सुमन्तु मुनि बोले-राजन् ! अब मैं सौरधर्मसे सम्बद्ध सदाचारोंका संक्षेपमें वर्णन करता हूँ। सूर्य-उपासकको भूखे-प्यासे, दीन-दुःखी, थके हुए, मलिन तथा रोगी व्यक्तिका अपनी शक्तिके अनुसार पालन और रक्षण करना चाहिये, इससे सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। पतित, नीच तथा चाण्डाल और पक्षी आदि सभी प्राणियोंको अपनी शक्तिके अनुसार दी गयी थोड़ी भी वस्तु करुणाके कारण दिये जानेसे अक्षय-फल प्रदान करती है, अतः सभी प्राणियोंपर दया करनी चाहिये। जो मधुर वाणी बोलता है, उसे इस लोक तथा परलोकमें सभी सुख प्राप्त होते हैं। अमृत प्रवाहित करनेवाली प्रिय वाणी चन्दनके स्पर्शके समान शीतल होती है। धर्मसे युक्त वाणी बोलनेवालेको अक्षय सुखेकी प्राप्ति होती है। प्रिय वाणी स्वर्गका अचल सोपान है, इसकी तुलनामें दान, पूजन, अध्यापन आदि सब व्यर्थ हैं। अतिथिके आनेपर सादर उससे कुशल प्रश्र करना चाहिये और यात्राके समय 'आपका मार्ग मङ्गलमय हो, आपको सभी कार्यके साधक सुख नित्य प्रारा हो'ऐसा कहना चाहिये। सभी समय ऐसे आशीर्वादात्मक वचन बोलने चाहिये। नमस्कारात्मक वाक्यमें 'स्वस्ति' मङ्गल-वचन तथा सभी कर्मों में 'आपका नित्य कल्याण हो', ऐसा कहना चाहिये। इस प्रकारके आचरणोंका अनुष्ठान करके व्यक्ति सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर सूर्यलोकमें प्रतिष्ठित होता है। मनुष्योंको जैसी भक्ति भगवान् सूर्य में हो वैसी ही भक्ति सूर्यभक्तोंके प्रति भी रखनी चाहिये। किसीके द्वारा आक्रोश करने या ताडित होनेपर जो न आक्रोश करता है, न ताड़न करता है, वाणी, अधिकार होने के कारण ऐसा क्षमाशील एवं शान्त व्यक्ति सदा दुःखसे रहित होता है। सभी तीर्थोंमें क्षमा सबसे श्रेष्ठ है, इसलिये सभी क्रियाओंमें क्षमा धारण करना चाहिये। ज्ञान, योग, तप एवं यज्ञ-दानादि सक्रियाएँ क्रोधी व्यक्तिके लिये व्यर्थ हो जाती हैं, इसलिये क्रोधका परित्याग कर देना चाहिये। अप्रिय वाणी मर्म, अस्थि, प्राण तथा हृदयको जलानेवाली होती है, इसलिये अप्रिय वाणीका कभी प्रयोग नहीं करना चाहिये। क्षमा, दान, तेजस्विता, सत्य, शम, अहिंसा-ये सब भगवान् सूर्यकी कृपासे ही प्राप्त होते हैं।
सुमन्तु मुनि पुन: बोले-महाराज। अब आप आदित्यसम्मत सौर-धर्मको पुनः सुनें। यह सौर- धर्म पापनाशक, भगवान् सूर्यको प्रिय तथा परम पवित्र है। यदि मार्गमें कहीं रविको पूजा अर्चा
न होदक स्वर्गमाना व यथा तोके प्रियं वचः।
इहामुत्र सुखं तेषां वाग्येषां मधुरा भवेत्।।
अमृतस्यन्दिनीं वाचं चन्दनस्पर्शशीतलाम्।
धर्माविरोधिनीमुक्त्वा सुखमक्षयमाप्रुयात्।।
सर्वेषामेव तीर्थांना क्षान्तिः परमंपूजिता।
तस्मात्पूर्वं प्रयत्रेन क्षान्तिः कार्या क्रियासु वै।।
ज्ञानयोगतपो यस्य यज्ञदानानि सत्क्रिया।
क्रोधनस्य वृथा यस्मात् तस्मात् क्रोधं विवर्जयेत्।।
होती देखे तो यह समझना चाहिये कि वहाँ भगवान् सूर्यदेव स्वयं प्रत्यक्ष उपस्थित हैं। भगवान् सूर्यका मन्दिर देखकर वहाँ भगवान् सूर्यको नमस्कार करके ही वहाँसे आगे जाना चाहिये। देव-पर्व, उत्सव, श्राद्ध तथा पुण्य दिनों में विधिपूर्वक भगवान् सूर्यकी पूजा करनी चाहिये। देवगण तथा पितृगण सूर्यका आश्रयण करके ही स्थित हैं। भगवान् सूर्यके प्रसन्न होनेपर नि:संदेह सभी प्रसन्न हो जाते हैं। सौर-धर्मके अनुष्ठानसे ज्ञान प्राप्त होता है तथा उससे वैराग्य । ज्ञान और वैराग्यसे सम्पन्न व्यक्तिको सूर्ययोगमें प्रवृत्ति होती है। सूर्यके योगसे वह सर्वज्ञ एवं परिपूर्ण हो जाता है तथा अपनी आत्मामें अवस्थित होकर सूर्यके समान स्वर्गमें आनन्द लाभ करता है।
ब्रह्मचर्य, तप, मौन, समा तथा अल्पाहार- ये तपस्वियोंके पाँच विशिष्ट गुण हैं। भाग्य या अन्य विशिष्ट मार्गसे तथा न्यायपूर्वक प्राप्त धन गुणवान् व्यक्तिको देना हो दान हैं। हजारों सस्य- राशियोंको उत्पन्न करनेवाली जल युक्त उर्वरा भूमिका दान 'भूमिदान कहा जाता है। सभी दोषोंसे रहित, कुलीन अलंकृता कन्या निर्धन