राजा युधिष्ठिरने कहा-भगवन् ! वेदोंमें यह कहा गया है कि विधिपूर्वक यज्ञ करने, बड़े- बड़े दान देने और कठिन परिश्रम करनेसे परमेश्वरकी प्राप्ति होती है, किंतु कलियुगके प्राणी, जो न दान दे सकते हैं और न ही यज्ञ करने में समर्थ हैं, उनकी मुक्ति किस प्रकार हो सकती है, यदि कोई उपाय हो तो आप उसे बतायें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले-राजन् ! मैं आपको एक रहस्यपूर्ण बात बतलाता हूँ। प्रलयके समय जब धरणी (पृथ्वी) जलमें निमग्न होकर रसातल चली गयी, तम उस समय धरणीदेवीने अपने उद्धारके लिये व्रत किया था। व्रतके प्रभावसे प्रसन्न होकर भगवान् नारायणने वाराहरूप धारणकर उसे पुनः अपने स्थानपर लाकर स्थापित कर दिया। उस व्रतका विधान इस प्रकार है-
व्रतीको मार्गशीर्घ मासके कृष्ण पक्षकी दशमीको प्रात:काल नित्य-स्नानादि क्रियाओंको सम्पन्न कर देवार्चन एवं हवनादि कर्म विधिपूर्वक करने चाहिये। उस दिन पवित्र, अत्यल्प हविध्यान-भोजन करना चाहिये। अनन्तर पुनः पाँच पग चलकर हाथ-पाँव धोकर पवित्र हो क्षीर-वृक्षके आठ अंगुलके दातूनसे दन्तधावन कर आचमन करना चाहिये। जलसे अङ्गोंका स्पर्शकर भगवान् जनार्दनका ध्यान करते हुए वह दिन व्यतीत करना चाहिये। एकादशीको निराहार रहकर भगवान्के नामोंका जप करना चाहिये। द्वादशीको प्रातः नदी आदिके पवित्र जलमें स्नान करना चाहिये। स्नानसे पूर्व नदी, तालाब अथवा शुद्ध एवं पवित्र स्थानकी मृत्तिका ग्रहण करनी चाहिये, मृत्तिका ग्रहण करते समय इस मन्त्रका उच्चारण करे-
धारणं पोषणं त्वत्तो भूतानां देवि सर्वदा।
तेन सत्त्वेन मां पाहि पापान्मोचय सुव्रते॥
(उत्तरपर्व ८३।१७)
'देवि सुव्रते। जिस शक्ति के द्वारा आप समस्त स्थावर जंगमात्मक प्राणियोंका धारण-पोषण करती हैं, उसी शक्तिके द्वारा मुझे पापोंसे मुक्त कीजिये तथा सदा मेरा पालन कीजिये।'
पुनः उस मिट्टीको सूर्यको दिखाकर, शरीरमें लगाकर स्नान करे। तदनन्तर आचमनकर देवमन्दिरमें जाकर भगवान् नारायणके अशोको पूजा करे भारायणके आगे चार जलपूर्ण घोंगे चार समुद्रोंकी परिकल्पनाकर स्थापना करे। उन घटॉपर तिलपूर्ण पूर्णपात्र स्थापित करे। घटोंके मध्य एक पीठके ऊपर जलपात्रमें सुवर्ण, चाँदी अथवा काधकी मत्स्यभगवान्की प्रतिमा बनाकर स्थापित करे। यथाविधि उपचारोंसे उनका पूजनकर प्रार्थना करे। रात्रिमें वहीं जागरण करे। प्रभातमें चारों घटोंको ऋग्वेदी, यजुर्वेदी, सामवेदी तथा अथर्ववेदी चार ब्राह्मणोंकी पूजाकर उन्हें निवेदित करे। जलपात्रमें स्थापित भगवान् मत्स्यकी प्रतिमा ब्राह्मण-दम्पतिको प्रदान करे। ब्राह्मणोंको पायसान्नसे संतृप्त कर पश्चात् स्वयं भी भोजन करे। राजन् ! इस विधिसे जो मार्गशीर्ष कृष्ण द्वादशीका व्रत करता है, उसे दीर्घ आयुकी प्राप्ति होती है। जन्मान्तरमें किये गये ब्रह्महत्या आदि महापातकोंसे उसकी मुक्ति हो जाती है। यदि निष्कामभावसे व्रत करता है तो उसे ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है, इसमें कोई संदेह नहीं।
इसी प्रकार स्नानादि कर पौष मासके शुक्ल पक्षको द्वादशीको उपचास कर भगवान् जनार्दनकी कूर्मरूपमें पूजा करनी चाहिये। माघ मासके शुक्ल पक्षकी द्वादशीको उपवासपूर्वक भगवान् वराहकी प्रतिमाका पूजनकर ब्राह्मणको दान करना चाहिये। इसी प्रकार फाल्गुन मासके शुक्ल पक्षको द्वादशीको उपवासपूर्वक भगवान् नरसिंहकी प्रतिमाका, चैत्र मास के शुक्ल पक्षको द्वादशीको भगवान् वामनंकी प्रतिमाका, वैशाख शुक्ल द्वादशीको परशुरामजीको प्रतिमाका, ज्येष्ठ मासकी शुक्ल द्वादशीको भगवान् राम-लक्ष्मणकी प्रतिमाका, आषाढ़ शुक्ल द्वादशीको भगवान् वासुदेव (कृष्ण) की प्रतिमाका, श्रावण मासकी शुक्ल द्वादशीको बुद्धभगवान्की तथा भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षकी द्वादशीको उपवासपूर्वक भगवान् कल्किकी प्रतिमा का यथाविधि अङ्ग पूजन आदि कर घटोकी स्थापना करके पूजित प्रतिमा आदि बाहाणोंको निवेदित कर देनी चाहिये।
इस प्रकार दस मासोंमें भगवान् के दशावतारोंका
पूजनकर पूर्व-विधानसे आश्विन शुक्ल द्वादशीको उपवासपूर्वक भगवान् पदानाभकी तथा कार्तिक द्वादशीको वासुदेवकी पूजा करनी चाहिये। अन्तमें प्रतिमा तथा घटोंको ब्राह्मणको निवेदित कर दे। उन्हें भोजन कराकर, दक्षिणा प्रदान करे तथा दीनों, अनाथोंको भी भोजन-वस्त्र आदिसे संतुष्ट करना चाहिये और फिर स्वयं भी भोजन करना चाहिये।
राजन् ! इस प्रकार द्वादश मासोंमें जो इस व्रतको करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर विष्णु- सायुज्यको प्राप्त करता है । धरणीदेवीने इस व्रतको किया था। इसीलिये यह धरणी-ततके नामसे प्रसिद्ध हुआ। प्राचीन काल में दक्षप्रजाचतिने इस व्रतका अनुष्ठानकर प्रजाओंका अधिपतित्व प्राप्त किया था। राजा युवनाश्यने इस व्रतके अनुष्ठानसे मान्धाता नामक श्रेष्ठ पुत्रको प्राप्तकर अन्तमें शाश्वत ब्रह्मपद प्राप्त किया था। इसी प्रकार हैहयाधिपति कृतवीर्यने इस व्रतके प्रभावसे महान् पराक्रमी चक्रवर्ती राजा सहस्रार्जुनको पुत्ररूपमें प्राप्त किया था । शकुन्तलाने भी इस व्रतके प्रभावसे राजर्षि दुष्यन्तको पतिरूपमें तथा श्रेष्ठ भरतको पुत्ररूपमें प्राप्त किया था। इसी प्रकार अन्य कई श्रेष्ठ चक्रवर्ती राजाओं तथा श्रेष्ठ पुरुषोंने इस व्रतके प्रभावसे उत्तम फल प्राप्त किया था। जो भी इसे करता है, भगवान् नारायण उसका उद्धार कर देते हैं। (अध्याय ८३ )