१।२१, वराह पुराण १०२, कृत्यकल्पतरु ५. दानकाण्ड १४१ तथा दानमयूस, दानसागरादिमें विशेष शुद्धरूपसे उद्धृत हैं। तदनुसार इसे भी शुद्ध किया गया है।
मुझे संतति दें और विशोका मुझे सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्रदान करें। तदनन्तर श्वेत वस्त्रोंसे सूपको परिवेष्टित कर नाना प्रकारके फलों, वस्त्रों और स्वर्णमय कमलोंसे लक्ष्मीकी पूजा करे। चतुर व्रती सभी रात्रियों में कुशोदक-पान करे और सारी रात नृत्य-गीत आदिका आयोजन कराये। तीन पहर रात व्यतीत होनेपर व्रती मनुष्य स्वयं नींद त्यागकर जग जाय और अपनी शक्तिके अनुसार शय्यापर तीन या एक द्विज-दम्पत्तिके पास जाकर वस्त्र, पुष्पमाला और चन्दन आदिसे 'जलशायिने नमोऽस्तु' जलशायी भगवान्को नमस्कार है-यों कहकर उनकी पूजा करे। इस प्रकार रातमें गीत-वाद्य आदि कराकर जागरण करे तथा प्रात:काल स्नान कर पुनः द्विज-दम्पतिका पूजन करे और कृपणता छोड़कर अपनी सामर्थ्यके अनुकूल उन्हें भोजन कराये। फिर स्वयं भोजन करके पुराणोंकी कथाएँ सुनते हुए वह दिन व्यतीत करे। प्रत्येक मासमें इसी विधिसे सारा कार्य सम्पन्न करना चाहिये।
इस प्रकार व्रतकी समाप्तिके अवसरपर गद्दा, चादर, तकिया आदि उपकरणोंसे युक्त एक सुन्दर शव्या गुड धेनुके साथ दान करके इस प्रकार प्रार्थना करे—'देवेश! जिस प्रकार लक्ष्मी आपका परित्याग करके अन्यत्र नहीं जाती, उसी प्रकार सौन्दर्य, नीरोगता और नि:शोकता सदा मुझे निरवच्छिन्त्ररूपसे प्राप्त हों-मेरा परित्याग न करें और भगवान् केशवके प्रति उत्तम भक्ति प्राप्त हो।' वैभवकी अभिलाषा रखनेवाले वतीको समन्च गुड धेनुसहित शय्या और लक्ष्मीसहित सूप-दान करना चाहिये। इस ब्रतमें कमल, करवीर (कनेर), बाण (नीलकुगुण या अगस्त्य-वृक्षका पुष्प), ताजा (बिना कुम्हलाया हुआ) कुंकुम, केसर, सिंदुवार, मल्लिका, धपाटला, कदम्ब, कुब्जक और जाती-ये पुष्प सदा प्रशस्त माने गये हैं।
युधिष्ठिरने पुनः पूछ-जगत्पते ! अब आप मुझे (विशोकद्वादशीके प्रसङ्गमें निर्दिष्ट) गुड-धेनुका विधान बतलाइये। साथ ही यह भी बतलानेकी कृपा कीजिये कि गुड-धेनुका रूप कैसा होता है और उसे किस मन्त्रका पाठ करके दान करना चाहिये।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले-महाराज! इस लोकरें गुड-धेनुके विधानका जो रूप है और उसका दान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, उसे मैं बतला रहा हूँ। गुड-धेनुका दान समस्त पापोंका विनाशक है। गुड-धेनुका दान करनेके दिन गोबरसे भूमिको लीप- पोतकर सब ओरसे कुश बिछाकर उसपर चार हाथ लम्बा काला मृगचर्म स्थापित कर दे, जिसका अग्रभाग पूर्व दिशाकी ओर हो । तदनन्तर एक छोटे मृगचर्ममें बछड़ेकी कल्पना करके उसीके निकट रख दे। फिर उसमें पूर्वमुख और उत्तर पैरवालो सवत्सा गौको कल्पना करे। चार भारर गुडसे बनी हुई गुड-धेनु सदा उत्तम मानी गयी है। उसका बछड़ा एक भार गुडका बनाना चाहिये। अपने गृहको सम्पत्रिके अनुसार इस (गौ) का निर्माण कराना चाहिये। इस प्रकार गौ और बछड़ेकी कल्पना करके उन्हें श्वेत एवं महीन वस्त्रसे आच्छादित कर दे। फिर घीसे उनके मुखकी, सीपसे कानोंकी, गन्नेसे पैरों को, श्वेत मोतीसे नेत्रोंकी, श्वेत सूतसे नाड़ियोंकी, वेत कम्बलसे गल कम्बलकी, लाल रंगके चिह्नसे पीठकी, श्वेत रंगके मृगपुच्छके बालोंसे रोएंकी, गूंगेसे दोनों औंहोंकी, मक्खनसे दोनों स्तनोंकी, रेशमके धागेसे पूँछकी, काँहासे दोहनीकी, इन्द्रनीलमणिसे आँखोंकी तारिकाओंकी, सुवर्णसे सींगके आभूषणोंकी, चाँदीसे खुरोंकी और नाना प्रकारके फलोंसे नासापुटोंकी रचना कर धूप, दीप, आदिद्वारा उनकी अर्चना करनेके पशात् या प्रार्थना करे-
1-विशोका दुःखनाशाय विशोका वरदास्तु मे ।
विशोका चास्तु संतत्यै विशोका सर्वसिद्धये ॥
(उचरपर्व ८४।१६)
2-दो हजार पाल अर्थात् बौन मनके वजनको 'भार' कहते हैं।
'जो समस्त प्राणियों तथा देवताओंमें निवास करनेवाली लक्ष्मी हैं, धेनुरूपसे वही देवी मेरे पापोंका विनाश करें। जो लक्ष्मी विष्णुके वक्षःस्थल विराजमान हैं, जो स्वाहारूपसे अग्निकी पत्नी हैं तथा जो चन्द्र, सूर्य और इन्द्रकी शक्तिरूपा हैं, वे ही धेनुरूपसे मेरे लिये सम्पत्तिदायिनी हौं। जो ब्रह्माकी, कुबेरकी तथा लोकपालोंकी लक्ष्मी हैं, वे धेनुरूपसे मेरे लिये वरदायिनी हों। जो लक्ष्मी प्रधान पितरोंके लिये स्वधारूपा, यज्ञभोजी अग्नियों के लिये स्वाहारूपा तथा समस्त पापोंको हरनेवाली धेनुरूपा हैं, वे मुझे ऐश्वर्य प्रदान करें। इस प्रकार उस गुड-धेनुको आमन्त्रित कर उसे ब्राह्मणको निवेदित कर दे। यही विधान घृत-तिल आदि सम्पूर्ण धेनुओंके दानके लिये कहा गया है।
नरेश्वर! अब जो दस पापविनाशिनी गाएँ बतलायी गयी हैं, उनका नाम और स्वरूप बतला रहा हूँ। पहली गुड-धेनु, दूसरी घृत धेनु, तीसरी तिल-धेनु, चौथी मधु-धेनु, पाँचवीं जल-धेनु, छठी क्षीर-धेनु, सातवीं शर्करा-धेनु, आठवीं दधि-धेनु, नवीं रस-धेनु और दसवीं स्वरूपतः प्रत्यक्ष धेनु है। सदा पर्व-पर्वपर अपनी श्रद्धाके अनुसार मन्त्रोच्चारणपूर्वक आवाहनसहित इन गौओंका दान करना चाहिये, क्योंकि ये सभी भोग और मोक्षरूप फलको प्रदान करनेवाली हैं। ये सभी सम्पूर्ण यज्ञोंका फल प्रदान करनेवाली, कल्याणकारिणी और पापहारिणी हैं चूँकि इस लोकमें विशोकद्वादशी- व्रत सभी व्रतोंमें श्रेष्ठ माना गया है, इसलिये उसका अङ्ग होनेके कारण गुड-धेनु भी प्रशस्त मानी गयी है। उत्तरायण और दक्षिणायनके दिन, पुण्यप्रद विषुवयोग, व्यतीपातयोग अथवा सूर्य- चन्द्रके ग्रहण आदि पर्वोपर इन गुड-धेनु आदि गौओंका दान करना चाहिये। यह विशोकद्वादशी पुण्यदायिनी, पापहारिणी और मङ्गलकारिणी है। इसका व्रत करके मनुष्य विष्णुके घरमपदको प्राप्त हो जाता है तथा इस लोकमें सौभाग्य, नीरोगता और दीर्घायु प्रासकर अन्तमें श्रीहरिका स्मरण करता हुआ विष्णुलोक प्राप्त करता है। (अध्याय ८४)